मन की ‘पोटली’ खोलिए…जीवन की ‘उड़ान’ भरिए
दयाशंकर मिश्र जैसे घर में बेकार कपड़े, सामान पोटलियां बनाकर हम बंद कोनों में डाल देते हैं. उसी तरह मन
15 अगस्त से ‘बतइयो’ प्लेटफ़ॉर्म – डिजिटल ‘आज़ादी’ का नया अध्याय
शहर-शहर किसान आंदोलन की तेज होती ‘धार’
बागमती तटबंध पर ‘सुशासन’ का ‘विश्वासघात’ और जनता का आक्रोश
मीडिया के दिग्गज देख लें आंदोलनों का ‘देस-गांव’
पूर्णिया में मीडिया कार्यशाला की ‘सोपान कथा’
एक कप प्याली की ऊष्मा और मिठास से भरे सोलंकी सर
अपने गुरु से नाता जोड़, कहां गए मेरे गुरु हमको छोड़
इलाहाबाद में रंग प्रेमियों ने मनाया बंसी दा की स्मृतियों का उत्सव
सागर में आकाश चौरसिया की मल्टी लेयर फार्मिंग की कार्यशाला
बंसी कौल के लिए थिएटर ही रहा पहला और आखिरी परिवार
दयाशंकर मिश्र जैसे घर में बेकार कपड़े, सामान पोटलियां बनाकर हम बंद कोनों में डाल देते हैं. उसी तरह मन
दयाशंकर मिश्र हम ऐसी दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिसमें डर को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दिया जा
दयाशंकर मिश्र पगडंडियों से तो बहुत से रास्ते खुल सकते हैं, लेकिन सीमेंट की रोड से यह सुविधा नहीं होती.
दयाशंकर मिश्र हम सब इसी गलतफहमी में उम्र गुजार देते हैं कि मेरे बिना तुम्हारे सुख का सूरज कैसे उगेगा!
दयाशंकर मिश्र दूसरों से भागना-बचना फिर भी सरल है, लेकिन जब हम अपनी दृष्टि से भागना शुरू कर देते हैं,
दयाशंकर मिश्र जो पीछे छूट गए हैं, जरूरी नहीं उनमें कोई कमी है. जीवन बहुत-सी चीज़ों का मिश्रण है, इसलिए,
दयाशंकर मिश्र बहुत सी चीजें हैं, जिनका ‘हां और न’ में कोई जवाब नहीं. जहां जीवन का प्रश्न है, वहां
दयाशंकर मिश्र हम भूल रहे हैं कि जब भी कल आएगा, वह आज हो जाएगा! हमारी सोच कल की है.
दयाशंकर मिश्र कभी राह चलते अपनी ही गलती से हम गिर पड़ते हैं. कभी खुद से गाड़ी को टक्कर लगा
दयाशंकर मिश्र मन में क्षमा कभी गहरे नहीं उतरती, क्योंकि हम छोटे-बड़े में उलझे हैं। मन कमजोर, शक्तिशाली के चयन