
लखनऊ। देश की पावन धरा श्रीवृन्दावन धाम के प्रमुख संत एवं श्री राधा-रानी और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज, जिन्हें देशवासी स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के नाम से जानते हैं, एक बार फिर चर्चा में हैं। स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज इस बार इसलिए चर्चा में हैं कि उनकी अब तक की जीवन यात्रा और उनके पवित्र उपदेशों पर हाल ही में ‘परम सुख’ नाम से एक पुस्तक का प्रकाशन हुआ है। स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के आश्रम श्री हित राधा केलि कुंज में देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से हुई उनकी मुलाकात के अगले दिन यह पुस्तक रिलीज हुई है। पुस्तक के लेखक एवं संपादक श्री राधेकृष्ण ने स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज से मिलकर उनको पुस्तक की पहली प्रति भेंट की और उनका आशीर्वाद लिया। इस पुस्तक के संपादन में आईपीएस श्री घनश्याम चौरसिया ने विशेष योगदान दिया है। स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के जीवन सफर और उनके पवित्र उपदेशों पर केंद्रित यह पहली पुस्तक है।
पुस्तक ‘परम सुख’ के लेखक एवं संपादक श्री राधेकृष्ण ने बताया कि यह पुस्तक दो भागों में है। पुस्तक के पहले भाग में स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के जन्म से लेकर उनकी अब तक की जीवन यात्रा के बारे में विस्तार से बताया गया है, जबकि दूसरे भाग में उनके लगभग 400 पवित्र उपदेशों को शामिल किया गया है। पुस्तक की शुरुआत कानपुर के एक मध्यमवर्गीय धार्मिक प्रवृत्ति वाले परिवार में उनके जन्म लेने से होती है। स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज का मूल नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय था। 320 पृष्ठों की इस पुस्तक में अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय (स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज) के जन्म, उनकी प्रारम्भिक शिक्षा, बचपन से ही भगवान के प्रति लगाव और चिंतन, मंदिर की प्रतिदिन साफ-सफाई, साधु-संतों की सेवा से लेकर उनके संत बनने, भगवान को प्राप्त करने के लिए काशी में कठोर तपस्या करने, और बाद में रासलीला के प्रभाव में आकर काशी से वृन्दावन आने और फिर श्री राधा जी और भगवान श्रीकृष्ण का सदा के लिए दास बन जाने के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। पुस्तक का प्रकाशन ईकोक्रेजी कम्युनिकेशन्स ने किया है जबकि वितरण एवं विपणन की जिम्मेदारी सृजन प्रकाशन के पास है। श्री राधेकृष्ण इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन सफर पर एक पुस्तक ‘नरेन्द्र मोदीः द ग्लोबल लीडर’ लिख चुके हैं जो बेहद चर्चित रही है। पुस्तक की प्रस्तावना श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्री श्रीकांत मिश्र ने लिखी है।

पुस्तक में बताया गया है कि महज 13 वर्ष की उम्र में एक दिन किस तरह वह घरवालों को कुछ बताए बिना कैसे हमेशा के लिए घर छोडकर भगवान की खोज में निकल पड़े। कुछ दिनों के बाद जब उनके पिताजी श्री शंभू पाण्डेय उनसे मिले और उनसे घर वापस लौटने के लिए कहा तो उन्होंने घर लौटने से मना कर दिया। उस दिन उनके पिताजी ने उनसे तीन वचन लिए थे। पहला वचन- तुम्हें स्वेच्छा से जो कोई भी कुछ देगा, तुम उसे ही लोगे और उसी से अपना गुजारा करोगे। दूसरा वचन- कभी किसी के घर में प्रवेश नहीं करोगे, किसी के घर पर नहीं ठहरोगे। तीसरा वचन- संन्यासी बनने के बाद फिर कभी गृहस्थ जीवन में वापस नहीं आओगे। अपने पिताजी को दिए इन तीनों वचनों पर वह आज तक कायम हैं और उनका पालन कर रहे हैं।
पुस्तक में स्वामी प्रेमानन्द जी के हवाले से बताया गया है कि बचपन में ही उनके मन में वैराग्य की भावना इतनी बलवती हो गई थी कि उनका घर और स्कूल से अधिक समय मंदिर में भगवान की पूजा में व्यतीत होता था। गांव में आने वाले साधु-संतों की वह खूब सेवा करते थे। पुस्तक में स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के कानपुर से काशी पहुंचने और गंगा जी के तट पर भगवान भोलेनाथ की कड़ी साधना करने पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
महादेव का भक्त किस तरह से रासलीला के प्रभाव में आकर काशी से वृन्दावन पहुंचा और फिर श्री राधा जी और श्री कृष्ण जी का दास बन गया, बहुत अच्छी तरह से बताया गया है। पुस्तक के दूसरे भाग में स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के लगभग 400 उपदेशों को समाहित किया गया है। पुस्तक में स्वामी जी का पहला उपदेश है- मनुष्य योनि में जन्म लेना हमारा परम सौभाग्य है। हमें अपने जन्म को व्यर्थ नहीं जाने देना है। हमारे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए कि हमें भगवान का नाम जप करके, भजन करके, सत्संग करके भगवान को प्राप्त कर लेना है, जिससे कि इस संसार में आने-जाने चक्र से छुटकारा मिल सके। देवता भी मनुष्य योनि में जन्म लेने के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं लेकिन उन्हें जन्म नहीं मिलता है।
अपने एक उपदेश में उन्होंने कहा है कि भगवान को प्राप्त करने का सबसे सरल तरीका नाम जप है। स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज अपने एक उपदेश में कहते हैं कि हमें अपने देशवासियों का बौद्धिक स्तर सुदारने की जरूरत है। एक उपदेश में उन्होंने कहा है कि धर्म युक्त कर्म ही कर्म है, बाकी सब कुकर्म है। देश के युवाओं को समझाते हुए एक उपदेश में उन्होंने कहा है कि युवाओं को अपना ब्रह्मचर्य बचाकर रखना चाहिए। सफलता के लिए कठिन श्रम के साथ ही संयम और अनुशासन बहुत जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने देश के सभी अभिभावकों से अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की अपील की है।

एक उपदेश में उन्होंने लड़कियों और महिलाओं को हर माह होने वाले मासिक धर्म को वंदनीय बताते हुए कहा कि इस दौरान पुरुषों को अपने परिवार की लड़कियों, महिलाओं का पूरी तरह से ख्याल रखना चाहिए, उनकी सभी मांगों को पूरा किया जाना चाहिए। देश भर की युवतियों से उन्होंने खास अपील करते हुए कहा है कि प्रेम के नाम पर वे अपना शरीर किसी को न सौंपे। एक उपदेश में उन्होंने कहा है कि ईश्वर से कामना करना हमारी अज्ञानता है। हम जो कोई भी कर्म करें, कार्य पूरा होने के बाद से ईश्वर को अर्पित कर दें। जब हम ऐसा करेंगे तो हम अपने जीवन में कभी कोई गलत काम नहीं करेंगे।

राधे कृष्ण का परिचय
राष्ट्र सर्वप्रथम के भाव के साथ विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में कार्य करने का व्यापक अनुभव। पढ़ाई के दौरान हिंदी साप्ताहिक ब्लिट्ज (मुंबई) में सम-सामयिक मुद्दों पर लिखना शुरू किया। बाद में एक विदेशी समाचार एजेंसी के साथ आंशकालिक संवाददाता के रूप में जुड़ गए। हिंदी दैनिक कुबेर टाइम्स, अमर उजाला, सांध्य समाचार, ऑल इंडिया रेडियो, यूनाइटेड टेलीविजन, निम्बस कम्युनिकेशन्स, लाइव इंडिया और इंडिया न्यूज में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं। तथ्यपरक, निष्पक्ष और संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित। देश की कई जानी-मानी हस्तियों के साथ साक्षात्कार कर चुके हैं। अब तक छह पुस्तकें- संघर्ष पथ, संघर्ष के प्रयोग, नरेन्द्र मोदी: द ग्लोबल लीडर, साई बाबा के पवित्र उपदेश, संघर्ष गाथा और योगी आदित्यनाथ एवं विचार दर्शन प्रकाशित हो चुकी हैं।
