माँ का वार्षिक श्राद्ध और सुमिरन – एक

माँ का वार्षिक श्राद्ध और सुमिरन – एक

पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

पूर्णिया, सुबह के क़रीब साढ़े चार का वक़्त हुआ है. खिड़की से छन कर आती रौशनी ने भोर के आवक की सूचना दे दी है. ये वही वक़्त है, जब मैं कभी बाहर से घर आता तो सीधा माँ-पापा के पास पहुँच जाया करता. पापा और माँ दोनों ऐसे ख़ास दिनों में हमसे भी काफ़ी पहले उठ जाया करते और इंतज़ार करते कोई आहट हो और वो पुकार लगाएँ- कौन ? अब इस ‘कौन’ की आवाज़ की जगह एक ‘मौन’ है. माँ का वार्षिक श्राद्ध. मौसम की आँख-मिचौली के बीच संपन्न हुआ. 6 को भी तेज़ हवाएँ और अच्छी खासी बारिश. 8 को भी आंधी तूफ़ान. बस सात तारीख़ का एक दिन, जिसमें पहले दिन की बारिश की ठंडक भी मौजूद रही और बादलों ने भी ख़लल नहीं डाला. माँ-पापा का कुनबा फिर जमा हुआ. वो सारे लोग जुटे जो श्रद्धा के साथ माँ का ‘सुमिरन’ करते रहे हैं. माँ के सुमिरन के इन पलों में दिल्ली में हमारी सोसायटी में रहने वाली स्नेहा के व्हाट्सएप स्टेटस पर नज़र पड़ी तो मन अजीब सा हो गया. माँ जब आख़िरी बार दिल्ली आई तो स्नेहा के साथ काफ़ी गप्प मारा करतीं. स्नेहा पर स्नेह बरसा माँ ने उसे अपना बना लिया. इसी स्नेह को शब्द के ज़रिए स्नेहा ने उड़ेल दिया. शब्दों का काम ही तो यही है, अपनों के सुमरिन में काम आ जाते हैं.मन की एक झलक दिखला जाते हैं.एक व्यक्तित्व के तमाम रंगों में से कुछ रंग हमें नज़र आते हैं और हम बस उस रंग को अपने मानस पर उकेर लेते हैं. अपने-अपने मन में स्मृतियों को बसा लेते हैं. उस पर कभी कोई किरण छिटक कर पड़ती है तो ‘इंद्रधनुषी’ रंग निखर आते हैं. हवेलिया वैलेंसिया की वो बेंच जिस पर हम मां-बेटे कभी-कभी कुछ देर के लिए बैठ जाया करते थे, वहाँ भी जब भी नज़र पड़ती है माँ याद आती हैं. दीदी के साथ बेंगलोर में माँ कुछ वक़्त बिता आईं तो वहाँ भी उनकी यादें बिखरी हैं. उन यादों को समेट कर दीदी, शालू और तन्वी-वितान आए. तन्वी वितान के पास भी अपनी बड़ी नानी की स्मृतियाँ हैं. वो बड़ी नानी को अपने बाल सुलभ अंदाज में सुमिरते हैं. जैसे अनमोल, कभी-कभी दादी को याद कर कुछ-कुछ कहता रहता है.

लाभा महादेवपुर से बड़े मामा आए. बाबू आया. लाभा यानी माँ का मायका. कटिहार से बड़ी दीदी (दुर्गा ) और जीजाजी आए. घर के वरिष्ठतम दामाद ‘प्रोफ़ेसर साहब’ पर माँ-पापा का विशेष स्नेह भी था और सम्मान भी. पिता की ज़ुबान पर दुर्गा और बुआ की ज़ुबान पर ‘दुर्गली’ जैसे शब्द मानस पर अंकित हैं. कटिहार और पूर्णिया की दूरी 30-35 किलोमीटर की है, लेकिन स्नेहिल रिश्तों में ये दूरी घट जाया करती है. सुपौल वाले विनोद जीजाजी, अनिता दीदी का अंदाज आज भी जस का तस है. किसी भी ख़ास मौक़े पर अतिरिक्त समय देने का स्नेहिल आग्रह आज भी वो उसी सहजता से स्वीकार करते हैं, ये उनका बड़प्पन है. खगड़िया से पुष्पा बाई और पुरुषोत्तम जीजाजी भी आए. जहां तक मुझे याद पड़ता है, पुष्पा दीदी की शादी पूर्णिया से हुई थी. तब हम केडिया जी मकान में किराए पर रहते थे. वहीं से शादी हुई थी और बारात के ठहरने के लिए जनवासा मधुबनी और थाना चौक के बीच में ‘मोल बाबू’ के अहाते में बना था. तब माधोचा और मुकुंद चा भी पिता और चाचा जी के ख़ास लोगों में शुमार थे. कहीं कुछ खटपट हो जाती तो दोनों भाई पिता के साथ दबंगई से खड़े रहते. बारात में भी तब किसी को एक सीमा से ज़्यादा हुल्लड़ करने की इजाज़त नहीं थी. पापा-मां कभी कभी उस शादी को याद करते तो एक क़िस्सा सुनाते…

खैर, वो मुझे बहुत अच्छे से याद नहीं है. माँ को सुमिरता हूँ तो ये सारे वाक़ये घूमने लगते हैं.वक़्त सवा पाँच का हो चला है. हम जेल चौक वाले नए घर पर हैं. माँ की तस्वीर सामने है और मैं मानो माँ-पापा के साथ कुछ वक़्त गुज़ार रहा हूँ. कुछ बातें कर रहा हूँ. पुराने घर पर बहुत कुछ बदल रहा है लेकिन स्मृतियाँ तो अलग-अलग काल खंड से झांक कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. सुमिरन के क्रम में बिहारीगंज भी आया, जहां पिता और माँ का एक और ठिया था. पुरैनी से पूर्णिया के सफ़र में एक स्वाभाविक डेरा. तब बिहारीगंज से पूर्णिया के लिए ट्रेन चलती थी. अब भी चलती है. तब ट्रेन ही एक मात्र साधन था. तब रिश्तों की तासीर ये थी कि आप ट्रेन से उतरे हों और सीधे पुरैनी जाने की कल्पना ही नहीं कर सकते थे. पुरैनी से चले तो पहला विराम बिहारीगंज, फिर पूर्णिया. पूर्णिया से चले तो पहला विराम बिहारीगंज और फिर पुरैनी. तब ट्रेन की आवक के साथ कई बार निगाहें बरबस स्टेशन पर होतीं कि कहीं कोई अपना तो नहीं आया. क्योंकि तब तो आज की तरह आने से पहले फ़ोन से सूचना देने की रवायत भी नहीं थी. उसी बिहारीगंज से सजन भैया और सविता भाभी आए. उन्होंने अपने मामा-मामी का सुमिरन किया. पवन भैया फारबिसगंज से आए. माँ-पिता के सुमिरन में भांजे-भांजी की टोली का सुमिरन एक तरह से प्रथम सुमिरन बन जाता है. क्योंकि ये संबंध काफ़ी गहरे रहे हैं. पापा को इसके लिए कई बार तंज भी सहने पड़ते. लड़ने-झगड़ने की रवायत वाले रिश्ते. कभी-कभी आपको इन झगड़ों को देख कर लग सकता था कि अब क्या, अब तो सब कुछ बिगड़ गया. लेकिन बिगड़ कर सुधरने में बहुत ज़्यादा वक़्त कभी नहीं लगा. बुआ के ग़ुस्से के सातवें आसमान में भी सात समंदर वाला स्नेह समेट कर रखते थे दोनों भाई बहन- मेरे पिता (बैजुआ) और हमारी बुआ (लक्ष्मी, मेरे दादा की लक्ष्मरी, लाडली). चाचा (बासकी, पापा और दादा के संबोधन में) हमारे वैसे ही थे सबसे छोटे- थोड़े से अल्हड़. भैया की डाँट को हमेशा ससम्मान ग्रहण करने की अकूत क्षमता हासिल थी हमारे चाचा को. लंबी मूँछों पर चाचा डाँट खा सकते थे. बढ़ी दाढ़ी पर डाँट खा सकते थे. ख़ाकी वाले पुलिसिया पैंट-शर्ट पर डाँट खा सकते थे. बेवक्त गुल-मंजन पर डाँट खा सकते थे. समय पर स्नान और नाश्ता नहीं करने पर डाँट खा सकते थे. तो पिता के पास डाँटने का बेशुमार हक़ था और उस हक़ को इस्तेमाल करने की आज़ादी भी. परिवार में अभी भी ये परंपरा कायम है. परंपराएं कम ज़्यादा हो सकती हैं, पूरी तरह ख़त्म नहीं होती. नदी की तरह. नदी की धारा सूख सकती है लेकिन सावन भादों के मौसम में ये फिर से हरी भरी हो जाती हैं. सोनी-मोनी भी पहुँची. पवनजी भी रानीगंज से आए.

पिता और माँ के सुमिरन में रानीगंज, बंगाल वाला रानीगंज भी काफ़ी अहमियत रखता है. हमारे दादाजी के दो भाइयों ने वहाँ अपना ठिकाना बना लिया था. दादाजी की एक बहन भी वहीं थीं. पापा ने उन रिश्तों को भी खूब निभाया. माँ भी जब तक रहीं, रिश्ते निभते रहे. माँ-पापा ने यही तो हमें सिखाया. सुमिरन में एक ख़ास क़िस्म का भटकाव हो जाया करता है. संगीता बाई, सुमनजी और मुन्नी बाई का ज़िक्र बीच में ही छूट गया. ये शहर बेगूसराय के बाशिंदे हैं. संगीता बाई की शादी बेगूसराय से ही हुई थी. तब तक ‘बैठा विवाह’ का चलन शुरू हो चुका था. बैठा विवाह का मतलब तब तक यही था कि लड़के वाले लड़की वाले परिवार को अपने शहर में बुला लिया करते थे. बारात लेकर जाने की ज़हमत नहीं उठाते थे. तब बारातियों का ‘स्वागत’ बहुत मायने रखता था और लोगों को डर लगता कि अगर बारातियों का ठीक से स्वागत नहीं हुआ तो बहुत उलाहने सुनने को मिलेंगे. लड़की वाले भी इसलिए ‘बैठा विवाह’ सहजता से स्वीकार कर लेते थे. बातों के इस सिलसिले को एक बार यहीं विराम देते हैं. क्योंकि बेगूसराय से जो ट्रेन चली तो सुमन जीजाजी, संगीता बाई, मुन्नी बाई उसमें बैठे, खगड़िया से पुष्पा बाई और पुरुषोत्तम जीजाजी सवार हुए, ट्रेन के एक और पड़ाव पर अनिता दी और विनोद जीजाजी भी आ गए. लोग आते गए, पूर्णिया आने वाला क़ाफ़िला बनता गया. क़रीब पौने छह बजने को हैं. थकावट की वजह से कहीं किसी कमरे से आहट नहीं हुई है. माँ- पिता के साथ इस वक़्त तक एक कप चाय हो चुकी होती थी हमारी. चाय की चुस्कियों के साथ जो गप्प हुआ करती थी, वो तो मैं कर रहा हूँ. बस वो एक प्याली चाय नहीं है. माँ-पिता नहीं है, वो गोद नहीं है. वो बिस्तर नहीं है. वो चादर नहीं है, जिसे खींचकर घुस जाने को मन बेताब हुआ करता था. यही वक़्त हुआ करता था जब पापा झाड़ू लेकर आँगन बुहारने निकलते. माँ हल्ला करती. मैं उनके हाथ से झाड़ू लेकर लगा दिया करता. दो दिन से रश्मि (मेरे छोटे भाई चंदन की पत्नी) सीढ़ियों पर झाड़ू लगाती दिखती है, मैं कहता हूँ भी कि झाड़ू मुझे दे दो, वो नहीं देती है. आज फिर रश्मि रानी जाग गई है.. राजू-सीमा, चंदन-रश्मि… पूर्णिया के इस ठिए कि ज़िम्मेदारी तो फ़िलहाल इन्हीं लोगों पर हैं. मां और पापा की सबसे ज़्यादा स्मृतियाँ भी इन्हीं लोगों के पास हैं. हम तो तब भी परदेसी थे, अब भी… बस मन है कि यहाँ अटका है.पूर्णिया माँ और पिता की स्मृतियों का स्थायी ठिकाना.

ये सारी स्मृतियाँ और इन सभी स्मृतियों को समेटने वाले ज़िंदादिल लोगों का जमावड़ा पूर्णिया में लगा था. बाड़ी हाट वाली बुआ के कुनबे से सुधीर भैया, सुशील भैया, मंजू दी, बड़े पप्पू भैया से मिलना हुआ. शिबू चाचा, सुधा बाई और परिवार के अन्य लोगों की हाज़िरी लगी. शंभु सर, दीदी आईं. शंभु सर ने कहा – “माँ -बाबूजी को अलग से याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. वो तो स्मृतियों में बसे हैं. माँ के बहाने एक बार फिर सब से मिलना हो गया.” एडीएम राज साहब का आना हुआ- Family Man की तरह. नवोदय के साथियों में संजय, अमरनाथ, नसीम, आशुतोष ने पुराने दिन याद किए. कई-कई चेहरे मां के वार्षिक श्राद्ध में दिखे और स्मृतियों में अंकित हो गए. ऐसे तमाम लोगों की स्मृतियाँ मेरे ज़ेहन में हैं. फिर कभी सुमिरन में माँ पिता के साथ कुछ और यादें, कुछ और बातें… अब 6 बजने को है, माँ के कुछ बोल सुनाई पड़ रहे हैं… उठ जाओ, कुछ काम कर लो… पिता की मजलिस को तोड़ने में माँ के उलाहनों की बड़ी भूमिका होती… पिता उठते और फिर निकल पड़ते… कभी दूध लाने… कभी सब्ज़ी लाने… कभी बच्चों को छोड़ने… कभी दुकान खोलने… मेरे हिस्से कुछ भी नहीं है.. जब-जब पूर्णिया में होता हूँ… मेरे हिस्से बस उनका सुमिरन है. मेरे आराध्य मेरे पिता और माँ को जब-जब सुमिरता हूँ, आप सभी याद आते हैं. आप सभी को नमन. आप स्नेहिल रिश्तों की इस परंपरा को निभाते रहें, जो कुछ माँ-पिता से आपको मिला, उसका एक अंश हम पर लुटाते रहें. आप सभी को प्रणाम. -पशुपति शर्मा, 9 मई 2026