‘गमन’-40 साल बाद ‘कशमकश’ का एहसास
विभावरी फिल्म थी 1978 में बनी मुज़फ्फर अली की ‘गमन’| रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करती युवा
15 अगस्त से ‘बतइयो’ प्लेटफ़ॉर्म – डिजिटल ‘आज़ादी’ का नया अध्याय
शहर-शहर किसान आंदोलन की तेज होती ‘धार’
बागमती तटबंध पर ‘सुशासन’ का ‘विश्वासघात’ और जनता का आक्रोश
मीडिया के दिग्गज देख लें आंदोलनों का ‘देस-गांव’
पूर्णिया में मीडिया कार्यशाला की ‘सोपान कथा’
एक कप प्याली की ऊष्मा और मिठास से भरे सोलंकी सर
अपने गुरु से नाता जोड़, कहां गए मेरे गुरु हमको छोड़
इलाहाबाद में रंग प्रेमियों ने मनाया बंसी दा की स्मृतियों का उत्सव
सागर में आकाश चौरसिया की मल्टी लेयर फार्मिंग की कार्यशाला
बंसी कौल के लिए थिएटर ही रहा पहला और आखिरी परिवार
विभावरी फिल्म थी 1978 में बनी मुज़फ्फर अली की ‘गमन’| रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करती युवा
कुमार सर्वेश बाबा जय गुरुदेव ने कभी कहा था कि हमारे काम से किसी आम आदमी को परेशानी नहीं होनी
दिलीप कुमार पांडे रेलवे स्टेशन पर अमूमन यात्रियों की भागदौड़, कुलियों की आवाज़ और ट्रेन के शोरगुल के सिवाय शायद ही कुछ
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में बृहद स्तर पर पूर्व विद्यार्थी सम्मेलन
पुष्य मित्र अगर हमें अपनी संस्कृति और लोक परंपराओं को जीवित रखना है तो उसे सिर्फ दिल में सहेजने भर
मृदुला शुक्ला बचपन में दशहरे पर नए कपड़े मिलने का दुर्लभ अवसर आता था । हम सारे भाई बहन नए
कीर्ति दीक्षित विजयादशमी है, प्रत्येक वर्ष रावण के तमाम गुणों अवगुणों की बातें होती हैं, कोई उसके ज्ञान की बात
सत्येंद्र कुमार यादव 7 अक्टूबर 2016 की वो शाम, ‘एसिड वाली लड़की’ को देखा, सुना और उनके दर्द को महसूस
शंभु झा जब जिंदगी दिल्ली नहीं थी, तब की बात है । तब रामलीला देखने का बड़ा उत्साह रहता था।
सच्चिदानंद जोशी कुछ दिन पहले मांडू जाना हुआ। यात्रा के अंतिम पड़ाव में हम प्रसिद्द दिल्ली दरवाजे पर रुके, क्योंकि