पुष्यमित्र

चार-पांच साल पहले झारखंड के एक गांव गया था । वह गांव सब्जी उत्पादन में अव्वल था । वहां के किसानों ने कहा कि वे पूरी तरह से जैविक तरीके से सब्जी उगाते हैं। खेतों में गोबर डालकर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाते हैं। जब यह बात हो रही थी, तब मेरी निगाहें तलाश रही थीं उन पालतू पशुओं को जिनके गोबर से वह गांव सब्जी उगाने में अव्वल बना था। मगर गांव में गाय-भैंस कहीं ढूंढे से नजर नहीं आ रहे थे। पूछने पर लोगों ने कहा, अब गांव में जानवर कहां मिलते हैं, न हमारे पास उन्हें रखने की जगह है, न उन्हें पालना आसान काम है। हम तो खेतों में डालने के लिए रांची के खटाल से ढाई हजार रुपये प्रति टेलर की दर से गोबर मंगवाते हैं। उनकी इस बात ने मुझे चौंका दिया, तो क्या अब गांवों में गोबर नहीं मिलते, गांव के लोग गोबर के लिए शहरों पर निर्भर हो रहे हैं?
मैंने गौर किया कि मेरे गांव का भी यही हाल है। इक्का-दुक्का लोगों के दरवाजे पर गाय-भैंस दिखते हैं। दरवाजा साफ-सुथरा दिखे, जानवरों की सेवा करने का झमेला न हो, इस चक्कर में ज्यादातर किसानों ने पशुपालन की सदियों पुरानी परंपरा को तज दिया। लिहाजा अब खेती यूरिया-डीएपी और कीटनाशकों पर निर्भर हो चली है। धीरे-धीरे मैंने मान लिया कि शायद यही सच है। गाय-भैंस पालने के लिए जितनी जगह चाहिए वह लोगों के पास है कहां। परिवार बढ़ता जा रहा है, गांवों में भी दो-दो डिसमिल जमीन पर एक-एक परिवार रह रहा है। ऐसे में जानवरों के लिए जगह कहां से बने।
हाल की मेरी कालिकापुर यात्रा ने एक बार फिर से मेरी इस मान्यता को पलट दिया। वहां हमलोगों ने खास कर दलितों-मुसलमानों और आदिवासियों के टोले का भ्रमण किया। हमने वहां देखा कि हर दरवाजे पर औसतन चार-पांच गायें और आधा दर्जन बकरियां बंधी हैं और आठ-दस कबूतर मंडरा रहे हैं। मेमने इंसानों के साथ, उनके बच्चों के साथ खेल रहे हैं, घूर ताप रहे हैं। गोबर का तो इतना बाहुल्य है कि तकरीबन हर दरवाजे की बाउंड्री जो बांस और करची से बनी टाट से बनी थी, पर कतार से गोबर के लंबे गोयठे खड़े थे। ये गोयठे जूट की संठी के चारों तरफ गोबर डाल कर तैयार किये जा रहे थे। यह गांव कोसी तटबंध के भीतर का नहीं था, वहां तो गोवंश की भरमार रहती ही है। यह बाहर वाला गांव है और भले सरकार उज्ज्वला योजना के जरिये घर-घर गैस पहुंचाने का और चूल्हे के धुएं से गरीब महिलाओं की आंखों को बचाने का अभियान चला रही हो, मगर मुझे गोयठा जलाकर खाना पकाने वाले कालिकापुर के ये परिवार संपन्न, आत्मनिर्भर और समृद्ध लगे। गांव में अगर दरवाजे पर बकरियां और मुरगियां या कबूतर पाले जायें तो परिवार कभी आर्थिक संकट में नहीं फंसेगा। सौ-दो सौ की जरूरत मुरगियां बेच कर हो जायेंगी और दो-चार हजार का काम बकरियां बेचने से चल जायेगा। गाय और भैंस का दूध बेचना आज की तारीख में ठीक-ठाक धंधा है।
ये ऐसे पशुपालक हैं, जिन्होंने पशुपालन को उद्यमिता नहीं बनाया है। पशुओं का आहार खरीदते नहीं हैं। गांव के मैदानों में चरा कर और खेतों से घास लाकर काम चला लेते हैं। मिनिमम इन्वेस्टमेंट में यह मैक्सिमम प्रोफिट की व्यवस्था है। दरअसल पशुपालन वह कड़ी है जो खेतिहरों को हर तरह से सहारा देती रही है। खेतों के लिए खाद का इंतजाम करती ही है, किसान को कभी आर्थिक संकट में नहीं फंसने देती, मगर फैशन में पड़कर किसानों ने पशुपालन से पीछा छुड़ा लिया। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं, जब से किसानों ने पशुपालन को तिलांजलि दी, तभी से किसानी संकट में है। किसान संकट का हल लोन और मशीन में नहीं है। पशुपालन में है। पशुपालन कृषि का सहयोग है और अपात काल में सहारा देने वाला है।PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं

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