‘कभी पूर्णिया में: पूर्णिया के यूरोपीय निवासी इतिहास के आईने में’ पुस्तक का लोकार्पण

‘कभी पूर्णिया में: पूर्णिया के यूरोपीय निवासी इतिहास के आईने में’ पुस्तक का लोकार्पण

चुनावी बयार के बीच पूर्णिया का नाम आते ही आपके जेहन में पप्पू यादव का चेहरा कौंधने लगता होगा, लेकिन क्या कभी आपने पूर्णिया के इतिहास को जानने की कोशिश की. अगर नहीं तो आपको डॉक्टर अशोक कुमार झा की लिखी किताब ‘कभी पूर्णिया में: पूर्णिया के यूरोपीय निवासी इतिहास के आईने में’ जरूर पढ़नी चाहिए. इस किताब के बारे में आपको विस्तार से बताएं उससे पहले बताते चलें कि पूर्णिया के हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट औ पूर्णिया कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में इस पुस्तक का अनावरण किया गया. डॉक्टर अशोक कुमार की इस पुस्तक का अनुवाद और संपादन का काम प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र ने किया है. किताब के विमोचन समारोह की अध्यक्षता पूर्णिया कॉलेज के प्रधानाचार्य शंभु लाल वर्मा ने और बतौर मुख्य अतिथि पूर्णिया विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रोफेसर पवन कुमार झा मौजूद रहे.

बदलाव से बातचीत में प्रोफेसर शंभु लाल वर्मा ने बताया कि ये पुस्तक उन युवाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी जो पूर्णिया के इतिहास को जानने में दिलचस्पी रखते हैं या फिर पूर्णिया को लेकर रिसर्च करना चाहते हैं. प्रोफेसर वर्मा ने बताया कि अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से यूरोपीय लोग पूर्णिया आने लगे। पहले नील की खेती ने उन्हें आकर्षित किया और बाद में जर्मनी के द्वारा कृत्रिम नील बना लेने के बाद वे जूट की खेती की तरफ प्रवृत्त हो गए। साथ ही, उन्होंने उन्नत केले की भी खेती पर जोर दिया। आलू की खेती की ओर भी उन्होंने स्थानीय कृषको को प्रेरित किया।
पूर्णिया में एक समय नील के कारखाने पूर्णिया, फारबिसगंज, अररिया, कटिहार आदि विशाल क्षेत्र में फैले थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय जूट की बहुत मांग थी, लिहाजा वे जूट की खेती पर आ गए।
पूर्णिया में यूरोपीय लोग आए तो यहां की विशाल प्राकृतिक संपदा से लाभ कमाने और रईसी से रहने के ख्याल से ही, पर वे यहीं के होकर रह गए। स्थानीय लोगों के बीच रच-बस गए। यूरोपीय जमींदारों और कृषकों के बीच संबंध अच्छे थे। उन्होंने क्षेत्र का विकास किया; जरूरत के मुताबिक सड़क, पुल व बांध बनवाए और रेलमार्ग भी लाया। स्थानीय लोगों को आधुनिक खेती की जानकारी दी। पूर्णिया को अच्छी तरह समझने के लिए यहां के यूरोपीय प्रवासियों के इतिहास को जानना जरूरी है।

पूर्णिया में व्यापार करने वाला नील जमींदार चार्ल्स पामर था, जो कलकत्ता के प्रसिद्ध सौदागर जान पामर का भतीजा था। आज के पूर्णिया कॉलेज की बिल्डिंग इन्हीं पॉमर परिवार के नाम पर पड़ी है । जिसे यूरोपियों द्वारा पूर्णिया के विकास का जीता जागता उदाहरण माना जा सकता है. पॉपर बंधुओं ने पूर्णिया के संसाधनों का दोहन करने के साथ साथ पूर्णिया के विकास में भी बहुत बड़ा योगदान दिया.

जब आप इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि पॉमर वो परिवार था जो पूरी तरह पूर्णिया में रच बस गया था. उन्होंने ना सिर्फ पूर्णिया की अच्छाई को अपनाया बल्कि पूर्णिया के विकास के लिए यहां के लोगों के साथ संधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़े. एक कारोबारी का मकसद अपना फायदा पहली प्राथमिकता होती है, शुरुआती दिनों में पॉमर परिवार का भी ऐसा ही था, लेकिन उनके यहां आने से विकास भी आया इसे झुठलाया नहीं जा सकता. प्रोफेसर शंभु लाल वर्मा के मुताबिक पूर्णिया में पहली रेल हो या फिर पहले डॉक्टर या फिर दूसरी सुविधि काफी कुछ पॉमर बंधुओं के आने के बाद पूर्णिया आई. रेल की बात ले लीजिए एलेक्जेंडर जान फार्ब्स ने पूर्णिया को पहली रेल दिलाई और उसी ने सुल्तानपुर गांव के पास फारबिसगंज (Forbesganj) बसाया। बाद में उनके बेटे ने पूर्णिया में अपनी कोठी बनवाई, जो आज भी गर्ल्स स्कूल के रूप में विराजमान है।

‘कभी पूर्णिया में: पूर्णिया के यूरोपीय निवासी इतिहास के आईने में’ पुस्तक ऐसे ही यूरोपियों की कहानी का एक संग्रह है. ये किताब अंग्रेजों के दमन के साथ साथ विकास के पहलू को भी दर्शाती है.

इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता किसान व ब्लॉगर श्री गिरींद्रनाथ झा थे और संयोजक डॉ. रमण थे। समापन भाषण और धन्यवाद ज्ञापन प्रतिष्ठित इतिहासकार प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र के किया.इसके अलावा कार्यक्रम में आकाशवाणी के पूर्व निदेशक श्री विजय नंदन प्रसाद, आकाशवाणी से ही अवकाश प्राप्त श्री प्रभात कुमार झा, पूर्णिया महिला महाविद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. रीता सिंहा, पूर्णिया विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग की अध्यक्षा डॉ. गीता अग्रवाल, पूर्णिया महिला महाविद्यालय की अंग्रेजी विभागाध्यक्षा डॉ. उषा शरण, शिक्षक नेता श्री अरविन्द कुमार सिंह, अवकाश प्राप्त राजनीति विज्ञान प्राध्यापक डॉ. रामेश्वर मिश्र, सेवानिवृत्त प्रशासक श्री अरविन्द कुमार झा, पेंशनर समाज व पूर्णिया सिविल सोसायटी के सचिव श्री दिलीप कुमार चौधरी, पूर्णिया कालेज के इतिहास के विभागाध्यक्ष श्री मनमोहन कृष्णा, भौतिक विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार सेन, उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. मोजाहिद, चटकधाम से पधारे साहित्य प्रेमी श्री गिरिजा नंद मिश्रा, गोविंद कुपूमार, प्रियंवद जायसवाल, लोकार्पित पुस्तक के दिवंगत लेखक के परिवार के लोग मौजूद रहे.

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