बदलाव प्रतिनिधि

साल 2015 में झाबुआ में विकास संवाद कार्यक्रम में जुटे पत्रकार साथी।

मीडिया के साथियों के साथ बैठकर कुछ महत्‍वपूर्ण मुद्दों पर नया जानने, आपसी समझ बनाने, एक—दूसरे के विचारों को समझने, अपने रोजाना के काम-काज से हटकर मैदानी इलाकों के आम लोगों की जिंदगी में झांकने  और विकास के तमाम आयामों पर एक बेहतर संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से विकास संवाद की सालाना सेमिनार का कार्यक्रम तय हो गया है। झांसी के करीब ओरछा में ‘मीडि‍या, बच्‍चे और असहि‍ष्‍णुता’ विषय पर 18-19 और 20 अगस्त को परिचर्चा रखी गई है।

बच्चों और महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा-शोषण के मामले तेज़ी से बढ़े हैं। एक तरफ शिक्षा के अधिकार और शिक्षा के महत्व पर प्रवचन होते हैं, वहीं दूसरी और ऐसी नीतियां बनती हैं, जो पढ़ने वाले बच्चों को आत्महत्या की तरफ धकेलती हैं। यह उल्लेख करना जरूरी है कि भारत में आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण “बीमारियाँ और अवसाद” है। ये बीमारियाँ और अवसाद कहीं “विकास” का सह-उत्पाद तो नहीं है ? विकास के नाम पर हम “निर्भरता और परतंत्रता” के भंवरजाल में तो नही फँस गए ?

आर्थिक नीतियों से आगे जाकर सामाजिक भेदभाव, साम्प्रदायिकता और राजनीति से प्रेरित हिंसा को समाज में बहुत विस्तार दिया गया। इसके दो कारण नज़र आते हैं; एक – जो नीतियों लागू की जा रही हैं, उन से समाज का ध्यान हट जाए और सम्पदा-सम्पत्ति की लूट जारी रह सके, दो – समाज पर तात्कालिक रूप से किसी एक धार्मिक मतावलंबियों का प्रभुत्व कायम किया जा सके। ये दोनों कारण केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं, इनका दायरा और असर वैश्विक है।ऐसे वक्त में समाज और देश में व्याप्त माहौल, राज्य की नीतियों और लगातर बदलते अपने चरित्र से जोड़ कर मीडिया  की भूमिका और कामकाज की पड़ताल होती रहना चाहिए। चुप रहना या पीछे हटना कोई विकल्प नहीं है।

मध्यप्रदेश में पहाड़ों की रानी पचमढ़ी, चित्रकूट, बांधवगढ़, महेश्वर, छतरपुर,  केसला,  चंदेरी,  झाबुआ और कान्हा में पत्रकारों का जमावड़ा हो चुका है। इस कॉन्क्लेव में अब तक पी साईनाथ, अनुपम मिश्र,  देविंदर शर्मा,  आनंद प्रधान, डॉ अमितसेन गुप्ता, डॉ कपिल तिवारी, राजेश बादल, रजनी बख्शी, अरविंद मोहन, अरूण त्रिपाठी, अन्नू आनंद, चंद्रभूषण, प्रशांत भूषण, उर्मिलेश, वि‍नोद रायना, डॉक्‍टर रि‍तुप्रि‍या,  मेधा पाटकर सहित कई वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता संबोधित कर चुके हैं। हर वर्ष इसमें देश भर के लगभग सौ-सवा सौ पत्रकार इकठ्ठा होते हैं।

वि‍कास संवाद के बारे में

उदारीकरण और बाजारवाद के प्रभावों के चलते जब मीडिया पर इसका असर गंभीर रूप से दिखाई देने लगा और वंचित और हाशिए के लोगों के सरोकारों का दायरा लगातार सिमटता नजर आया तब मध्यप्रदेश के कुछ पत्रकार साथियों ने एक प्रयोग की शुरूआत की। विकास संवाद का यह प्रयोग मीडिया के माध्यम से जनसरोकार के मुद्दों को उठाने और उन्हें परिणाम तक पहुंचाने की कोशिश के रूप में था। यह कोशिश पिछले 15 सालों से लगातार जारी है। विकास संवाद देश में समान सोच वाले पत्रकारों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत मीडिया फैलोशिप प्रोग्राम, मीडिया फोरम्स, शोध एवं जमीनी स्थितियों का विश्लेषण, स्रोत केंद्र और मैदानी सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ाव के लिए काम चल रहा है।


विकास संवाद के इस आयोजन के संदर्भ में आप इन साथियों से संपर्क कर सूचना हासिल कर सकते हैं।

राकेश दीवान, (9826066153) सचि‍न कुमार जैन, (9977707847) राकेश कुमार मालवीय (9977958934)और वि‍कास संवाद के सभी साथी

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