आशुतोष शर्मा
देश के कई राज्यों में किसानों का आंदोलन चल रहा है। किसानों का दावा है कि उन्हें उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। दूसरी तरफ राजनीतिक दल और मीडिया किसानों के आंदोलन की प्रकृति और कारणों के निर्धारण में जुटे हैं। देश में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो ये मान रहा है कि उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज माफी की घोषणा से दूसरे राज्यों में किसानों के आंदोलन को बल मिला है। ऐसे में कुछ लोग यह भी महसूस कर रहे होंगे कि कुछ दल किसान आंदोलन को उकसाने का भी काम कर रहे हैं। हालांकि, कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि आंदोलन रबी फसल की कटाई के ठीक बाद शुरू हुआ जो कि आंदोलन के गहरी जड़ों की ओर संकेत देता है।आंकड़ों पर गौर करें तो 2016-17 में औसत मंडी भाव पर (फसल कटाई के महीनों में ) अरहर के किसानों को प्रति हेक्टेयर 2672 रूपये का नुकसान हुआ। जबकि साल 2015-16 में किसानों को 23,132 रूपये का शुद्ध लाभ हुआ था। चना की खेती करने वाले किसानों को 2016-17 में प्रति हेक्टेयर 23,027 रूपये का शुद्ध लाभ हुआ जो 2015-16 में 16,600 रूपये था। इसी तरह मसूर की खेती करने वाले किसानों को साल 2016-17 में प्रति हेक्टेयर 4,067 रूपये का शुद्ध लाभ हुआ जो 2015-16 में 14, 699 रूपये था।
प्याज की खेती करने वाले किसानों की बात करें तो साल 2016-17 में प्याज के किसानों को प्रति हेक्टेयर 70,536 रूपये का नुकसान हुआ जबकि 2015-16 में किसानों को प्रति हेक्टेयर 51,266 रूपये का नुकसान हुआ था। वहीं आलू की खेती करने वाले किसानों को 2016-17 में प्रति हेक्टेयर 69,415 रूपये का नुकसान हुआ जबकि साल 2015-16 में आलू के किसानों को प्रति हेक्टेयर 3,299 रूपये का नुकसान हुआ था। इन आंकड़ों से साफ है कि 2016-17 में बम्पर फसल के बावजूद अरहर, प्याज और आलू किसानों को उत्पादन लागत भी नहीं मिल सका
कर्ज माफी निश्चित रूप से एक पसंदीदा नीति नहीं हो सकती। भारतीय रिज़र्व बैंक के अलावा कई अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक पंडितों ने “कर्ज माफी” के नकारात्मक पहलुओं पर प्रकाश डाला है। दाल और प्याज की कीमतों में वृद्धि मीडिया की सुर्खियों बनती हैं। सरकार बढ़ी कीमतों को कम करने के लिए कई विकल्प आजमाती है। जिसमें व्यापार शुल्क एवं प्रशासनिक माध्यमों जैसे विकल्प शामिल हैं। हालांकि इस वर्ष किसानों को संकट से राहत देने के लिए कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया गया है। कई रिपोर्ट्स एवं अध्ययनों में तर्क दिया गया है कि कृषि संकट सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है।
ईक्रिएर की एक रिपोर्ट “प्राइस डिस्टॉरशन इन इंडियन एग्रीकल्चर” (2017) के मुताबिक 2004-05 से 2013-14 के दौरान औसतन 72 फीसदी समय निर्यात के लिए निषिद्ध फसलों की घरेलू कीमतें निर्यात क्षमता से नीचे थीं, जिसका मतलब था कि किसानों को निर्यात से काफी लाभ मिलता। यदि भारत के किसानों को समृद्ध बनाना है तो यह जरुरी है कि निर्यात को खोला जाये। कृषि आयात-निर्यात की नीति ऐसी होनी चाहिए कि जब आवश्यक वस्तुओं का मूल्य बहुत अधिक हो जाए तो सरकार आयात शुल्क को कम या शून्य करे और कीमतों में गिरावट आने पर इसे बढ़ाया जाए। आयात शुल्क की दर इतनी होनी चाहिए कि आयात की जाने वाली वस्तु की कीमत भारत पहुँचने पर कम से कम उस वस्तु के न्यूनतम समर्थन मूल्य के बराबर हो। इससे भारत में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को प्रभावी बनाने में सरकार को मदद मिलेगी एवं किसानों को फायदा होगा।अगर समय रहते ठोस कदम नहीं लिए गए तो भारत में किसानी अभिशाप बन जायेगी। कृषि संकट का नतीजा होगा कि मानसून के अच्छे होने के बावजूद ग्रामीण उपभोग की मांग में कमी आएगी, क्रेडिट डिफॉल्ट बढ़ेगा, शहरों में प्रवास बढ़ेगा। अगर कीमतों में सुधार नहीं हुआ तो इस साल की तरह दलहन, प्याज और आलू की बम्पर फसल इतिहास बन जाएगी। दालों के सन्दर्भ में भारत की आत्मनिर्भरता एक दूर का सपना बन कर रह जायेगा। यह समझना महत्वपूर्ण है कि जब तक किसानों को बेहतर कीमत नहीं मिलेगी, उनके दुःख और संकट साल दर साल बढ़ते चले जायेंगे। यह आगे हड़तालों, विरोध-प्रदर्शन, आंदोलन का रूप लेते रहेंगी। ऋण राहत की मांग लगातार बनी रहेगी लेकिन यह जमीनी समस्या का समाधान नहीं कर पायेगी।
डॉ आशुतोष शर्मा। पटना, बिहार के निवासी। मुंबई यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी। समकालीन आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में शोधरत आशुतोष का सपना गांवों के जमीनी हालात बदलने का है। आप इनसे 9540739759 पर संपर्क कर सकते हैं।


