राकेश कायस्थ

मुंबई के लोकल की ये दो तस्वीरें हैं। एक तस्वीर फर्स्ट क्लास की है और दूसरी सेकेंड क्लास की। दोनो सुबह की है। फर्स्ट क्लास के डिब्बे में भीख मांगने वाली एक लड़की चढ़ती है। सीट पर बैठा नौजवान अपने लैपटॉप पर काम कर रहा है। लड़की भीख मांगना छोड़कर लैपटॉप देखने लगी है। आंखों में असाधारण किस्म की जिज्ञासा है। चेहरे पर कौतुक के कई भाव आ रहे हैं और जा रहे हैं। लड़की से रहा नहीं जाता और हिम्मत करके पूछ बैठती है— अंकल ये छोटा टीवी है या मोबाइल फोन। अच्छा इसमें फोटो भी आता है, फिर तो गाने भी आते होंगे। अगला स्टेशन आ जाता है, लड़की पैसे के बदले जिज्ञासा लिये ट्रेन से उतर जाती है।

दूसरी तस्वीर सुबह करीब पांच बजे की है। दादर स्टेशन से एक आदमी दोनो हाथों से ढेर सारे अखबार उठाये ट्रेन में दाखिल होता है। मेरे सामने वाली सीट पर वह पांच भाषाओं के अख़बारों के अलग-अलग थाक बनाना शुरू करता है। हिंदी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी और पांचवा संभवत: तेलुगु। रविवार का दिन है। मैगजीन सेक्शन अलग है। उसका काम सभी भाषाओं के अख़बारों में मैगजीन सेक्शन एक-एक करके डालना भी है। हाथ बिजली की तेजी से चलते हैं और लगभग पांच मिनट में पूरा काम खत्म। माहिम आते ही वह आंधी की तरह उतरता है और नज़रो से ओझल हो जाता है।

पांच साल पहले जब मैं दिल्ली से मुंबई आ रहा था, तो यहां रहने वाले मेरे दोस्त पूछते थे— लोकल में ट्रैवल कर लोगे? जवाब में मैं हंसता था। जब मेरी सैलरी बहुत कम थी, तब भी मैं ऑफिस आने-जाने के लिए कार का ही इस्तेमाल करता था। फिर लोकल का सवाल कहां उठता है? मुंबई में भी शुरू के तीन साल तक मैने कार का इस्तेमाल किया। शुरूआती दो साल खुद ड्राइव किया और फिर एक साल के लिए अपेक्षाकृत रूप से एक महंगे ड्राइवर को हायर किया जो गायक बनने आये थे और बुरे वक्त में मेरी गाड़ी चला रहे थे।

मुझे समझ में आया कि जिस तरह बनारसी लोगों की बातचीत का प्रिय मुद्दा प्रात:कालीन दिव्य निपटान होता है और बिहार वालों का पॉलिटिक्स उसी तरह मुंबई के लोगो का फेवरेट टॉपिक ट्रैफिक जाम है। कितने घंटे में पहुंचे, कहां-कहां फंसे, इस पर बात किये बिना दिन पूरा ही नहीं हो सकता। मुंबई में तीन साल गुजारने के बाद ठीक से समझ में आया कि `लोकल में ट्रैवल कर लोगे’ का सवाल इतना ज़रूरी क्यों था। हिम्मत करके पहली बार दाखिल हुआ। फिर दूसरी बार। फिर तय किया कि हफ्ते में कम से कम तीन दिन। सिलसिला शुरु हुआ तो चलता ही गया। अब लगता है कि जिन बरसों में मैंने लोकल में यात्रा नहीं की, उनमें मैने बहुत कुछ खोया।

लोकल में सिर्फ आप नहीं चलते, आपके साथ-साथ चलती हैं, जीती-जागती अनगिनत कहानियां। यहां आकर आपको समझ में आता है कि मुंबई में सार्वजनिक संवाद या जनसंपर्क की कम से कम चार भाषाएं हैं। ट्रेन में आपको सबसे ज्यादा गुजराती सुनाई देती है, जिस तरह बेस्ट की बसो में सिर्फ मराठी, कॉरपोरेट हाउसेज़ में केवल अंग्रेजी और सड़कों पर हिंदी। लोकल के अपने कायदे है, अपना मनोविज्ञान है, अपना अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र भी।

ठसाठस भरी ट्रेन में स्टेशन के हिसाब से किस उतरने वालों की लाइने अपने आप बन जाती हैं, ये एक रहस्य है। बीस का कोई लड़का अगर आपसे थोड़ा बाहर की तरफ आने को कह रहा है, तो उसे बेदअबी मत मानिये। दरवाजे के कोने पर अधलटके खड़ा होना एक स्पेशल स्टेटस है, जो वह आपकी उम्र का ख्याल करते हुए वह आपको देना चाहता है, ताकि आप ठंडी हवा खा सकें।

अंधेरी से चर्गगेट के तीन महीने का पास साढ़े सत्रह सौ रुपये में बनता है। कोई भी अफोर्ड कर सकता है। लेकिन इस शहर में ज्यादातर लोग नहीं कर पाते। फर्स्ट क्लास में अचानक शोर उठता है— ऐ दिखता नहीं तेरे को, फर्स्ट क्लास है। डिब्बे में कदम रखने वाला उल्टे पांव वापस लौट जाता है। मैं आजतक नहीं समझ पाया कि चेहरे से लोग कैसे पहचान लेते हैं कि यह आदमी फर्स्ट क्लास का टिकट नहीं खरीद सकता और बेचार डिफॉल्टर चुपचाप किस तरह यह मान लेता है कि हां वाकई मैं गलत हूं। सेकेंड क्लास का हाल देखने के लिए छुट्टी वाले दिन मैने कई बार उसमें यात्रा की। फर्स्ट क्लास में जिस सीट पर तीन लोग बैठते हैं, सेकेंड क्लास में उसी सीट पर चार लोग बैठते हैं। गरीबों का दिल सचमुच ज्यादा बड़ा होता है।

मैं लोकल में दिखाई देने वाली कहानियों की बात कर रहा था। कहानियां इतनी है कि सुनाने बैठूं तो पूरी सीरीज़ लिखनी पड़ी। इसी लोकल में मेरी मुलाकात डॉ. संदीप देसाई से हुई। धाराप्रवाह कई भाषाएं बोलते हैं। उच्च शिक्षा से जुड़े अध्यापक हैं। खुद को भिखारी प्रोफेसर कहते हैं। हाथ में एक डोनेशन बॉक्स होता है। चंदे का इस्तेमाल समाज के सबसे वंचित तबकों के बच्चो के लिए स्कूल चलाने में करते हैं। मेरा उनसे दस रूपये, एक मुस्कान और एक थैक्यू का रिश्ता है।
ऐसा ही रिश्ता एक अनाम शख्स से है, जिससे आजतक बात नहीं कर पाया। एलफिस्टन रोड पर सवार होता है। मोहम्मद रफी का एक गाना गाता है और बिना किसी से एक शब्द बोले चुपचाप बांद्रा में उतर जाता है। वह भिखारी नहीं है, शायद कोई दिलजला कलाकार है। सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ अपने कॉलेज के दिनों का एक किस्सा मुझे बताया था। कॉलेज के दिनों में उन्हे चर्चगेट जाना होता था। रास्ते में एक नौजवान ट्रेन में सवार होता था और ऑल इंडिया रेडियो के न्यूज़ रीडर वाले स्टाइल में अपने बनाये समाचार पेश करता था। तीस्ता कहती हैं, हम सब उसका रोज़ बेसब्री से इंतज़ार करते थे। समाचार सुने बिना यात्रा अधूरी लगती थी।

दिलचस्प कहानियों की इस सीरीज़ में एक जीते-जागते किरदार के बारे में मुझे मेरे सहकर्मी श्रीधर राव ने बताया। श्रीधर को ट्रेन में एक ऐसे बुजुर्ग अक्सर नज़र आते हैं, जिनके पास कई अख़बार और मैगजीन होते हैं। थर्मस में गर्म चाय होती है और साथ में प्लेइंग कार्ड भी। बातचीत शुरू हुई तो उन्होने बताया कि वे नाला सोपारा में एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं। बेटे की नई शादी हुई है। बेटा काम पर चला जाता है, अब बहू के साथ घर में कैसे रहें? बहू नाश्ता, खाना, चाय सबकुछ एक साथ बनाकर दे देती है। वे सुबह से ट्रेन में बैठते हैं। कई दोस्त बन गये हैं, उनसे गपशप होती है। ताश खेलते हैं, अख़बार पढ़ते हैं और शाम को घर लौट आते हैं। चलना और चलते रहना ही उनकी जिंदगी है।

लोकल की कहानियां गुदगुदाती हैं, भावुक करती हैं, डराती हैं और कई बार फूट-फूटकर रोने को भी मजबूर करती हैं। एलफिस्टन रोड पर जो कुछ हुआ, उसपर मेरे बहुत से दोस्तो ने बहुत कुछ लिखा। मेरी हिम्मत नहीं हुई कुछ बात कर सकूं। मैं लोकल को उसकी सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीना चाहता हूं। रात को कभी दस बजे आसपास लौटता हूं तो ट्रेन में भीड़ बहुत कम होती है। आराम से बैठा रहता हूं, जिन्हे सीट नहीं मिली होती है, वे शराफत से खड़े रहते हैं। ट्रेन अपनी रफ्तार से भागती रहती है। मुझे लगता है, भारत दुनिया का सबसे अच्छा देश है और मेरी जिंदगी पूरी तरह मुकम्मल है। इससे ज्यादा कुछ और चाहिए नहीं।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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