पुष्यमित्र

बिहार में एनडीए के सीटों का हिसाब किताब तो हो गया। इस हिसाब किताब में सबसे ध्यान देने वाली बात यह हुई कि कोसी, अंग और मगध के इलाकों से बीजेपी गायब हो गयी है। इन इलाकों में सिर्फ दो सीट अररिया और औरंगाबाद में बीजेपी लड़ रही है। बाकी सीटें उसने अपने सहयोगी दल के लिये छोड़ दिया है। आखिर बीजेपी ने ऐसा क्यों किया इस बारे में बढ़िये वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र का विश्लेषण, पुष्यमित्र इन दिनों बिहार के गली-कूचों में घूम-घूमकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं ।

बिहार एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर अंतरकलह सामने आनी शुरू हो चुकी है और आगे पार्टी नेता टिकट बंटवारे को लेकर कितनी आवाज उठाते हैं ये भी देखना दिलचस्प होगा जैसा कि हर चुनाव के वक्त होता ही है, लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी की पूर्वी बिहार में मौजूदगी की । जहां चुनाव से पहले ही बीजेपी नदारत होती नजर आ रही है । एनडीए में सीट बंटवारा कुछ इस कदर किया गया है कि बीजेपी खुद को यूपी से सटे बिहार के हिस्सों तक समेट लिया है । दिलचस्प बात ये है कि मगध, कोसी, अंग के बड़े इलाक़े में जिनमें लोकसभा की 18 महत्वपूर्ण सीटें हैं, उनमें बीजेपी सिर्फ़ 2 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रही है, ये सीटें हैं – अररिया और औरंगाबाद। बाकी 16 सीटें बीजेपी ने अपने सहयोगियों JDU  और LJP के लिए छोड़ दी हैं। जबकि भोजपुर की सात सीटों में से 5 पर बीजेपी चुनाव लड़ रही है, तिरहुत और चम्पारण के इलाक़े में ज़्यादातर सीटों पर बीजेपी मौजूद नज़र आती है।

सीटों के बँटवारे में एक खास बात यह भी नज़र आती है कि बीजेपी ने खासकर उन इलाक़ों से चुनाव लड़ने को तरजीह दी है, जो यूपी से सटे हैं और जिन पर सवर्णों का थोड़ा-बहुत दबदबा है। जिन इलाक़ों में मुसलिम, दलित, पिछड़ी जातियों का प्रभाव है, वहाँ से वह चुनाव लड़ने से बच रही है और अपने सहयोगियों को वे सीटें दे दी हैं। इस मामले में कोसी का इलाक़ा परफ़ेक्ट उदाहरण है। यहाँ की सात सीटों में जिनमें मुसलिमों और यादवों का बड़ा प्रभाव है, वहाँ बीजेपी ने सिर्फ़ एक सीट – अररिया पर अपना उम्मीदवार दिया है। जबकि 2014 में उसने छह सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। मोदी की लहर के उस दौर में भी ये छह उम्मीदवार पराजित हो गए। संभवतः इसी वजह से बीजेपी इस बार इस इलाक़े में कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहती ।अंग क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण सीट भागलपुर पर भी बीजेपी को 2014 में हार का मुंह देखना पड़ा था। सैयद शाहनवाज हुसैन जैसे नेता मोदी लहर में पराजित हो गए थे। रही बात मगध की तो वह जदयू और नीतीश का इलाक़ा माना ही जाता है।

दिलचस्प बात यह भी है कि जिन इलाक़ों में इस बार बीजेपी लड़ने से बच रही है वह ऐतिहासिक रूप से व्रात्यों का इलाक़ा है। इनमें बुद्ध और दूसरे आर्य विरोधी चिंतकों का प्रभाव रहा है। जबकि भोजपुर और तिरहुत में आर्यों का गहरा प्रभाव रहा है। आज भी इन इलाक़ों में सवर्णों का प्रभुत्व दिखता है। लंबे अनुभव के बाद बीजेपी ने यह महसूस किया है कि वह उन्हीं इलाक़ों में जीत सकती है जहाँ आर्यों और ख़ासकर सवर्णों का दबदबा दिखता है।

एक रणनीति यह भी है कि सहयोगी दल जद(यू) को मुसलमानों के कुछ वोट मिल सकते हैं। क्योंकि बीजेपी के साथ रहते हुए भी वह अक्सर धर्मनिरपेक्षता और मुसलिमों के पक्ष की बातें करती है। इसलिए उसने कुछ सीटों पर मुसलिम उम्मीदवारों को उतारने की तैयारी की है। हालाँकि जद(यू) के मुसलिम उम्मीदवार, पार्टी को मुसलमानों के कितने वोट दिला पाएँगे, यह कहना मुश्किल है। मगर जहाँ राज्य का यादव वोटर राजद के पक्ष में है, जद(यू) ज़रूर कुछ अति पिछड़ों का वोट हासिल कर सकती है।

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल ।