देवांशु झा

ऐसा सितारा कभी-कभार चमकता है, जिसमें किसी हॉलीवुड हंक सी अदा हो, किसी आदर्श पौराणिक भारतीय चरित्र जैसा सुघड़ रूप हो, जो नायक और खलनायक दोनों ही किरदारों को जीते हुए तालियां बटोरता रहा हो, जो स्टारडम में कभी महान अमिताभ बच्चन को टक्कर दे चुका हो और जो अदाकारी के विभाग में भी हमेशा अपनी उपयोगिता साबित करता रहा हो। विनोद खन्ना अपनी तरह के अकेले हीरो थे। उनकी आंखें, जब-जब हमारी आंखों के सामने आती हैं, ऐसा लगता है जैसे कोई सम्मोहन की झील हमें अपनी ओर खींच रही है। उनकी मुस्कराहट संक्रामक है और मर्दानगी बेमिसाल।

विनोद खन्ना फिल्म के ऐसे दौर की उपज हैं, जब हिन्दी सिनेमा रूमानियत और युवा विद्रोह के दो किनारों के बीच डूब और तैर रहा था। 1968 में आई ‘मन का मीत’ उनकी पहली फिल्म थी। उसके बाद तकरीबन दो साल तक वो कभी हीरो, कभी विलेन और कभी सहायक किरदारों को निभाते हुए हाशिये पर ही रहे। 1971 में आई ‘मेरा गांव मेरा देश’, विनोद खन्ना के जीवन की निर्णायक फिल्म थी। यूं तो वो उस फिल्म में डकैत बने थे लेकिन ये तय हो गया था कि डकैत आने वाले दिनों में हमारे दिलों पर राज करने वाला है। इसी साल गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ से विनोद खन्ना एक एक्टर के तौर पर पहचाने गए। फिर 1972 से 76 तक विनोद खन्ना जलते बुझते रहे। उनके स्टारडम का असल दौर तब शुरू हुआ और जब सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी बनने लगी।

जेहन में बसे विनोद खन्ना

तुम्हारा चेहरा चलता रहा है मुझमें
जैसे अवचेतन में बैठा रहता है
कोई दुर्निवार सा मोह
मैं रूप-गुण का बंधन तोड़ना चाहता हूं
बल्कि मानता हूं कि स्वस्थ सौन्दर्य बोध में
सबसे बड़ी बाधा है रूप-गुण का आतंक
पर तुम से कभी पार न पा सका
तुम्हारी आंखों में कृष्ण का सम्मोहन है
और हंसी जैसे हर ले जाती है सब कुछ
टुड्ढियों का टेढ़ापन एकदम तराशा हुआ
मैं सिनेमाई सितारों के मोहजाल से
छूट चुका हूं न जाने कब का
बस एक तुम ही रह गए
मेरी रूह में अपने रूप का प्रेत लिये
मैं अपने चेहरे के चप्पे-चप्पे पर
तुम्हें चिपकाता रहा हूं बरसों
कभी सामने होते तो देखता छू कर
कैसी होती है मूरत में प्राण-प्रतिष्ठा
सुना है तुम बाहर से जितने सुंदर थे
भीतर से भी सहज थे उतने ही
सच ही रहा होगा ऐसा
वरना मुझे किसी फिल्मी सितारे में
क्यों नजर आती आध्यात्मिक आभा।

हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एन्थनी और परवरिश जैसी फिल्मों में उनका सिक्का बच्चन के बराबर का चला। और कुछ दीवानों ने उनमें सुपरस्टार बच्चन के समानांतर दूसरे सुपरस्टार की छवि देखी। लेकिन सत्तर के दशक के आख़िरी वर्षों और अस्सी के दशक की शुरुआत में जब उनका जलवा जोरों पर था, तभी वो बिलकुल विपरीत दुनिया में सैर करने चले गए। उन्हें ओशो के अध्यात्म ने खींचा। बड़ी कुरबानी देकर विनोद खन्ना सितारों की चमकती दुनिया छोड़कर संन्यास की शांत नदी के किनारे बैठ गए।

करीब साठ-आठ साल के बाद वो वापस लौटे। सत्यमेव जयते और इंसाफ जैसी फिल्मों से उनकी अच्छी वापसी हुई लेकिन एक दौर उनके हाथों से फिसल चुका था। नए दौर में रिहाई, दयावान, सूर्या, चांदनी, बंटवारा और क्षत्रिय जैसी फिल्मों से वो अपनी धमक बरकरार रखने में कामयाब रहे। इस दौरान दयावान उनकी सबसे बड़ी फिल्म थी, जिसमें उन्होंने अपने तपे हुए अभिनय का लोहा मनवाया।

2005 के बाद भी विनोद खन्ना फिल्मों में सक्रिय रहे। रिस्क, वॉन्टेड, दबंग जैसी फिल्मों में विनोद खन्ना की बुजुर्गियत में एक किस्म के गर्वीले बादशाह का रंग नजर आया। पिछले डेढ़ साल से वो कम दिख रहे थे। 2015 में आखिरी बार दिलवाले में उन्हें देखा गया। हालांकि उनके कम नजर आने को प्रशंसकों ने बीमारी से जोड़ कर नहीं देखा। फिर एक दिन विनोद खन्ना की वो तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई जिसमें एक निहायत ही खूबसूरत हीरो वक्त के कठोर हाथों में दबकर अपने भूत की छाया भर रह गया था।

अब वो छाया भी हमेशा के लिए उड़ चुकी है । मेरे, आपके, … हम सबके अपने विनोद खन्ना नहीं रहे। 


devanshu jha

देवांशु झा। झारखंड के देवघर के निवासी। इन दिनों दिल्ली में प्रवास। पिछल दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। कलम के धनी देवांशु झा ने इलेक्ट्रानिक मीडिया में भाषा का अपना ही मुहावरा गढ़ने और उसे प्रयोग में लाने की सतत कोशिश की है। आप उनसे 9818442690 पर संपर्क कर सकते हैं।

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