गौरी लंकेश की हत्या से देश स्तब्ध है। पत्रकार-साहित्यकार वर्ग सहमा हुआ है। आखिर अभिव्यक्ति की आज़ादी के मतलब क्या हैं? हिंसा और उन्माद के इस दौर में कैसे अपनी बात कही जाए, ये एक बड़ा सवाल बन गया है। ऐसे ही तमाम मुद्दों को लेकर पत्रकार विश्वदीपक ने वरिष्ठ कथाकार और साहित्यकार उदय प्रकाश से बात की। ये बातचीत हम नवजीवन से साभार बदलाव के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

विश्व दीपक- क्या गौरी लंकेश और पिछले साल कर्नाटक में मारे गए प्रख्यात साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या की वजह एक है?

उदय प्रकाश– कलबुर्गी वाचन साहित्य के एक प्रख्यात शख्सियत थे और उनको इस क्षेत्र में बेहतरीन काम के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। कन्नड़ भाषा में इस तरह के साहित्य की परंपरा 11वीं सदी से चली आ रही है। दरअसल, यह साहित्य दलितों का साहित्य है। वाचन साहित्य में दबे-कुचले तबकों की तकलीफ और गुस्से का इजहार मिलता है। इस साहित्य में तार्किक सोच, साफ किरदार और एकता का संदेश भी मिलता है। यह राजनीतिक साहित्य नहीं था लेकिन इसने एकता और चेतना की पवित्रता की भावना को जगाया, इसलिए जातिवादी-ब्राहमणवादी ताकतों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कलबुर्गी 11वीं सदी के दलित संत मदारा चेन्नैया के आधुनिक अवतार थे, जिन्हें इस परंपरा का पहला कवि माना जाता है। कलबुर्गी ने वाचन साहित्य पर 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनका सारा साहित्य शोषक, कट्टर और नफरत पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ था। वह मानवता के पक्षधर थे। और यही वजह है कि उनकी हत्या कर दी गई।

गौरी लंकेश के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ। इसलिए इसका संदेश बिल्कुल साफ और स्पष्ट है। जो कोई भी एकता और तार्किकता के लिए और जातिवादी व्यवस्था और कट्टर ब्राह्मणवादी ताकतों के खिलाफ आवाज उठाएगा उसे गौरी लंकेश की तरह ही चुप करा दिया जाएगा। वह सिर्फ एक पेशेवर पत्रकार नहीं थी, बल्कि एक योद्धा और सपने देखने वाली महिला थीं। वह वाचन साहित्य की परंपरा से जुड़ी हुई थीं। अपनी पत्रकारिता में वह एकता की बात करती थीं। एकता का अर्थ समानता है। उन्होंने ऐसे समाज का सपना देखा था, जहां दो इंसानों के बीच कोई अंतर न हो। लेकिन उनके विचारों ने ऐसे लोगों को नाराज कर दिया जो गैर-बराबरी और मतभेदों में विश्वास करते हैं। इसलिए उनकी हत्या कर दी गई। मोटरसाइकिल पर आए हमलावरों ने करीब से आकर उन्हें ठीक उसी तरह गोली मारी जैसे उन्होंने कलबुर्गी को मारी थी।

विश्वदीपक- क्या गौरी की हत्या के लिए नफरत की संस्कृति जिम्मेदार है?

उदय प्रकाश- निश्चित तौर पर। हमें इस बात को समझना होगा कि संस्कृति राजनीति से कहीं गहरी चीज है, जिसका समाज पर गहरा प्रभाव होता है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह की संस्कृति विकसित हुई है वह भयभीत करती है। मैं यहां पर सलमान रुश्दी को याद करना चाहूंगा। हाल के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आज का अमेरिका विभिन्नताओं वाला खुला अमेरिका नहीं है, जिसे वह पसंद किया करते थे। रुश्दी के अनुसार ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका हमेशा के लिए बदल गया। ठीक यही बात भारत के साथ भी हुई। भारत पहले वाला भारत नहीं रहा। वर्षों से विकसित हो रही घृणा, भीड़ द्वारा हत्या और सांप्रदायिक विभाजन की संस्कृति गौरी लंकेश की हत्या के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। आप लंकेश की हत्या और गांधी की हत्या के बीच एक समानांतर रेखा खींच सकते हैं। कट्टरवादी हिंदू दोनों को बर्दाश्त नहीं कर सकते। जिस विचार ने गांधी की हत्या की, उसी ने गौरी की हत्या की।

विश्वदीपक- क्या आप मानते हैं कि लेखक-पत्रकार आसान शिकार हैं?

उदय प्रकाश– केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में लेखक और पत्रकार आसान शिकार हैं। उन पर हमला करना, उनकी हत्या करना आसान है क्योंकि वे अकेलेपन में जीते हैं। वे असंगठित होते हैं। आप इतिहास उठाकर देख लीजिए। आपको अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें लेखकों-पत्रकारों को निशाना बनाया गया। सोवियत में जब कम्युनिस्टों की सत्ता थी, जो हर इंसान के बीच बराबरी और भाईचारे का दावा करती है, उस दौर में भी सैकड़ों लेखकों को निर्वासन झेलना पड़ा। मार्क आदानोव, ब्लादिमीर नाबोकोव और नोबेल पुरस्कार विजेता इवान बुनिन जैसे लोगों को देश निकाला झेलना पड़ा। हिटलर को तो किताबों से ही नफरत थी। वह उन्हें आग के हवाल करवा देता था। उसने कई लेखकों की हत्या करवाई।

तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के साथ क्या हुआ। उन्हें बोलने का हक हासिल करने के लिए कोर्ट जाना पड़ा। सोचिए जरा उन्हें किस तकलीफ से गुजरना पड़ा होगा। एक लोकतांत्रिक-सेकुलर देश में एक लेखक वो नहीं लिख सकता, बोल सकता जो वह कहना चाहता है। खुद लंकेश का उदाहरण देख लीजिए। लंकेश के एक दोस्त ने उन्हें सलाह दी कि फेसबुक या सोशल साइट्स पर कुछ लिखने से पहले उन्हें सोचना चाहिए। पर उन्होंने मना कर दिया। लंकेश ने कहा कि मैं फेसबुक, सोशल साइट्स पर जो भी लिखती हूं वो मेरी ईमानदार प्रतिक्रिया है। उनका भरोसा था कि एक लेखक-पत्रकार को वही बोलना या लिखना चाहिए जो उसे सही लगता है। उनकी यही सोच उनके लिए जानलेवा साबित हुई। लोकतांत्रिक देश में विरोध की आवाज को सुना जाना चाहिए। अफसोस की बात ये है कि हमारा लोकतंत्र एकाधिकारवादी-तानाशाही सत्ता में बदलता जा रहा है।

विश्वदीपक- नफरत, हिंसा के इस महौल में एक पत्रकार-लेखक की क्या हैसियत है, वह क्या कर सकता है?

उदय प्रकाश- जब मुझे लंकेश की हत्या की खबर मिली तब मैं बीटीआर भवन में आयोजित एक सभा से लौट रहा था। ‘नॉट इन माई नेम’ के बाद दिल्ली में ये पहली बड़ी नागरिक सभा थी, जिसमें सभी तरह के लोग शामिल हुए थे। इसमें बौद्धिक, सामाजिक कार्यकर्ता, उदारवादी, ट्रेड यूनियन से लेकर छात्र संगठन तक के लोग शामिल थे। वहां मौजूद लोग सांप्रदायिकता-कट्टरता के मुकाबले के लिए रणनीति बनाने पर विचार कर रहे थे। जो मैंने वहां कहा, वही यहां आपसे कहना चाहता हूं। सांप्रदायिकता और फासीवाद से मुकाबला केवल राजनीति से नहीं किया जा सकता। ये केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं है क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहराई से सामाजिक-सांस्कृतिक जमीन में धंसी हुई हैं।

मैं बहुत स्पष्टता से कहना चाहता हूं कि अब तक हम लोग सांप्रदायिकता और फासीवाद से लड़ने के लिए जो भाषा इस्तेमाल कर रहे थे वो किसी काम की नहीं है। ये भाषा अर्थहीन हो चुकी है। बार-बार उन्हीं नारों को दोहराने से कुछ नहीं होगा। सबसे पहले हमें एक नई भाषा, नये मुहावरे गढ़ने होंगे। हम सचमुच बेहद खतरनाक दौर में रह रहे हैं। आज के दौर में सभी अच्छे नारे, मुहावरे, शब्दावलियां उन लोगों ने हड़प ली हैं जो समाज को विभाजित करने का काम करते हैं। बात ये है कि अगर हम अपनी भाषा की लड़ाई हार गए, संस्कृति के मैदान में परास्त हो गए, तो राजनीतिक लड़ाई नहीं जीत सकते। इस हिसाब से देखें तो राजनीति तीसरे नंबर पर आती है। हमें सिर्फ दिखाने के लिए राजनीतिक होने की जरूरत नहीं है। गांधी को याद कीजिए। उनके कई फैसले अराजनीतिक लग सकते हैं। यहां तक कि कई बार वे अतार्किक भी लगते हैं, लेकिन आखिरकार वही फैसले हमारे दौर के सबसे बड़े राजनीतिक फैसले साबित हुए।

विश्वदीपक- हिंदी में लंकेश जैसे पत्रकारों की कमी क्यों है?

उदय प्रकाश- कन्नड़ में विद्रोही लेखकों की परंपरा रही है। कुछ विद्रोह गौरी लंकेश को उनके पिता पी. लंकेश से विरासत में भी मिली थी। मैं आपको एक दूसरे लेखक के बारे में बताना चाहता हूं जिनका नाम था श्रीनिवास। वे जन्म से ब्राह्मण थे, लेकिन उन्होंने अपनी सवर्ण पहचान को त्यागकर अपने नाम के आगे शूद्र जोड़ा। वे शूद्र  नाम की एक क्रांतिकारी पत्रिका भी निकालते थे जो कर्नाटक में बेहद लोकप्रिय थी। यथास्थितिवादियों को चुनौती देने के मामले में उनका योगदान अतुलनीय है। दूसरी तरफ हिंदी असल में, अपने मूल में यथास्थितिवाद की भाषा है। हिंदी की पूरी संरचना सवर्णवादी-ब्राह्मणवादी है। कह सकते हैं कि मुक्तिबोध के बाद हमारी भाषा में कोई उस जैसा विद्रोही लेखक नहीं हुआ, जबकि कन्नड़ में एक परंपरा चली आ रही है।

आर नाडिग से लेकर शिवराम कारंत, चंद्रशेखर खम्बार, गिरीश कर्नाड, बी वी कारंत, यू आर अनंतमूर्ति के नाम आप इस सूची में शामिल कर सकते हैं। इन सब लोगों ने अन्याय पर आधारित प्रतिगामी कट्टर ताकतों का अपने लेखन से विरोध किया था। ये लोग राजनेता नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपने कलम की ताकत से फासीवादी संस्कृति का मुकाबला किया। यही मैं कहना चाहता हूं कि इस लड़ाई को सांस्कृतिक मोर्चे पर भी लड़ना होगा। लंकेश यही कर रही थीं।

(साभार-नवजीवन)


VISHWA DEEPAK-1विश्वदीपक। आईआईएमसी के पूर्व छात्र। डॉयचे वेले, बीबीसी जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से पत्रकारिता का अनुभव। आजतक, न्यूज़ नेशन जैसे चैनलों में काम किया। जनसत्ता, अहा ज़िंदगी, द कारवां समेत कई अख़बारों, वेबसाइट, पत्रिकाओं में जनपक्षधर मुद्दों पर लेखन। फिलवक्त नेशनल हेराल्ड को अपनी सेवाएं दे रहे हैं

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