सत्य के प्रयोग पार्ट -2

पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि महात्मा गांधी ने  दक्षिण अफ्रीका में जेल की सजा काट रहे सत्याग्रहियों  के आश्रितों का भरण पोषण और उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था किस तरह शुरू की थी। यह गांधी जी के सामुदायिक जीवन का एक बड़ा प्रयोग था। जोहानिसवर्ग के पास गांधी जी ने अपने एक जर्मन सहयोगी  कालेनबाख के साथ मिल कर 1100 एकड़ का एक फार्म खरीद कर टाल्सटाय आश्रम की स्थापना की थी। इस फार्म में  दक्षिण अफ्रीका में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे और जेल की सजा भुगत रहे सत्याग्रहियों के परिवारों की आजीविका और उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। इस आश्रम की खासियत यह थी की इसमें हिन्दू, मुसलमान, पारसी और ईसाई सभी धर्मों के लोगों के अलावा तमिल, तेलगु, गुजराती और उत्तर भारतीय लोग साथ-साथ रहते थे।

भाषागत भिन्नता के बाबजूद  इनकी शिक्षा की सम्मिलित व्यवस्था टाल्सटाय आश्रम में थी। चूंकि आश्रम में विभिन्न सामाजिक, पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए  युवक रहते थे, इसलिए उनके विचार और व्यवहार में काफी भिन्नता थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक सत्य के प्रयोग में आश्रम के एक ऐसे ही  किशोर की चर्चा की है। वह युवक आश्रम में बड़ा उधम मचाता था, झूठ बोलता था, दूसरों से लड़ता-झगड़ता था। एक दिन उसने बहुत उधम मचाया। गांधी जी उसे देख घबराए। वे आश्रम के विद्यार्थियों को कभी  किसी तरह का दंड नहीं देते थे। उस दिन उस युवक पर गांधी जी को बड़ा क्रोध आया। वे उसके पास गये। उसे समझाने की पूरी कोशिश की, मगर वह  कुछ भी समझने को तैयार नहीं था। उसने उन्हें भी धोखा देने की कोशिश की। गांधी जी ने अपने निकट रखा रूल उठाया और उसकी बांह पर जमा दिया। ऐसा करते समय गांधी जी कांप रहे थे। गांधी लिखते है, ऐसा अनुभव आश्रम के  किसी विद्यार्थी को उनकी ओर से पहले कभी नहीं हुआ था।उस विद्यार्थी ने मारते हुए गांधी को कांपते देखा और रो पड़ा । उनसे माफी मांगी।

फोटो सौजन्य- आशीष सागर दीक्षित

अपनी आत्मकथा में गांधी जी लिखते हैं  ‘ उसे रूल लगा और तकलीफ हुई, इसलिए वह नहीं रोया। वह मुकाबला करना चाहता तो मुझसे निबटने की ताकत उसमें थी। उसकी आयु 17 साल की रही होगी। उसका शरीर सुगठित था, पर मेरे रूल मारने में उसने मेरी पीड़ा का अनुभव किया। इस संयोग के बाद कभी भी वह मेरे विरुद्ध नहीं गया।’आश्रम में  इस युवक की पिटाई  पर गांधी जी को बाद में काफी पछतावा हुआ। उन्हें लगा कि उस युवक को मार कर उन्होंने उसे अपनी आत्मा का नहीं, पशुता का दर्शन कराया था। गांधी जी लिखते हैं कि उस घटना के बाद उन्होंने आश्रम के विद्यार्थियों को सुधारने का अच्छा तरीका सीख लिया। वे विद्यार्थियों को मार-पीट कर सिखाने के सर्वथा विरोधी रहे। वे  हृदय की शिक्षा, अर्थात चरित्र के विकास को हमेशा प्राथमिकता देते रहे। वे आश्रम के लड़के-लड़कियों के साथ हमेशा  पिता रूप में रहते थे। उनका मानना था कि चरित्र की बुनियाद मजबूत हो तो अन्य बातें वे समय मिलने पर दूसरों की सहायता से या अपने आप सीख सकते हैं।

टाल्सटाय आश्रम में कुछ लड़के बड़े उपद्रवी और दुष्ट स्वभाव के थे। कुछ आवारा किस्म के भी लड़के थे। उन्हीं के साथ गांधी के अपने तीन लड़के भी आश्रम में रहते थे।  एक दिन मिस्टर केलनबैक ने गांधी का ध्यान उस ओर आकृष्ट कराते हुए कहा कि आश्रम के आवारा लड़कों की सोहबत का असर तो उनके तीन लडकों पर निश्चित रूप से पड़ सकता है और फिर वे  भी  बिगड़ जाएंगे। इसपर गांधी जी ने उनसे कहा   था, ‘ मैं अपने लड़कों और इन आवारा लड़कों में भेद कैसे कर सकता हूं ? इस समय दोनों के लिए मैं एक-सा जिम्मेदार हूं। वे युवक मेरे बुलाने से यहां आए हैं। मैं इन्हें खर्च दे दूं तो आज ही ये जोहान्सवर्ग लौट कर जैसे रहते थे, रहने लगेंगे। यहां आने में उन्होंने मुझ फर मेहरबानी की है, यह भी वे और उनके माता-पिता मानते हों, तो कोई आश्चर्य नहीं है। यहां आकर वे कुछ कष्ट ही उठा रहे हैं, यह तो मैं और आप दोनों देखते ही हैं, पर मेरा धर्म स्पष्ट है। मुझे उन्हें यहीं रखना चाहिए, अत: मेरे लडकों को भी उनके साथ ही रहना है। फिर क्या मैं आज से ही अपने लड़कों को यह भेदभाव सिखाऊं कि वह दूसरों से ऊंचे हैं। इस प्रकार का विचार उनके दिमाग में डालना ही उन्हें गलत राह पर ले जाना होगा।  हम यह क्यों न मानें कि उनमें यदि  सचमुच गुण होगा,  तो उन्हीं की छूत उनके साथियों को लगेगी। ‘

 इसका परिणाम यह हुआ कि गांधी के तीनों लड़कों में बड़प्पन की जो थोड़ी-बहुत भावना थी, वह बिल्कुल समाप्त हो गई और  वे सबके साथ घुलना-मिलना सीख गये।