सच्चिदानंद जोशी

बात आज से चौंतीस (34) बरस पहले की होगी। उन दिनों एमए के अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर निकला था। संगीत और नाटकों का शौक था। नाटक किया करता था और संगीत की महफिलें सुनने जाया करता था। मालूम भर पड़ जाए कि फलां जगह महफ़िल है या समारोह है, हम पहुँच जाते थे जुगाड़ जमा कर सुनने। पास का जुगाड़ करना या यूं ही पहचान निकाल कर सुनने अंदर घुस जाना। तब किसी बात का बुरा नही लगता था, संगीत सुनने का जुनून ही कुछ ऐसा था। उसमें फिर पसंदीदा कलाकार हों तो कहने ही क्या। कई कई दिनों तक उस महफ़िल की राह देखते , सारे काम को इस तरह जमाते कि वो दिन खाली निकल जाए। कहने को बेरोजगार थे लेकिन बेकारी और बेगारी के काम बहुत थे।

ऐसे ही पसंदीदा कलाकार थे उस्ताद अमजद अली खान। हम तो न सिर्फ उनकी सरोद के दीवाने थे बल्कि उनके पहनावे को भी बारीकी से देखते थे। सरोद पर उनकी बजाई गत जबानी याद रहती, एक एक तान के साथ। जहां से मिलती उनकी कैसेट ले आते। रेडियो पर उनका कार्यक्रम होता तो भी रिकॉर्ड करते। खूब सुना रेडियो पर या कैसेट पर। कभी सामने नहीं सुना। एक बार मौका आया तो उस कार्यक्रम में आई बाबा चले गए। लेकिन लौटने पर उनसे पूरा आंखों देखा हाल सुना। कैसे स्टेज पर आए से लेकर कौन सा कुर्ता पहना, तबले पर कौन था तक सभी।

इसलिए भोपाल में जब एक महफ़िल में उन्हें सुनने का मौका आया तो लगा जैसे कई दिनों की साध पूरी हो गयी है। इस बात को चौतीस साल हो गए लेकिन अभी भी वो रोमांच भूलता नहीं जब पहली बार उस्ताद अमजद अली खान को स्टेज पर देखा था। चिकोटी काट कर देखा था अपने आप को विश्वास करने के लिए कि मैं साक्षात अमजद अली खान को ही देख रहा हूँ। उन्हें देख कर, सुनकर मन इतना प्रफुल्लित था कि लगता था बहुत बड़ी खुशी मिल गयी।

कार्यक्रम के बाद एक परिचित गायन गुरु मिल गए। वे अमजद अली जी को बचपन से जानते थे, ग्वालियर की पहचान थी उनकी अमजदजी से। मेरे चेहरे का रोमांच देख कर बोले ” आओ तुम्हें अमजद से मिलवा दें। चलो ग्रीन रूम में ” । मुझे मालूम था कि वो सचमुच मुझे मिलवा सकते हैं। लेकिन मेरे मन में संकोच था कि मैं उनसे कहूंगा क्या कि ” आप सरोद अच्छा बजाते हैं “और वो कह देंगे ” हाँ हम तो बजाते ही हैं अच्छा, इसलिए तो आप आते हैं। ” तो फिर मैं क्या कहूंगा। मन में एक बात और थी जो मैंने उन गुरुजी से नहीं कही और वो ये कि आज अमजदजी से मिल कर मुझे तो बहुत अच्छा लगेगा लेकिन क्या मुझसे मिलकर उन्हें भी अच्छा लगेगा ? बस इसी प्रश्न ने मुझे उनसे उस दिन मिलने से रोक लिया। मन में एक बात घर कर गयी कि उस्ताद जी से तब मिलेंगे जब उन्हें भी अपन से मिलकर अच्छा लगे। 

IGNCA में उस्ताद अमजद अली खान और उनके शिष्यों पर केंद्रित समारोह “दीक्षा” का शुभारंभ हुआ और इस निमित्त खान साहब के साथ काफी समय गुजारना हुआ। इस कार्यक्रम की तस्वीरें देख रहा था तो बरबस ही चौतीस साल पहले का प्रसंग याद आ गया।

सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।