सच्चिदानंद जोशी

मैं जैसे ही उस रिसोर्ट में दाखिल हुआ अचंभित रह गया। शहर से इतने पास, लेकिन शहर के कोलाहल से दूर, इतनी सुंदर जगह की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मुझे आवंटित कक्ष की ओर ले जाते समय वहाँ की कार्यपालक मुझे अपने रिसोर्ट की खूबियाँ बता रही थीं। “यहाँ स्पा है, जिम है, स्वीमिंग पूल है साइकिलिंग है और तो और यहाँ आप जंगल सफारी का आनंद ले सकते हैं,” उसने बताया। उसने ये भी बताया कि आप शहर के इतने नज़दीक रह कर गांव के जीवन का आनंद ले सकते हैं।

उसका वर्णन सुन कर और सारा सरंजाम देख कर दो विचार मन में आ रहे थे। पहला ठेठ मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा व्यक्ति के मन में उठने वाला स्वाभाविक विचार था ” बहुत महंगा होगा”। दूसरा विचार ये कि यदि यहीं रुकवाना था तो आयोजको ने बैठक एक दिन की क्यों रखी। दो चार दिन का मंथन रखते , कम-से-कम इस रिसोर्ट का अच्छी तरह आनंद तो उठा पाते। पहला विचार मन में रह गया लेकिन दूसरा जुबान पर आ गया। मेरे व्यंग को न समझते हुए साथ आये आयोजक ने भोलेपन से कहा ” क्या करें सर् और सभी होटल भरे थे, इसलिए इस महंगे रिसोर्ट में आप लोगो के रुकने का इंतज़ाम करना पड़ा”। उसकी बात से होटल की कार्यपालक को मेरी हैसियत का अंदाज़ा हुआ हो न हो मुझे हो गया कि “बच्चू ज्यादा मत फैलो। अपना काम करो और चुपचाप निकल लो।”

नाश्ते के समय उस खूबसूरत जंगलनुमा बगीचे के लॉन में मेरी टेबल की साथ वाली टेबल पर एक जोड़ा बैठा था। अपने आप में खोया अपनी दुनिया में मसरूफ। ये हनीमून वाले या प्रायः प्रायः हनीमून वाले जोड़े बड़े कष्टप्रद होते हैं। विशेषकर तब जब आप अकेले हों। उन्हें देख नही सकते और नज़रें बार-बार वहीं जाती है। पता नहीं ये सब हरकतें मीडिया उन्हें सिखाता है या उनसे सीखता है। लेकिन अपने तथाकथित प्रेम का यूँ सार्वजनिक इज़हार कई बार शालीनता की सीमाओं को पार कर जाता है। ऐसे में यदि आपकी नजर उनसे मिल भी जाये तो वो आपको यूँ हीन भाव से देखते हैं, गोया पूछ रहे हों ” तुम किस दुनिया से आये हो पिछड़े आदमी ?”

” सर् हमारा रिसोर्ट बहुत पॉपुलर वीकेंड डेस्टिनेशन है। लोग शहर की भीड़भाड़ से दूर रोज़ की आपाधापी से भाग कर सुकून पाने यहाँ आते हैं। ” रेस्टोरेन्ट के मैनेजर ने पूरक जानकारी दी।

मामला यहीं खत्म हो जाता तो बात और थी। असली मामला तो रात को समझ में आया जब मैंने उस युगल को फिर देखा, भोजन की टेबल पर। तब तक वो जंगल घूम चुके थे और रिसोर्ट की अन्य सारी सुविधाओं का भी आनंद ले चुके थे। वो महिला अपने मोबाइल पर और पुरुष अपने मोबाइल पर जुटे थे। लगातार उनकी उंगलियां अपने टच पैड को सहलाने में लगी थीं और उन दोनों के बीच खाने के मीनू के अलावा और कोई रोचक विषय नहीं बचा था।

“सुनिए यहाँ का वाई फाई पासवर्ड क्या है” महिला ने मैनेजर से पूछा।

मैनेजर ने बजाय जोर से कहने के उसके पास जाकर पासवर्ड उसे कागज़ पर लिखकर दे दिया।

“यही तो टाइप किया था मैंने । लेकिन वो तो चलता ही नही । मैं सुबह से ट्राय कर रही हूँ। ” उसने झल्लाकर कहा।
“हमारे यहाँ नेटवर्क थोड़ा कमजोर से मैडम। सिग्नल मुश्किल से पकड़ता है। ” मैनेजर ने विनम्रता से कहा।
“मुश्किल से पकड़ता है? यूँ कहिये पकड़ता ही नहीं। इतना पैसा लेते हैं इस रिसोर्ट में रहने का और ढंग का नेटवर्क नहीं ले सकते।” माहिला ने उसे डांटते हुए कहा। मैनेजर शायद इस प्रतिक्रिया का आदि था। खीसें निपोरकर चलता बना। उसके सुबह के शब्द मेरे कान में गूँज रहे थे “लोग सुकून के लिए यहाँ आते हैं”।

मैं कुछ और सोच पाता इसी बीच मैनेजर मेरे पास आ गया। मेरे चेहरे का भाव पढ़ते हुए बोला “ सर कितनी बार कहा है मालिक को कि टावर लगवा दो, नेटवर्क अच्छा आने लगेगा। लेकिन मालिक मानते ही नहीं। उन्हें लगता है कि लोग सचमुच सुकून पाने आते हैं। कैसे समझाएं उन्हें कि कस्टमर को एक बार खाना नहीं दिया तो भी शायद कंप्लेंट न करें लेकिन आजकल बिना नेटवर्क के तो एक पल गुजारा नहीं है। ” मैं मैनेजर की बात पर अचंभित था। समझदारी की बात कही थी उसने। मैनेजर उधर जाकर अपने काम में लग गया। इधर वो महिला अपने पति को डांट रही थी” कितनी बार याद दिलाया था कि हॉटस्पॉट रख लो। उसे घर में रख कर क्या अचार डालना है। आजकल नेटवर्क का कोई भरोसा नहीं रहता। लेकिन मेरी सुनता कौन है। अब बैठे रहो यहाँ पर दो दिन बिना नेटवर्क के।”

पति बेचारा अपनी गलती पर पश्चाताप करता अपने मोबाइल पर वाई फाई पासवर्ड टाइप करते हुए नेटवर्क मिलाने की कोशिश कर रहा था। गलती तो उससे हो गई थी। पश्चाताप करने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं बचा था। और मुझे ऐसा लगा कि जैसे उनके ठीक पीछे लगे जंगल सफारी के पोस्टर में बैठे शेर के चेहरे पर एक व्यंगभरी मुस्कान तैर रही है।

(Disclaimer: सभी पात्र , स्थान एवं घटनाएं काल्पनिक है। )


सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।