ब्रह्मानन्द ठाकुर

जी हां , विद्रोही कवि रामधारी सिंह दिनकर। हालांकि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर टिकी इस व्यवस्था के संचालक, आधुनिक राष्ट्रवादियों को दिनकरजी के प्रति मेरा यह संबोधन नागवार लग सकता है लेकिन कवि के इस विशेषण की सार्थकता स्वयं उन्हीं की पंक्तियां- ‘शांति नहीं तब तक जब तक सुख भाग न नर का सम हो/ नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो ।’ वर्ग विभाजित समाज में स्थायी शांति की स्थापना तब तक नहीं सम्भव , जब तक आर्थिक समानता कायम नहीं हो जाती। दिनकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व विद्रोही कवि के रूप में शुमार किए जाते रहे। आजादी के बाद वे राष्ट्रकवि कहलाए। उनकी कविताओं में ओज है, विद्रोह का स्वर है और है क्रांति का आहवान। उनकी अनेक रचनाओं में शृंगार की अभिव्यक्ति भी हुई है। उनकी प्रमुख कृति उर्वशी को ग्यानपीठ पुरस्कार भी मिल चुका है जबकि कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में स्थान प्राप्त है।⁠⁠⁠⁠

ऊपर मैंने दिनकर जी की जिन बहुपठित, बहु उद्धृत पंक्तियों का उल्लेख किया है उसका सम्बंध समतावादी समाज के निर्माण से है। ऐसी आर्थिक समानता की स्थापना जो विश्व-बंधुत्व की परिकल्पना को साकार कर सके, वसुधैव कुटुम्बकम्। सवाल यहां यह भी है कि साम्य की वह किरण कब फूटेगी ? आज पूंजीवाद – साम्राज्यवाद ने आदमी के आदमी बनने की प्रक्रिया में रोक लगा दी है। आदमी अब जानवर से भी बदतर आचरण करने लगा है। पूंजीवाद से सीधा तात्पर्य है पैसे का राज। जीवन के हर क्षेत्र में पैसे की महत्वपूर्ण भूमिका। इंसानियत का गला घोंटकर भी यदि पैसा कमाया जा सके तो बेहिचक कमाया जाए, ऐसी सोच का विकसित होना ही पूंजीवाद की चरम परिणति होती है।

दिनकर जयंती विशेष

कुछ सौ साल पहले तक समाज में धन की भूख इस कदर नहींं थी। समाज के अपेक्षाकृत एक ताकतवर वर्ग ने प्रकृति प्रदत्त उपयोगी सम्पदा को जब निजी सम्पत्ति बना लिया और इसी निजी सम्पत्ति पर आधारित होने के कारण परिवार, समाज और संगठन के लोग जानवर से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर हुए। यही कारण है कि चंद पैसों के लिए लोग आज एक- दूसरे का गला काटने पर आमादा हैं। आज सारी प्राकृतिक सम्पदा और वैज्ञानिक साधनों पर कुछ मुठ्ठीभर पूंजीपतियों का कब्जा है। इस स्थिति ने बहुसंख्यक लोगों को अभावग्रस्त और भाग्यवादी बना दिया है।⁠⁠⁠⁠

सच्चाई यह है कि वर्तमान उत्पादन से देश की वर्तमान आबादी की सारी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। बशर्ते कि उत्पादित सामानों के समुचित वितरण की व्यवस्था हो। सत्ताधारी वर्ग ने यह न कभी किया है और न करने वाला है। वह तो सारी सम्पदा पर कुंडली मार कर बैठा हुआ है। सारे उत्पादित माल को मुद्रा में बदल कर देशी-विदेशी बैंक सुरक्षित रखने का काम कर रहा है। लेकिन सत्ताधारी वर्ग को यह नहीं भूलना चाहिए कि सारी सम्पदा को कब्जे में रख कर वह चैन की नींद कभी नहीं सो सकता। विद्रोही कवि दिनकर ने इसका इशारा अपनी रचनाओं के माध्यम से अनेक जगहों पर किया है।

क्रांतिद्रष्टा कवि दिनकर भी इसी के पक्ष में रहे कि जबतक जनता क्रांति की चोट से पूंजीवादी राजसत्ता का मूलोच्छेद कर नीचे से ऊपर तक सर्वहारा की राजसत्ता कायम नहीं करती तब तक उसे शोषण -उत्पीड़न और आर्थिक विषमता जनित दुख -दैन्य से त्राण नहीं मिल सकता। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 110वीं जन्मतिथि पर हमें यह संकल्प लेने की जरूरत है कि सारी प्राकृतिक, मानवीय और वैज्ञानिक सम्पदा जो मुठ्ठी भर शोषक पूंजीपतियों के कब्जे में है, उसको मुक्त करा कर सबके उपयोग के लायक बनाने के लिए एकजुट संघर्ष की शुरुआत करेंं। किसानों-मजदूरों के क्रांतिकारी संघर्ष को कामयाब बना कर ही समाज मे अमन-चैन और खुशहाली लाई जा सकती है। दिनकर जी का सपना था-‘ साम्य की वह रश्मि स्निग्ध उदार कब खिलेगी , कब खिलेगी विश्व में भगवान ! कब सुकोमल ज्योति से अभिसिक्त होंगे जली, सूखी रसा के प्राण ‘

दिनकरजी का मुख्य सरोकार जनता से था। देश की वह जनता जो खेतों, खलिहानों, खदानों और फैक्ट्रियों में मरने – खपने और खटने को मजबूर है। कवि ने उनकी पीड़ा को सदैव अभिव्यक्ति प्रदान की। पहली बार जब वे राज्यसभा के सदस्य चुने गये तो पंडित नेहरू ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ एक कविता सुनाने का आग्रह किया था। इस आग्रह पर दिनकरजी ने अपनी चर्चित कविता ‘रेशमी नगर’ का पाठ किया था जिसकी पंक्तियां हैं- ‘भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला/भारत अब भी व्याकुल विपत्तियों के घेरे में/ दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल/ पर भटक रहा है सारा देश अंधेरे में। 


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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