राकेश कायस्थ

सोशल मीडिया पर मासूमियमत, मूर्खता और व्यवस्थित ट्रोलिंग की तीन धाराएं साथ-साथ चलती रहती हैं। इन तीनों का मकसद एक ही होता है। किसी खास मुद्धे पर उठ रहे सवालों को पटरी से उतारना। इतना शोर मचाना कि असली बात सुनाई ना दे। गौरी लंकेश प्रकरण में यही हो रहा है।  एक तबका है जो फेसबुक और ट्विवटर पर मिठाई बांट रहा है। बेरहमी से मार दी गई एक बुजुर्ग पत्रकार के लिए कुतिया और वेश्या जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है। उन्हें कांग्रेसी एजेंट बता रहा है। इस मुहिम में लगे लोगों की सोशल मीडिया प्रोफाइल चेक कीजिये और साथ ही ये देखिये कि इनको कौन लोग फॉलो करते हैं, तो पूरी कहानी समझ में आ जाएगी।

दूसरा तबका वह है जो कह रहा है कि उन्हे संघ परिवार नहीं बल्कि बेईमान कांग्रेसी नेताओं से खतरा था। पूरी जांच रिपोर्ट आ जाने दीजिये। नतीजे तक पहुंचने की क्या क्या जल्दी है? ऐसे लोगों के वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या ये ज्ञान उन्होंने घर से लेकर सड़क तक बेगुनाहों की जान ले रहे गौभक्तों को भी दिया है? क्या उन्होंने कभी यह पूछा है कि जब इतना बड़ा सरकारी तंत्र मौजूद है तो कथित गौरक्षा के लिए पूरे देश में गुंडों की पैरलल आर्मी क्यों और किस मकसद से खड़ी की जा रही है?

जांच पूरी ना होने तक चुप रहने की शिक्षा देनेवालों से यह भी पूछिये कि उनके प्रिय नेता की सरकार ने गोधरा कांड के छह घंटे के भीतर किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि इसके पीछे कौन है? अगर निष्कर्ष मालूम था तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जानबूझकर गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में कारसेवकों की लाश घुमाकर दंगे क्यों करवाये गये और शुरुआती तीन दिनों तक दंगाइयों को खुली छूट क्यों दी गई?

जो लोग यह ज्ञान दे रहे हैं कि यह राज्य सरकार का मामला है, उनसे पूछिये कि राजस्थान में किसकी सरकार है, जहां रोजाना गौरक्षा के नाम पर लोगों को पीटा जा रहा है, उनकी हत्या की जा रही है? राज्य सरकार का तकनीकी नुक्ता समझाने वालों से यह भी पूछिये कि जब बाबरी ढांचा तोड़ा गया था, तब उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार थी और सुप्रीम कोर्ट में कानून व्यवस्था बहाल करने का हलफनामा देने के बाद उसने क्या किया था? क्यों कल्याण सिंह ने दो दिन बाद खुलेआम कहा था कि उन्होंने जानबूझकर सुरक्षा बलों से कहा था कि उपद्रवी भीड़ के खिलाफ कार्रवाई ना की जाये? कानून, संविधान और नैतिकता को ठेंगा दिखाना जिनका इतिहास रहा है, वे आपसे विमर्श के लायक नहीं है। इनका एकमात्र मकसद आपकी आवाज़ को दबाना है।

एक तीसरा तबका भी है, जो शायद सीधे तौर पर व्यवस्थित हिंसा की विचारधारा से नहीं जुड़ा है। लेकिन जाने-अनजाने में उनके हितों का पोषण कर रहा है। इस तबके ने दार्शनिक भंगिमा अख्तियार कर रखी है। हत्या तो हत्या है। उसे राजनीतिक रंग ना दो। उनके वॉल पर भी जाइये और देखिये क्या उन्होंने संगठित हिंसा भड़काने की कोशिशों में जुटे आधा दर्जन केंद्रीय मंत्रियों और फर्जी फोटोशॉप बांट रहे सैकड़ों बीजेपी नेताओं को भी कभी ये ज्ञान दिया है? अगर नहीं तो मान लीजिये ये लोग भी असली सवाल को पटरी से उतारने के खेल में शामिल हैं।

संघ परिवार को कटघरे में खड़ा करना मेरा प्रयोजन नहीं है। जो लोग गांधी की हत्या कर चुके हों, जिनकी हकीकत पूरी दुनिया जानती हो, उनके पीछे वक्त बर्बाद करने से क्या हासिल होगा? मैं केवल तथ्यों की बात कर रहा हूं, जो बहुत स्पष्ट हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक में उग्र हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं, जो अपने वैचारिक विरोधियों का चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। कलबुर्गी, पानसारे और दाभोलकर की हत्या में जो पैटर्न है, वही पैटर्न गौरी लंकेश के मामले में भी दिखाई दे रहा है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए किसी अनुसंधान की ज़रूरत नहीं है। गौरी लंकेश का लिखा पढ़ लीजिये। उन धमकियों के बारे में पता कर लीजिये जो उन्होंने मिल रही थी। उस मुकदमे पर गौर कीजिये जो सत्तारूढ़ पार्टी के ताकतवर नेता और उनके बीच चल रहा था। आखिर कौन लोग है, जो गौरी लंकेश के काम से नाराज़ थे और उन्हें धमकियां दे रहे थे?

आखिरी बात! अगर इस मामले में कोई और कहानी सामने आती है और वजह वह नहीं होती जिसका अनुमान है, तो मुझे इस बात की खुशी होगी। मैं खुद कर्मकांडी हिंदू परिवार में पैदा हुआ हूं। जब मैं किशोर था और हिंदू आतंकवाद शब्द सुनता था तो मेरे तन बदन में आग लग जाती थी। अब सुनता हूं तो मेरा माथा शर्म से झुक जाता है, क्योंकि मुझे पता है कि यह कोई मिथ नहीं बल्कि हकीकत है। मैं उस मां का बेटा हूं, जिसे हिंदू परंपराओं का किसी भी आम कर्मकांडी ब्राह्मण के मुकाबले कई गुना ज्यादा ज्ञान है। एक विराट और उदात्त दर्शन का राजनीतिक फायदे के लिए जिस तरह अवमूल्यन किया जा रहा है, उससे मैं हतप्रभ हूं। मुझे मेरे धर्म ने सिखाया है कि सत्य के साथ खड़े रहो और डरो मत। इसलिए मैंने तय किया है कि डरूंगा नहीं। जहां बोलने की ज़रूरत होगी खुलकर बोलूंगा।

तथाकथित धर्म रक्षा के नाम पर मरने-मारने पर उतारू भीड़ को मैं गायत्री मंत्र का सार याद दिलाना चाहता हूं, शायद कुछ सकारात्मक असर हो- उस प्राण स्वरूप देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें और वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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