धीरेंद्र पुंडीर

“ अगर हमने गांधी को विश्व की शांति के लिए एक मसीहा के रूप में जन-मन तक स्थिर करने में सफलता पाई होती तो United Nations का General Secretary जो भी बनता, वो सबसे पहले साबरमती आश्रम आता, कुछ पल हृदय कुंज में बिताता और विश्व शांति United Nations की उस धरती से क्या काम कर रहा है उसकी प्रेरणा साबरमती के तट से बापू की तपोभूमि से लेकर जाता। लेकिन मेरी आत्मा कहती है कि आज नहीं तो कल, कभी न कभी ये होगा। “ (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी- शताब्दी वर्ष साबरमतीआश्रम)

साबरमती आश्रम से बापू की दांडी यात्रा के पदचिन्हों पर गुजरात के चुनाव के मुद्दों को खोजता हुआ निकलने वाला था। साबरमति आश्रम की उलटबांसियों के बावजूद आश्रम से लग रहा था कि गांधीजी को दिखाने के लिए ही सही हमने हिंदुस्तान में जिंदा रखा हुआ है। पूरी दुनिया के लिए एक अबूझ व्यक्ति जो पूरे मानव इतिहास में सबसे ताकतवर साम्राज्य से टक्कर ले रहा था और बिना किसी हथियार के। हथियार चलाना तो दूर की बात है, उसने कभी हथियार छुआ तक नहीं और वो सपना देख रहा था दो सौ सालों से हिंदुस्तान को रौंद रहे अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का। बापू ने इसको कर दिखाया था। पूरी दुनिया आज भी उसको समझने की कोशिशों मे जुटी है। ऐसे में साबरमती आश्रम के सौ वर्ष पूरे होने पर इसी माटी के सपूत और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री ने जो कहा था पहले उसको देख लेने की इच्छा हुई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक दशक से ज्यादा गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, इसीलिए उनके विचार गांधी के लिए प्रासंगिक भी हैं और मेरे आगे के रास्ते के लिए एक दिलासा भी, क्योंकि प्रधानमंत्री जानते हैं कि गांधी इस देश के लिए नहीं बल्कि दुनिया के लिए क्या मायने रखते हैं?

साबरमती आश्रम में पहले भी आया था, जब नदी तो थी लेकिन फ्रंट नहीं बना था। आश्रम के किनारे पर खड़े होकर खूबसूरत रिवर फ्रंट दिखता है तो दूसरे फ्रंट पर एक दूसरे से ऊंचाईंयों में होड़ करती हुई इमारतें। लगा कि क्या ये दोनों कभी एक दूसरे से बात करती हैं। आश्रम जरूर पूछता होगा कि क्या ऊंची इमारतों और आपकी समृद्धि का कुछ हिस्सा गांव तक पहुंच गया। शायद वो इमारतें भी आश्रम से पूछती होंगी कि आश्रम में कोई एक बूढ़ा रहता था वो अचानक निकल कहां गया और क्या करने के लिए निकल गया था?

आश्रम में दाखिल हो रहा था तो चुनाव के पोस्टरों से अहमदाबाद शहर पटा हुआ था। और मैं भी चुनाव ही कवर करने आया था। चुनावों के मुद्दे और दांडी यात्रा दोनों का एक दूसरे से मिलता-जुलता सिरा मुझे आश्रम तक खींच लाया था। छुआछूत को समझने की कोशिश की कहानी धीमंत भाई से बातचीत कर कुछ साफ हो रही थी। तो नई पीढ़ी को लेकर गांधीवादी लताबेन के विचार थोड़ी सी निराशा पैदा कर रहे थे। ऐसे में सोचा चलो यात्रा तो पूरी करनी है। आजादी की लड़ाई के हिस्सों को आज 87 बाद अपनी नज़र से देखते हैं और महसूस करते हैं कि एक नंगा फकीर कैसे नमक जैसी मिट्टी से देश के लिए सोना बनाने निकल पड़ा था। खैर प्रधानमंत्री के भाषण ने बता दिया था कि दुनिया की सबसे बड़ी संस्था यूएनओ के जनरल सेक्रेट्री को पहले शांतिदूत महात्मा गांधी की समाधि पर आकर मत्था टेक कर ही शपथ लेनी चाहिए। ऐसे में मैं आश्वस्त था कि महात्मा गांधी के विचार भले ही सही से नहीं सहेजे जा रहे हों लेकिन उनके चिन्हों और स्मृतियों को सही से रखा होगा हम लोगों ने।

सभी चित्र सौमित्र के सौजन्य से

आश्रम गेट से बाहर निकला। कुछ अंतर तो तीन-चार साल में ही मुझे ही दिख गया था। इंट्री गेट पर एक बहुत बड़ा चरखा लगा हुआ था। लेकिन अब एक पारदर्शी कैबिनेट में रखा चरखा छोटा हो गया है। उस वक्त भी जब मैंने देखा तो उस चरखे का तार टूटा हुआ था लेकिन अब वो चरखा ही हट गया। पता चला कि रख-ऱखाव में काफी समस्या थी। महात्मा गांधी जी ने सुबह 6.20 मिनट पर अपने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती के आश्रम से आखिरी विदाई ली थी। क्योंकि महात्मा गांधी ने यात्रा के लिए ये प्रण कर लिया था कि वो बिना स्वराज लिए हुए इस आश्रम में वापस कदम नहीं रखेंगे। और फिर वो कभी लौंटे भी नहीं क्योंकि जब हमको स्वराज मिला तो बंटवारे में जख्मी देश के मरहम पोछने में जुटे उस महामानव को लौटने का मौका ही नहीं मिला।

आश्रम के एक्जिट गेट पर एक सूखा हुआ पेड़ का ठूंठ खड़ा है। बताने वाले बताते हैं कि यात्रा के दिन हरा था। पता नहीं कब सूख गया, कोई बता नहीं पा रहा। एंट्री गेट पर नेहरूजी द्वारा लगाया गया पेड़ अभी हरा है। गेट से बाहर निकलते ही कुछ दूर चलते ही आपको एक पहला बोर्ड दिखाई दे जाता है। जिस पर दांडी पथ लिखा हुआ है। अहमदाबाद की चमचमाती सड़क पर ये एक फुटपाथ पर लगा है। ऑटो वाले उसके आस-पास खड़े होते हैं। मुख्य पुल से पहले ही एक रास्ता दिखता है। काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ ऐतिहासिक दांडी यात्रा पथ के बारे में जानकारी देता हुआ। यहां तक आपको लगता है कि चलो महात्मा गांधी की पैरों के निशान आपको सही से दिख जाएंगे।

सामने ही एक लोहे का दरवाजा है। पहली नजर में ये दरवाजा बंद लगता है। लेकिन आप हिम्मत कर के दरवाजे के खुले हिस्से से अंदर जाते हैं। खाट पर लेटा हुआ एक शख्स आपको देखकर चौंक जाता है। उसको आप कोई बाहरी आदमी दिख जाते हैं। आप पूछते हैं कि ये ही दांडी पथ है। और वो बता देता है कि बापू यहां से ही गए थे। पथ को खूबसूरत बनाने के लिए लाइटों का इंतजाम है। और लकड़ी का एक पुल उस वक्त का अहसास आपको दिलाने की कोशिश करता है। लेकिन यहां आपको एक बदबू दिमाग में चढ़ती महसूस होगी। किसी तरह से आप इधर-उधर देखते हैं तो पुल के नीचे देखते ही आपकी आंखें फटी सी रह जाती हैं। स्वच्छता के लिए देश में अभियान चला रही केन्द्र सरकार और उसी पार्टी की सूबे में सरकार लेकिन जिस बापू के नाम पर ये अभियान चल रहा है उसी के आश्रम के 87 कदम दूर गंदगी का इतना बुरा आलम।

नाला अपनी पूरी गंदगी को समेटे हुए उसी साबरमती में मिल रहा है, जिसका फ्रंट आजकल दुनिया के राष्ट्पति और प्रधानमंत्री आकर देख रहे हैं। नाले में जानवर की लाश तैर रही है, किनारे पर लोग फारिग हो रहे हैं और गंदगी को समेटे हुए ये नाला दोनो हिस्सों में बने हुए बंद या दिखावटी सीवेज प्लांट को बेफिक्री से पार करता हुआ साबरमती के पानी में पूरे जोर-शोर से मिल रहा है। अभी हैरानी थोड़ी बाकी थी वो रास्ता अगले दरवाजे पर खत्म हो जाता था। उस पर एक और लोहे का गेट था। उसके पार इलाके का श्मशान था। सरकार ने ऐसा नहीं कि इंतजाम नहीं किए थे। पूरा कंक्रीट बनाया गया था, जिस पर वहां रहने वाले गोबर से कंडे बना कर सूखा रहे थे। पुल के पास देखे तो खूबसूरत दमकता हुआ रिवरफ्रंट और उसमें बहती हुई साबरमती का पानी दिख रहा था। शायद ही कुछ लोगों को साबरमती में चुपचाप मिलते हुए इस जहर को देखने की फुर्सत होगी।

मैं चलने लगा तो गेटकीपर ने हाथ जोड़ते हुए कहा – “साहब इस नदी को साफ करा दो , कभी कभी कुछ लोग बापू के रास्ते को तलाशते हुए आते हैं तो इसकी बदबू से बहुत परेशान हो जाते हैं। ज्यादातर वो लोग विदेशी होते हैं।” मैंने पूछा कि कभी नेताओं का कोई दौरा होता है तो उसकी गर्दन मेरे अंदाज के मुताबिक न में ही हिल उठी। गांधी जी यात्रा की टुकड़ी जब अगले पड़ाव पर पहुंचनी थी तो पहले वहां शौचालय और सफाई का इंतजाम करने के लिए अरूण टुकड़ी तीन दिन पहले पहुंच जानी थी। लेकिन न बापू हैं, न अरूण टुकड़ी। इस पुल से आगे जाने से पहले ही ख्याल आया कि अगर उस जनरल सेक्रेट्री ने साबरमती में मत्था टेक कर सौ कदम की दूरी तय कर ली तो क्या वो गांधी को हिंदुस्तानी मानने को तैयार होगा।

जानकारी के लिए, महादेव भाई देसाई ने सत्याग्राहियों की पहली लिस्ट जो भेजी थी उसमें राज्यवार संख्या दी गई थी। और बताया गया था कि सभी सत्याग्राही आश्रमवासी हैं। आश्रम के लिए भी ये पहली बार था जब किसी लिस्ट को राज्य, जाति और धर्म के आंकड़े के साथ तैयार किया गया था लेकिन इसके लिए भी काफी सोचा गया था। लिस्ट के मुताबिक 32 लोग गुजरात, 13 महाराष्ट्र, 7 यूपी, 6 कच्छ, 3 पंजाब, 1 सिंध, 4 केरल, 3 राजपूताना, 1 आंध्रा, 1कर्नाटक, 2 बॉम्बे, 1 तमिलनाडु, 1 बिहार, 1 बंगाल, 1 उत्कल, 1 फिजी (यूपी से फिजी पहुंचे परिवार में जन्म), 1 नेपाल के वासी। धर्म के आधार पर 2 मुस्लिम, 1 ईसाई और बाकि हिंदु जिसमें कुल मिलाकर चार दलित ( हरिजन) या मूलवंशी। और काम के आधार पर 9 शिक्षक, 25 खादी के छात्र, और बाकी आश्रम में अलग-अलग जिम्मेदारी संभाल रहे या फिर आश्रम के ऑफिस में कार्यरत। इन लोगों की एजुकेशन की जानकारी के मुताबिक 12 स्नातकों में से 7 बॉम्बे यूनिवर्सिटी, 3 विद्यापीठ और दो विदेशी यूनिवर्सिटी से थे।

सत्याग्राहियों की आयु में सबसे बड़े महात्मा गांधी 61 वर्ष के थे तो उम्र में सबसे कम बस महात्मा गांधी के नंबरों को उल्टा कर दो तो 16 साल के विट्ठल लीलाधर ठक्कर जो आश्रम स्कूल के छात्र थे।


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंडीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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