पुष्यमित्र

पटना साहिब दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है । हर तरफ प्रकाशोत्सव की तैयारियां चल रही हैं । आखिर गुरु गोविंद सिंह की 350वीं वर्षगांठ जो है । लिहाजा पूरे पटना में प्रकाशोत्सव की धूम देखने को मिल रही है । देश-विदेश से श्रद्धालू पटना पहुंच रहे हैं ऐसे में उनके ठहरने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं पंडालों की विशालता और साज-सज्जा देखते ही बन रही है । पंडालों में 2 लाख से ज्यादा लोगों के ठहरने के साथ लंगर की व्यवस्था की गई है । पटना साहिब की दीवारों पर खास पेंटिंग्स की जा रही हैं । 1 से 5 जनवरी तक चलने वाले इस प्रकाशोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शिरकत करेंगे ।

साभार- वन इंडिया

गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना में हुआ था । उनके जीवन के शुरुआती चार सालों के गुजरने की दास्तान बड़ी दिलचस्प है। सिख पंथ के नौवें गुरु गुरुतेग बहादुर जब बंगाल औंर असम की तरफ धर्म प्रचार के लिये निकले थे तो पटना में उन्हें कई श्रद्धालु मिल गये और उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी माता गुजरी को यहीं इन श्रद्धालुओं के पास छोड़ दिया और आगे की दुष्कर गंगा यात्रा के लिये निकल पड़े। गौरतलब है कि इसी क्रम में वे कटिहार के काढ़ागोला के पास लंबे वक़्त के लिये ठहर गये थे। वहां उनके कई लोग अनुयायी बने। उनकी याद में बना एक गुरुद्वारा आज भी मौजूद है और उस गांव में जाने पर लगता है कि हम पंजाब के किसी गांव में पहुँच गये हैं। 2006 में मुझे उस गांव में जाने का मौका मिला था। बहरहाल अपने शुरुआती चार साल के पटना प्रवास के दौरान जब तक उन्हें लेने उनके पिता गुरुतेग बहादुर असम से लौटे नहीं उन्होंने पटना में खूब बाल लीलाएं कीं। खाने पीने के शौक़ीन गुरु कभी गंगा घाट स्थित एक मंदिर से भगवान का भोग उठाकर खा लेते तो कभी एक रानी के पास पूरी घुघनी(छोला) खाने पहुँच जाते. यहां से लौटते वक़्त उन्होंने दानापुर में एक महिला के स्वादिष्ट खिचड़ी का लुत्फ़ उठाया।

गंगा घाट के पास वह मंदिर आज भी है, जहां भगवान का भोग वे खा लेते थे। शिकायत करने पर उन्होंने पंडित से कहा कि वही तो भगवान राम हैं, यह भोग तो उन्हीं के लिए लगता है। वहां एक दिन नहाते वक़्त उनका कंगन खो गया था, इसी याद में वहां कंगन घाट बना है और एक छोटा सा प्राचीन गुरुद्वारा भी। निस्संतान रानी ऋतम्भरा देवी जो उन्हें प्यार से घुघनी खिलाया करती थीं उनके स्थान पर आज भव्य गुरुद्वारा बाल लीला मैनी संगत बना है.।दानापुर में जिस वृद्धा ने उन्हें खिचड़ी खिलाया था उसके घर के पास गुरुद्वारा हांडी साहिब बना है। गुरुतेग बहादुर असम से लौट कर जहां ठहरे थे वहां गुरुद्वारा गुरु का बाग बना। यह दीदारगंज में स्थित है। निहंगों का जत्था हमेशा वहीं ठहरता है। जन्मस्थल पर बना तख़्त हरमंदिर साहिब मुख्य गुरुद्वारा है ही जो सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक है ।

गाय घाट वो जगह है गुरु नानक सिख धर्म के प्रसार के लिये सबसे पहले आए थे । यहां जेता मल नाम के व्यापारी रहा करते थे जो काफी अशक्त थे। नानक जी महाराज उन्हीं के घर ठहरे थे। उन्होंने नानक जी से कहा कि बाबाजी मेरी बड़ी इच्छा हर रोज गंगा स्नान की रहती है, मगर अशक्त होने की वजह से जा नहीं पाता।इस पर नानक जी महाराज ने कहा, तुम्हारा गंगा स्नान यहीं हो जायेगा। इसके बाद से रोज एक गाय गंगा नदी से मुंह में पानी भर कर लाती और जेता मल के सिर पर डाल देती। सिख मान्यताओं के मुताबिक इसी वजह से इसका नाम गाय घाट पड़ा। पटना साहिब के सबसे पुराने गुरूद्वारे गाय घाट गुरुद्वारा में आज भी जेता मल की यह तस्वीर लगी है। वे गाय के मुंह से गिर रहे गंगा जल से स्नान कर रहे हैं। हालाँकि इस प्राचीन गुरूद्वारे में वैसी रौनक नहीं है जैसी 350वें प्रकाशोत्सव पर होनी चाहिए थी। हर साल नगर कीतर्न यहीं से निकलता था मगर इस बार गांधी मैदान से निकलेगा। यहां के लोगों को ठीक से पता भी नहीं है कि यहां क्या क्या होने वाला है।

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।

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