घर का एहसास- तस्वीर, नीरज पांडेय के फेसबुक से साभार।

मैं जब अपने घर के करीब आता हूं
तो एक ठंडी हवा का झोंका आता है
कई तरह की खुशबू घुली होती है उसमें
कई एहसास बसे होते हैं

मैं जब अपने घर के करीब आता हूं
तो कुछ आवाजें सुनाई देती हैं
कुछ खिलखिलाती, कुछ रोकती-टोकती
तो कुछ दबी-दबी सी भी
कुछ आंखों में इंतजार होता है
कुछ अलसाई सी होती हैं, कुछ चहकती सी

मैं जब अपने घर के करीब आता हूं
तो अकेलेपन का अंधेरा भी छंटने लगता है
दूधिया रोशनी में चमकते गमलों में लगे पौधे दिखते हैं
रोशनी में नहाई दीवारें नज़र आती हैं
अक्सर कोई दौड़ कर लिपट जाता है
तो कोई किलकारी मार कर बुलाता है

मैं जब अपने घर के करीब आता हूं
तो खुद को मुकम्मल पाता हूं
बस कुछ मासूम लबों पर छिपे सवालों का
जवाब नहीं दे पाता हूं
कि मैं हर रोज अपने घर से दूर क्यों जाता हूं….

नीरज पांडेय, मीडिया कर्मी। कवि मन वाला पत्रकार। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढाई। बीएजी फिल्म्स, स्टार-एबीपी और इंडिया न्यूज़ जैसे बड़े मीडिया संस्थानों के साथ जुड़ाव।