किताब “नेहरू मिथक और सत्य” 5 जनवरी को आप सब के हाथ में आ जाएगी। किताब की भूमिका संघर्ष की पत्रकारिता का चेहरा बन चुके वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने लिखी है। वह इस किताब के प्रथम पाठक भी हैं। भूमिका का एक हिस्सा पढ़ना किताब के बारे में समझने में मददगार हो सकता है। रवीश ने लिखा है।

रवीश कुमार की कलम से
“पत्रकार पीयूष बबेले ने नेहरू को लेकर फैलाए जा चुके अनेक मिथ्या प्रकरणों के इस दौर में नेहरू के सत्य को क़ायम करने की कोशिश की है। आम तौर पर आज़ादी की मध्यरात्रि वाले भाषण का ही प्रचार प्रसार होता रहा है मगर पीयूष बबेले की किताब पढ़ कर लगा कि जब पहले भाषण की रिकॉर्डिंग है तो उनके बाक़ी भाषणों की भी होगी लेकिन उनका ज़िक्र कभी सार्वजनिक बहसों में नहीं आया। अलग अलग वर्ष में पंद्रह अगस्त के मौक़े पर नेहरू के संबोधनों को लेकर पीयूष ने ज़रूरी विश्लेषण किया है। नेहरू के हर भाषण में आज़ादी एक स्थायी भाव है। वे लगातार जनता को आज़ादी का मतलब बता रहे हैं और उसमें एक निरंतरता भी है। बल्कि वही निरंतरता लगातार निखरती जा रही है। 

पीयूष की यह किताब इस मायने में एक ज़रूरी हस्तक्षेप है। लाखों लोगों ने बिना किसी तथ्य के नेहरू के बारे में ग़लत ही सही मगर जान लिया है। जिस नेहरू को उनकी ही विरासत के लोगों ने छोड़ दिया था, उस नेहरू को बदनाम करने वालों ने फिर से जनमानस में क़ायम कर दिया है। अफ़सोस कि वह सही नेहरू नहीं है। नेहरू के नाम पर लीपापोती करने वालों ने ग़लती कर दी। इतना झूठ फैला दिया कि अब सही नेहरू की ललक जागेगी। इसी संदर्भ में यह किताब एक सही वक़्त में आपके हाथों में है। अच्छी बात यह है कि हिन्दी में यह काम हुआ है। नेहरू पर अंग्रेज़ी में कई सामग्री उपलब्ध है। हिन्दी में भी है मगर हिन्दी में नेहरू पर अभी और भी बहुत कुछ लिखे जाने की ज़रूरत है। 
पीयूष बबेले की आरंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में हुई है। अपने स्कूल के दिनों के संदर्भ से भी पीयूष नेहरू और संघ के राष्ट्रवाद को देख रहे हैं। यह एक दिलचस्प और पीड़ादायक वैचारिक यात्रा रही होगी। लेखक और पत्रकार पीयूष अपने स्कूल के दिनों के भाषणों और सवालों को बाद के जीवन में परखते हैं। उनकी सीमाओं को समझते हैं। नेहरू पर किताब लिखते लिखते एक लेखक के रूप में पीयूष खुद भी झूठ पर आधारित समझ से बाहर आते दिखते हैं। वो नेहरू को परखते हैं, उससे ज़्यादा संघ की शाखा में अपनी ट्रेनिंग और समझ पर सवाल करते है। लेखक को लिखते हुए काफ़ी कुछ सहना पड़ा होगा। लिखने के बाद भी सहना पड़ेगा। लेखक की यह ईमानदारी सराहनीय है। यह बताती है कि विचारों की यात्रा हर मोड़ पर रूक कर उसे भी सवाल करने की होती है। नया जान कर पुराने को छोड़ देने की भी होती है। यह किताब इस बात का प्रमाण है कि नेहरू के क़रीब जाने पर उनका असर कैसा हो सकता है। इसलिए नेहरू को गालियाँ देने वाले नेहरू से भय खाते हैं।” पीयूष बबेले के फेसबुक वॉल से साभार