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सभी फोटो- बिपिन कुमार सिंह

पुष्य मित्र

आपके घर के बाहर अगर मोर नज़र आ जाए तो बरबस ही मन नाच उठेगा और बचपन की धुंधली यादें ताजा हो जाएंगी जब खेत-खलियानों में मोर का दिखना आम बात होती थी, लेकिन वक्त बदला, समाज बदला और पर्यावरण में परिवर्तन आया । मोर गलियों से निकलकर चिड़ियाघर की शोभा बढ़ाने लगे । फिर भी जब कभी मोर नजर आते हैं तो मन में यही उठता है कि दिल मांगे मोर । ऐसे में जरा सोचिए वो गाांव कितना खुशनसीब होगा जिसकी सुबह मोरों की आवाज से होती हो और शाम मोरों की नाच से । जहां एक दो नहीं बल्कि पूरा कुनबा बसा है । हम बात करे रहे हैं बिहार के सहरसा जिले में पड़ने वाले आरण गांव की । इस गांव में जितने मोर आपको नज़र आएंगे उतने शायद ही किसी जंगल में बचे हों । आरण गांव का मोरों से लगाव ऐसा है जैसे मां और बेटा का होता है । कोई किसी दरवाजे पर दाना चुगता नजर आता है तो कोई किसी घर में घुस कर अनाज की बोरी पर हाथ साफ करता। कोई किसी ग्रामीण महिला के हाथ से रोटी सब्जी खाता नजर आ जाएगा तो कोई बीच सड़क पर पंख फैलाये नाचता  दिखाई दे जाएगा । ये आरण गांव का सौभाग्य ही है कि जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग तरसते रहते हैं वो इनको सहज ही मिल रहा है ।

मोरों के गांव आने की कहानी

आरण में मोरों के कुनबे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है । स्थानीय लोग बताते हैं कि 25 साल पहले पंजाब से एक जोड़ी मोर-मोरनी लाए गए । आरण गांव उसे जोड़े को रास आया और एक-एक कर उनके कुनबे में आज 500 से ज्यादा मोर हो गए । हालांकि इसका श्रेय गांव के अभिनंदन यादव को जाता है । गांव में मोरों को बसाने वाले गभिनन्दन यादव उर्फ़ कारी झा अब बुजुर्ग हो गये हैं। वो बताते हैं कि 1991 में गांव के प्रवासी मजदूरों ने नर और मादा मोर का छोटा सा बच्चा उन्हें लाकर दिया था। मैंने बड़े जतन से इस जोड़े को पाला। पता लगाया कि ये बच्चे क्या खाना पसंद करते हैं। जानवरों से इनकी सुरक्षा कैसे होगी, फिर जब दोनों बड़े हुए तो पहली दफा मोरनी ने छह अंडे दिए। इनसे छह बच्चे हुए, फिर इन छह मोरों से कई और मोर हो गए। महज तीन चार साल में हमारा आंगन मोरों से भर गया । संख्या बढ़ी तो ये मोर आंगन से निकलकर गांव की गलियों में विचरण करने लगे । गांववालों को भी ये रास आने लगे और धीरे-धीरे इन मोरों ने बस्ती से सटे बांस, आम और दूसरे पेड़ों के बगीचे में अपना डेरा डाल लिया । कुछ सालों में ही ये पालतू से पूरी तरह स्वतंत्र हो गये। तब से उनका कुनबा लगातार बढ़ रहा है।

अभिनंदन यादव

मोर जब से कारी झा का घर छोड़ कर जंगल में बसे, वे तो आजाद हो गये मगर पूरे गांव से उनका नाता जुड़ गया। वे हर किसी के दरवाजे पर नजर आने लगे, हर गांव वालों के घर में घुसने लगे और खेतों में फ़सल को नुकसान पहुँचाने लगे,लेकिन कभी किसी ने मोरों के उत्पात का बुरा नहीं माना। ज्यादा से ज्यादा इतना किया कि आवाज़ लगा कर भगा दिया। समाजिक कार्यकर्ता कृष्ण कुमार कुंदन कहते हैं, उनका गांव यदुवंशियों का गांव है। यहाँ लोग पशुपालक हैं, इसलिए पक्षियों से भी स्नेह करते हैं और मोर के पंख तो भगवान कृष्ण के श्रृंगार का हिस्सा हैं। बस दुख इस बात का है कि इन मोरों की वजह से गांव में कोई व्यक्ति गोभी की खेती नहीं कर पाता क्योंकि गोभी के फूल इन्हें अति प्रिय हैं और उन्हें उगने से पहले मोर खा जाते हैं।

गांव के बाहर नहीं रखते कदम 

peacock4आरण गांव में कुल 700-800 घर होंगे । खेत-खलिहान मिलाकर ये गांव काफी दूर तक फैला है लिहाजा ये मोर गांव में सुीक्षित और सुकून महसूस करते हैं यही वजह है कि ये कभी गांव से बाहर जाते ही नहीं । कई बार इलाके के नामी-गिरामी नेता और उच्च पदाधिकारी यहाँ से मोर का बच्चा पालने के लिए ले गये मगर कहीं और ये सर्वाइव नहीं कर पाये। अब तो गांव वाले किसी को मोर का बच्चा लेने ही नहीं देते । गांव के एक किसान मिलिंद कुमार बताते हैं कि कई दफा तो बहेलिया भी मोर पकड़ने गांव आ गये लेकिन उनकों गांव में घुसने नहीं दिया गया । सालों से साथ रहते-रहते गांव के लोग इन मोरों की जीवन चर्या से भी परिचित हो गये हैं। कृष्ण कुमार कुंदन बताते हैं कि इन दिनों मोरनियाँ अपने बच्चों की परवरिश में व्यस्त हैं इसलिए सिर्फ मोर नजर आ रहे हैं। फरवरी-मार्च में मोरों के शरीर में नये पंख आने लगते हैं। उसके बाद अप्रैल, मई महीना उनके पाल खाने (ब्रीडिंग का) होता है। अंडों से एक से डेढ़ महीने में बच्चे निकल आते हैं। छोटे बच्चों को दूसरे जानवरों से बचाना मुश्किल काम होता है। माताएं उन्हें बड़ा करती हैं। फिर दशहरा का वक़्त आते-आते बच्चे मादा के साथ टहलते हुए नजर आने लगे हैं।

गांव को लुभाता है मोरों का नृत्य

मिलिंद बताते हैं कि मोर साल में एक बार अपने सारे पंख खुद नोच कर गिरा देते हैं। उस वक़्त गांव के सारे बच्चे पंख जमा करने इनके पीछे-पीछे घूमते रहते हैं। आप इनके नीचे गिराये गये पंख तो चुन सकते हैं, मगर आप चाहेंगे कि इनके शरीर से पंख नोच लें यह मुमकिन नहीं। ऐसी कोशिश करने वाले तीन-चार लोग घायल हो चुके हैं। फरवरी मार्च महीने में इनके नये पंख आने लगते हैं। जब इनके सारे पंख आ जाते हैं तो मोरनी को रिझाने के लिए यह नाचता है। उस वक़्त गांव का माहौल ही बदल जाता है। कई वक़्त ये नाचते-नाचते सड़क पर आ जाते हैं। उस वक़्त लोग गाड़ी रोक कर इनका नाचना देखने लगते हैं।

सरकार से मोरों की सुरक्षा की मांग

कारी झा बताते हैं कहते हैं, अब तक मोरों की सुरक्षा गांव के लोग ही करते रहे हैं, लेकिन हर दिन इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है ऐसे में सरकार थोड़ी मदद करे तो गांव में पर्यटन भी बढ़ेगा और गांववालों को सुविधा भी होगी । वैसे जिसको इस बारे में पता है वो मोरों को देखने आरण गांव आते-रहते हैं फिर भी पर्यटन विभाग मदद करे तो इससे गांव का रेवेन्यू भी बढ़ाया जा सकता है साथ ही पर्यटन का एक नया केंद्र भी विकसित हो जाएगा । जो गांव और सरकार दोनों के लिए बेहर होगा ।

PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।

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