ब्रह्मानंद ठाकुर

आज हम चांद और मंगल पर घर बसानों की सोच रहे हैं, लेकिन जो धरती पर हैं उनकी सुध नहीं ले रहे। आखिर दुनिया में अमीर और गरीब क्यों है ? क्यों होता है कमजोरों पर बलवानों का अत्याचार ? आखिर क्यों खत्म होता जा रहा है मानवता का भाव ? ऐसे ही कई सवाल हैं, जो इस दुनिया के कमजोर, लाचार और बेबस लोगों के दिलों में हमेशा से उठते रहे हैं। कई महापुरुषों ने समय-समय पर अपने स्तर से इन सवालों का जबाव ढूंढने की कोशिश की, समस्याओं के समाधान का भी प्रयास किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। काफी समय बाद सामाज विकास के एक खास स्तर पर इन समस्याओं का समाधान तब सम्भव हुआ जब यह तथ्य सामने आया कि इस विषमता का मूल कारण वर्ग शोषण है। इस वर्ग शोषण का खात्मा कर ही कमजोरों पर बलवानों के अत्याचार और अमीर-गरीब के अंतर को मिटाया जा सकता है। अगर उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व की जगह सामाजिक स्वामित्व कायम कर दिया जाए, पूंजीवादी राजसत्ता की जगह समाजवादी राजसत्ता स्थापित कर दी जाए तो सामाजिक शोषण पर लगाम लग सकती है। इसे सच कर दिखाया सोवियत रूस में मार्क्सवादी दर्शन के आधार पर नवम्बर क्रांति के जरिए लेनिन ने। सोवियत रूस में लेनिन के नेतृत्व में यह क्रांति नवम्बर 1917 में हुई थी।

नवंबर क्रांति के 100 बरस-एक

फोटो- साभार विकीपीडिया

यह नवम्बर क्रांति का सौंवा साल है। हालांकि यह भी सच है कि लेनिन-स्टालिन की मृत्यु के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने मार्क्स, एंगल्स, लेनिन और स्टालिन की सीखों से प्रेरणा लेकर समाजवाद की राह पर चलने की बजाय संशोधनवादी राह पकड़ ली और नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे पूंजीवादी संस्कृति और नैतिकता ने सोवियत समाजवाद को अपनी गिरफ्त में ले लिया। इस संशोधनवाद ने धीरे-धीरे शक्ति संचय करते हुए वहां पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी और सोवियत समाजवाद ध्वस्त हो गया। शायद इसीलिए लेनिन ने पहले ही चेताया था ।

“समाजवाद कायम हो जाने भर से ही वर्ग संघर्ष लुप्त नहीं हो जाता। सत्ता से हटा दिया गया पूंजीपति वर्ग फिर दोबारा सत्ता में आने का हर सम्भव प्रयास करता है। समाजवाद धीरे-धीरे जितना ताकतवर होता जाता है, पूंजीवाद का प्रतिरोध उतना ही तेज होता जाता है। लेनिन ने यह भी कहा  था कि करोड़ों लोगों की आदत की यह शक्ति बड़ी भयंकर होती है। इसे एक झटके में दूर नहीं किया जा सकता। इसे दूर करने के लिए दीर्घकालीन और कठोर संघर्ष की जरूरत होगी। सचेत और सतर्क संघर्ष नहीं रहा तो प्रतिक्रांति का खतरा बढ़ जाएगा। समाजवाद खतरे में पड़ जाएगा और तब पूंजीवाद दोबारा सत्ता में वापसी कर सकते हैं।”

लेनिन की आशंका सही साबित हुई। लेनिन की मृत्यु नवम्बर क्रांति के सात साल बाद 21 जनवरी 1924 को हुई। इसके बाद उनके योग्य उत्तराधिकारी स्टालिन सत्ता में आए। स्टालिन मृत्यु पर्यंत 5 मार्च 1953 तक सत्ता में रहे। इस दौरान सोवियत संघ में समाजवाद बड़ी तेजी से फला-फूला । स्टालिन के बाद ख्रुश्चेव उनके उत्तराधिकारी बने। इन्होंने सीपीएसयू की 20 वीं कांग्रेस में लेनिन-स्टालिन की विचारधारा और परम्परा को धता बताते हुए संशोधनवाद की ओर कदम बढा दिया। फिर उसका जो परिणाम हुआ वह जगजाहिर है।

फाइल फोटो- जार निकोलस का परिवार

नवंबर 1917 में क्रांति से पहले रूस में सामंतवादी व्यवस्था थी। राजशाही की निरंकुश जार निकोलस द्वितीय की सत्ता कायम थी। यूरोप की औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप रूस में मीलें और कल-कारखाने जितनी तेजी से विकसित हो रहे थे, मजदूर वर्ग की संख्या और उनकी ताकत भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही थी। वे हड़ताल कर रहे थे, एक साथ काम बंद कर रहे थे, मजदूरी बढ़ाने और काम के घंटे निर्धारित करने की मांग कर रहे थे। सेवा शर्तों में बदलाव, बच्चों की शिक्षा और उनके इलाज का बेहतर प्रबंध और इंसानों के रहने लायक मकान की व्यवस्था करने की मांगों को लेकर उनका आंदोलन बढ़ता ही जा रहा था। उस समय मजदूरों का यह आंदोलन दो धाराओं में बंटा हुआ था। एक धारा अर्थवादियों की धारा थी, जो चाहते थे कि मजदूर केवल अपनी आर्थिक मांगों को लेकर ही अपने नियोक्ता के विरुद्ध संघर्ष करें। जिसक लक्ष्य सिर्फ खुद के आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाना होगा। राजनैतिक संघर्ष मजदूरों का काम नहीं है। वह उदारपंथी पूंजीपतियों का काम है। मजदूरों को चाहिए कि वे इन उदारपंथी पूंजीपतियों का समर्थन करें।

दूसरा धड़ा लेनिन का था। उन्होंने अर्थवादियों के इन विचारों का विरोध किया। उनका मानना था कि आर्थिक मांगों को लेकर मजदूर आंदोलन को सीमित करने के मायने है कि गुलामी को उनके जीवन का अंग मान लेना । उन्होंने जोर देकर कहा था कि मजदूर आंदोलन का मुख्य केन्द्र बिन्दु होगा सर्वहारा का राजनैतिक मुक्ति आंदोलन। तब लेनिन ने यह भी कहा था कि क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता।

फोटो साभार- फ़ाइन आर्ट अमेरिका

इस बीच 1904 के जनवरी महीने में रूस और जापान के बीच युद्ध छिड़ गया। इस लड़ाई में जारशाही की कमर टूट चुकी थी। दूसरी ओर राजशाही के प्रति रूसी जनता का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा था। मजदूरों की हड़ताल रुकने का नाम नहीं ले रही थी । जारशाही सरकार में एक पादरी जिसका नाम गेपन था, का इस्तेमाल करते हुए उसके सहयोग से रूसी मिल मजदूरों का एक संघ बनवा। इसकी शाखाएं हर जगह गठित की गईं। जब हड़ताल शुरु हुई तो गेपन ने सुझाव दिया कि सभी मजदूर एक जगह इकठ्ठा हो कर शांतिपूर्ण जुलूस के रूप में जार की तस्वीरें और झंडा लेकर जार के शरद प्रासाद तक चलें और उन्हें अपनी मांगों से सम्बंधित अर्जी पेश करें, जार उनकी मांग अवश्य पूरी करेगा, लेनिन की वोल्शेविक पार्टी ने मजदूरों को ऐसा न करने की सलाह दी। फिर भी मजदूरों का एक बड़ा तबका जुलूस के पक्ष में था। उसे भरोसा था कि जार उनकी बात अवश्य सुनेगा। लिहाजा वोल्शेविक पार्टी ने भी इस जुलूस में शामिल होने का फैसला किया। 9 जनवरी 1905 की सुबह रविवार को पादरी गेपन के नेतृत्व में जुलूस शरद प्रासाद की ओर बढ़ने लगा। इसमें 1 लाख 40 हजार से ज्यादा लोग शामिल थे। जब जुलूस शरद प्रासाद के निकट पहुंचा तो जार की फौज ने गोलियों से उसका स्वागत किया। एक हजार से ज्यादा मजदूर मारे गये। करीब दो हजार घायल हुए। इन दिन को रूस के इतिहास में खूनी रविवार के नाम से आज भी जाना जाता है । इस तरह मजदूरों के उस विद्रोह को कुचल दिया गया। इसके बाद क्रांति का ज्वार धीरे-धीरे शांत हो गया, लेकिन लेनिन ने हार नहीं मानी। वोल्शेविक पार्टी ने अपने नेता लेनिन के नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन को बचाए रखा।

इसी दौरान 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया । जिसमें एक ओर फ्रांस और रूस थे तो दूसरी ओर जर्मनी, आस्ट्रेलिया और हंगरी। एक अगस्त को जर्मनी ने रूस के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। युद्ध के इस दौर में समाजवादियों की भूमिका लेनिन ने तय कर दी। लेनिन का कहना था कि किसी देश का मजदूर वर्ग अगर अपने देश के साम्राज्यवादियों द्वारा दूसरे देश को हड़पे जाने के खिलाफ संघर्ष नहीं करता तो उस देश का मजदूर वर्ग मुक्ति हासिल नहीं कर सकता। इस बीच युद्ध के तीन साल बीत गये। जार की फौज लगातार हारती जा रही थी। आखिरकार 1916 में जर्मनी ने सारा पोलैन्ड और बाल्टिक प्रांतों के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। इस पराजय से आर्थिक बदहाली ने विकराल रूप धारण कर लिया। 1917 के जनवरी और फरवरी महीने में खाद्यान्न, कच्चा माल और ईंधन की आपूर्ति ठप हो गई। बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया। 26 फरवरी 1917 को राजनीतिक हड़तालों और विद्रोह प्रदर्शन ने बगावत का रूप ले लिया। विद्रोही मजदूर और सैनिकों ने जार के मंत्रियों और सेनापतियों को गिरफ्तार कर लिया। जेल में बंद क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया गया। इस प्रकार फरवरी महीने में रूस में पहली पूंजीवादी क्रांति सफल हुई।करेन्सकी के नेतृत्व में सरकार बनी।

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यह अस्थाई सरकार पूंजीवादी अधिनायकत्व का प्रतिनिधित्व कर रही थी । जबकि मजदूर और सैनिकों की सोवियतें सर्वहारा वर्ग और किसानों की प्रतिनिधि थीं। फरवरी क्रांति ने रूस की सरजमीं पर दोहरी सत्ता कायम कर दी। लेनिन ने इसे समझा । फिर क्रांति की तैयारी जोर-शोर से चलने लगी। इस पर पहला प्रहार करेन्सकी की सरकार ने किया। 6 नवम्बर 1917 को प्रतिक्रांतिकारियों की फौज की एक टुकडी ने वोल्शेविक पार्टी के मुख्य पत्र ‘ राबोची पुत ‘ (मजदूर पथ) की छपाई बंद करने का हुक्म दिया। मजदूरों ने इसे मानने से इन्कार करते हुए प्रतिक्रांतिकारी सैनिकों को घेर लिया। स्टालिन के निर्देश पर दो बख्तर बंद गाडियों ने उन सैनिकों को खदेड़ दिया। इस हमले की खबर मिलते ही लेनिन ने एक पत्र लिख कर तत्काल करेन्सकी की सरकार को हटाने का फरमान जारी कर दिया। लेनिन ने खुद इस क्रांतिकारी विद्रोह के संचालन की कमान अपने हाथ में ली । अपने नेता का यह संदेश पाते ही क्रांतिकारी सडकों पर उतर पड़े। सभी महत्वपूर्ण जगहों और संस्थानो पर कब्जा कर लिया गया। रात तीन बजे करेन्स्की के नेतृत्व वाली सरकार के दो मंत्रियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

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7 नवम्बर 1917 की सुबह तक राजधानी के सभी महत्वपूर्ण केन्द्र क्रांतिकारियों के कब्जे में थे। लेकिन शरद प्रासाद क्रांतिकारियों के कब्जे में नहीं आ सका । क्रांतिकारी सामरिक कमेटी ने तुरत निर्देश जारी किया कि इस बार प्रचंड हमला कर शरद प्रासाद पर कब्जा किया जाए। रात 9 बजे निर्देश मिलते ही क्रांतिकारियों ने शरद प्रासाद पर धावा बोल दिया । क्रांतिकारियों के फौज की एक छोटी टुकडी शरद प्रासाद में प्रवेश की। उस समय रात के दो बज रहे थे। शरद प्रासाद के पतन के साथ ही करेन्सकी के नेतृत्व वाली बुर्जुआ सरकार का अस्तित्व मिट गया। इस तरह रूस में लेनिन के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति सफल हुई जिसे महान नवम्बर क्रांति के नाम से याद किया जाता है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।