विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

नजदीकी रिश्ते की एक भाभी थीं, दो साल बड़ी रही होंगी मुझसे। बहुत मानती थीं मुझे, मैं भी उन्हें बहुत मानता था। बहुत गुस्से वाली भी थीं। एक रोज गुस्से में उन्होंने बोल दिया कि मेरे घर कभी मत आइएगा। गुस्सा ठंडा भी हुआ, लेकिन कैसे अपनी बात वापस लें, मेरा असमंजस कि जब तक वो न कहें, कैसे उनके घर जाऊं। भाई साहब न्यूट्रल हो गए थे, बोले कि आपस का मसला है तुम दोनों का, मैं कुछ नहीं कहूंगा। करीब दो साल बीत गए, पहल किसी तरफ से हुई नहीं। हालांकि मेरे प्रति उनका छलकता स्नेह तमाम लोगों की बातों के जरिए मुझ तक पहुंचता था। एक रोज मैं सीधा गया उनके पास, अपनों से क्या मान, क्या अपमान..? घर के भीतर गया, उनके पांव छुए, कहा-भाभी आपके कंधे नफरत का ये बोझ उठाने के लिए बहुत कमजोर हैं। मैं सरेंडर कर रहा हूं। फिर हम दोनों ही कम बोले, दोनों की बरसती आंखों ने बहुत देर तक बात की। उसके बाद से हमारा रिश्ता और भी मजबूत बनकर उभरा।

ऐसा ही एक और किस्सा मैंने फेसबुक पर पहले भी बयां किया था। तब मैं न्यूज 24 में काम करता था। चैनल की एक एंकर की एक गलती पर मैं अचानक चीख पड़ा था। जोर से चिल्लाया उन पर। उस वक्त वो फौरन स्टूडियो में चली गई थीं। जब लौटीं तो उनकी बारी थी, जोर से चीखीं-‘इनफ इज इनफ। कोई मुझ पर इस तरह से चिल्ला नहीं सकता।’ इसके बाद वो दफ्तर से बाहर चली गईं। तारीफ ये भी थी कि जब मैं चीखा था तो वो कुछ नहीं बोली थीं, जब वो चीखीं तो मैंने भी कुछ नहीं कहा। यहां ये बता दूं कि उनसे मेरे बहुत ही अच्छे रिश्ते थे। खैर, अगले दिन से बोलचाल बंद। एक हफ्ता बीत गया। इस बीच नजरें एक दूसरे से मिलतीं, फौरन फिर भी जातीं, एकाध बार मुस्कुराकर भी फिरीं। एक दिन मेरे पास एक और साथी आए, बोले-‘आपने तो अच्छा सबक सिखा दिया मैडम को, दिमाग बहुत खराब हो गया था उनका।’ मैं चौंका, फौरन एहसास हुआ कि एक अच्छे रिश्ते के बीच कुछ कानाफूसी वाले जगह बना रहे हैं और फर्क बढ़ाने की कोशिशों में हैं। शाम को मैंने उन एंकर को फोन किया। फौरन फोन उठा, बोलीं- हां विकास जी, नमस्कार। मैंने उनसे भी कुछ वही कहा कि नफरतों का बोझ हम लोग लंबे वक्त तक ढो नहीं पाएंगे। फिर वही भीगी पलकों के कुछ डायलॉग और तबसे लेकर आजतक ये रिश्ता फेविकोल के मजबूत जोड़ के साथ अटूट है।
छोटी सी बात ही होती है, जो बड़ी-बड़ी खाइयां पैदा कर देती है। रिश्तों की नजदीकियों को दूरियों में तब्दील कर देती है। झूठा अहंकार मन में विकार पैदा करता है। इंसान भांप ही नहीं पाता कि स्वाभिमान का भेष बनाकर अहंकार उसे भीतर से खोखला कर रहा है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान पढ़ने पढ़ाने के अलावा एक और काम मुझे खूब मिला हुआ था। दो लोगों के झगड़े खत्म करवाने का। कई बार रूम पार्टनर्स आपस में लड़ जाते थे, बोलचाल बंद हो जाती थी। समझौता करवाने मैं जाता था। शाम तक फरिया भी जाता था। दोनों लोग हाथ मिलाते, गले मिलते और फिर पूड़ी-सब्जी के साथ समापन होता। मैं देखता था कि जरा जरा सी बात पर लोग बरसों के याराने खत्म करने के दहाने पर खड़े हो जाते थे।

एक दोस्त को शिकायत कि उसका पार्टनर चाय बनाता नहीं सिर्फ पीता है, वो अगर हफ्ते में 14 बार में से 10 बार चाय बनाता था, तो पार्टनर 4 बार। मैंने कहा-बगल में ही चाय की दुकान है। वहीं चाय पी आया करो। चाय कमरे पर बनाना बंद कर दो। बात मान ली गई, झगड़ा खत्म। थोड़ी देर बाद मैंने कहा-चलो भाई चाय बनाओ जरा। दोस्त बोला- अभी-अभी तो घर में चाय न बनने का मसौदा पास हुआ है। हमारी सलाह, हमीं पर लाद दिया।

दो लोगों का जब रिश्ता होता है, तो उसमें कितनी मुहब्बत होती है, इसका कोई हिसाब नहीं होता, ये बेहिसाब होता है, लेकिन किसने क्या गलत बोल दिया, इसका हिसाब बन जाता है, बही खाता बन जाता है। उसने मुझे ये क्यों कहा, उसकी क्या बिसात, उसकी इतनी मजाल..? दूसरा भी कुछ ऐसे ही सोचता है…ऐसे में रिश्तों को फंगस लग जाता है। मैं अब भी ऐसे झगड़े, ऐसे विवाद सुलझाता हूं। यहां तक कि मेरी पत्नी की अगर किसी से खटक जाती है तो उसे भी सुलझवाने की कोशिश करता हूं। कैसे-कैसे उपाय करने पड़ते हैं कि पूछिए मत।
साल के आखिरी दिन इस विषय पर पोस्ट करने का खास मकसद है। कई बार छोटी छोटी बातों से बरसों पुराना रिश्ता दांव पर पड़ जाता है। रिश्ते के सारे अच्छे पहलू भूल जाते हैं, मनुष्य का दिमाग तो वैसे भी निगेटिव चीजें तेजी से ग्रहण करता है। मैं इस मामले में बहुत सतर्क रहता हूं, क्रूरता से अपना मूल्यांकन करता हूं अगर कोई गलती अपनी महसूस होती है तो फौरन सरेंडर करता हूं। क्योंकि रिश्ते मेरे लिए बेशकीमती हैं। साल के आखिरी दिन आपसे भी यही गुजारिश है कि आपसे अगर कोई अपना नाराज है तो उसको मना लें, अगर आप किसी से नाराज हों तो उसे माफ कर दें, दिल को बहुत सुकून मिलेगा। नाराजगी मुक्त जीवन लेकर नए साल में प्रवेश करें। रहीम दास के दो दोहे आपकी बहुत मदद करेंगे, पहले में विधि है, दूसरे में चेतावनी-
रूठे सुजन मनाइये, जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिर-फिर पोइए टूटा मुक्ताहार।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परि जाय।

विकास मिश्रा।आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ संपादकीय पद पर कार्यरत। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के पूर्व छात्र। गोरखपुर के निवासी। फिलहाल, दिल्ली में बस गए हैं। अपने मन की बात को लेखनी के जरिए पाठकों तक पहुंचाने का हुनर बखूबी जानते हैं।