MADAVANGOVN

पुष्यमित्र

बात अगस्त की एक सुबह की है। दिन के 11 बजे होंगे, मुजफ्फरपुर के मड़वन खुर्द गांव में लोगों का मजमा लगा था। औरत-मरद और बच्चे सभी एक जगह खड़े होकर एक संस्था द्वारा पेश नुक्कड़ नाटक देख रहे थे। वे बात-बात पर खिलखिला उठते और ताली बजाने लगते। ये सब देख सहज विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि साढ़े चार महीने पहले हम इसी गांव में आये थे।

बदल रहा है मड़वन खुर्द

ये गांव यहां के बाशिंदों के शराब पीने की लत की वजह से बदनाम था। दो सौ घरों वाले इस गांव में शायद ही कोई घर ऐसा रहा होगा, जिसमें किसी न किसी सदस्य को शराब की बुरी लत ने अपना शिकार न बनाया हो। दर्जन भर लोगों की मौत शराब पीने की वजह से हो चुकी थी।  3-4 लोग गंभीर रूप से बीमार थे। कई लोग लीवर और किडनी की बीमारी से ग्रस्त थे। घर-घर में लड़ाई-झगड़ा, शोर-शराबा, मार-पीट, किसी के चेहरे पर खुशी नहीं, रौनक नहीं। महिलाएं शराबबंदी के ख़िलाफ़ आंदोलन करतीं और पुरुष सुबह से ही ठेके पर पहुंच जाते। ऐसा लगता कि पूरा गांव ही किसी गंभीर रोग का शिकार हो गया है।

तो क्या महज साढ़े चार महीने की शराबबंदी ने गांव का कायाकल्प कर दिया? क्या यह मुमकिन है? जब इस गांव की दूसरी यात्रा पर जा रहा था, तब भी मन में एक संशय था। लग रहा था कि दूसरे गांव बदल सकते हैं, मगर आकंठ शराब के नशे में डूबा रहने वाला यह गांव इतनी आसानी से नहीं बदल सकता। लोग चोरी-छिपे शराब पी ही लेते होंगे, शराब नहीं मिलती होगी तो दूसरे मादक पदार्थों का सहारा लेने लगे होंगे और नहीं तो चुप-चाप घरों में पड़े रहते होंगे। मगर गांव निरोग हो जायेगा, यह सोचना भी मुमकिन नहीं लग रहा था।

मड़वान गांव के लोग आज खुशहाल है
मड़वान गांव- लौट रही है मुस्कान

पहली मुलाकात मीना देवी से हुई। उनके चेहरे पर सहज ही मुस्कान खिल उठी। कहने लगी, आप लोगों की दुआ का फल मिल गया है। अब ठीक हो गये हैं, ड्यूटी पर जाने लगे हैं, नशा की आदत भी छूट गयी है। यही मीना देवी पिछली मुलाकात में फूट-फूट कर रोने लगती थीं। उनके पति गुरुशरण सिंह जो होमगार्ड के जवान थे, शराब की लत की वजह से नौकरी पर जाना छोड़ दिया था। रोज सुबह चार बजे से पीना शुरू कर देते थे। पीने के चक्कर में जमीन-जायदाद सब बेच दिया। इसकी वजह से घर में रोज झगड़ा होता था, मार-पीट, तोड़-फोड़। परिवार हमेशा मानसिक संत्रास की स्थिति में रहता था। मीना देवी कहने लगीं, पहले कुछ दिन परेशानी हुई। झूठ नहीं कहूंगी, कुछ दिन तो बेटा कैंटीन से लाकर उनको चोरी-छिपे शराब भी पिलाता रहा कि कहीं ज्यादा परेशानी न हो। अचानक थरथरी आ जाती थी, एक डॉक्टर से भी दिखाये और उनकी दवा चली। मगर धीर-धीरे सब ठीक हो गया। नौकरी पर जाते हैं और जो पैसा मिलता है मेरा हाथ में धर देते हैं। अब हमको और क्या चाहिये।

चार महीने पहले उदास बैठे रहते थे लोग
चार महीने पहले उदास बैठे रहते थे लोग
उनके पास बैठे गांव के बुजुर्ग रामनंदन सहनी कहते हैं, इनके पति के ठीक होने से सबसे बड़ा लाभ उन्हें हुआ है। क्योंकि रोज रात इनके घर में हंगामा मचता था और हमारी नींद उचट जाती थी। रामनंदन सहनी उनके पड़ोसी हैं। वे कहते हैं, शराबबंदी से इस गांव के घर-घर में शांति का माहौल हो गया है। रोज शाम से रात तक जो झगड़ा-झंझट और मार-पीट होता थी वह बंद हो गई है। पति-पत्नी में मेल हो गया है, दोनों एक तरीके से सोचने लगे हैं, ऐसे में तो घर आगे जायेगा ही। गांव की पूर्व वार्ड सदस्य लाल परी देवी कहती हैं, सिर्फ चार-छह लोगों को परेशानी हुई है, जो शराब बेचते थे, भट्ठी चलाते थे और चखना का दुकान चलाते थे। बाकी सारे लोग खुश हैं। अब कहीं-कहीं चोरी-छिपे शराब बिकती है, मगर गरीब लोगों के हाथ में इतना पैसा नहीं कि उसको खरीद कर पी सकें। यह डर भी रहता है कि कहीं पकड़े गये तो जिंदगी बरबाद हो जायेगी। इसलिए थोड़ा कष्ट सह लेते हैं। जिनको आदत थी उनको थोड़ी परेशानी रहती है, मगर धीरे-धीरे सब लोग एडजस्ट कर गये हैं।
वे महेश साह का जिक्र करती हैं, जिन्हें पिछले दिनों पटना के डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। लीवर की परेशानी थी, गरीबी की ऐसी हालत थी कि इलाज कराने दिल्ली भी नहीं ले जाया जा सकता था। घर में पड़े रहते थे और पत्नी सरस्वती देवी नास्ते की दुकान चलाती थी। लाल परी देवी ने बताया कि अब महेश साह बिल्कुल तंदुरुस्त हो गये हैं और ऑटो चलाते हैं। जो सरस्वती देवी बार-बार पूछने पर एक बार जवाब देती थीं और एक लाइन कहते-कहते रोने लगती थीं वो आज बुलाने पर मुस्कुराती हुई आयीं। पहले तो उलाहना दिया कि खबर छपने की वजह से उनके पति और उनकी बेटी के ससुराल वालों ने उनसे खूब झगड़ा किया। फिर कहने लगीं कि जाने दीजिये, जो हुआ सो हुआ। फायदा यह हुआ कि हमारा घर बच गया। पहले ये रिक्शा चलाते थे, अब टैंपू चलाने लगे हैं। बच्चा सब भी स्कूल जाने लगा है। आप लोगों की मेहरबानी से अब सब ठीक है।
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रामनंदन सहनी कहते हैं, यह जो लोगों के चेहरे पर खुशी और रौनक देखते हैं न यही शराबबंदी का सबसे बड़ा तोहफा है। अब इस नौजवान किशोर साह को देखिये। पहले आप इसकी पसली गिन सकते थे, अब देखिये कितना तंदुरुस्त दिखता है। ऐसे ही गणेश राम नामक एक और जवान है, वह पहले सुबह तीन बजे से ही शराब पीने लगता था। शराबबंदी हुई तो शरीर कांपने की बीमारी शुरू हो गयी। कुछ दिन इलाज कराया अब सब ठीक है। लालपरी देवी कहती हैं, चौक-चौराहों पर जो फालतू का जमघट होता था, जिसकी वजह से शरीफ लोगों का और औरतों का बाजार जाना मुश्किल हो जाता था वह कम हो गया है। माहौल बदला है, अब गांव, गांव जैसा लगता है। पहले अपने घर का लड़का पराया लगने लगता था। हां, कुछ लोग भांग पीते हैं औऱ कुछ लोग ताड़ी का भी सेवन करते हैं। लोग कहते हैं कि ताड़ी पर रोक नहीं लगना चाहिये। उससे कई लोगों की रोजी-रोटी भी चलती है और उसमें ज्यादा खराबी भी नहीं है। देखिये, सरकार क्या करती हैं। मगर यह बात तो है कि शराबबंदी ने हमको हमारा गांव लौटा दिया है। मड़वन खुर्द को स्वर्ग बना दिया है।

(साभार-प्रभात ख़बर)

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।


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