पुष्यमित्र

पंजाब, यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनावी मौसम। कहीं अखिलेश-राहुल जलवा बिखेर रहे हैं तो कहीं केजरीवाल-भगवंत मान की चर्चाएं होती रही। इन पांचों राज्यों में मोदी-अमित शाह घूम-घूम कर भाषण देते रहे हैं, मगर इनके भाषण घिस चुके रिकार्ड की तरह बजते नजर आ रहे हैं। एक ही स्टाइल, एक ही तरह के जुमले। मतदाता पिछले तीन सालों से यह सब सुनकर पक गया है। जमीनी रिपोर्ट्स यही बता रही हैं कि मोदी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता के बावजूद इन चुनावों में भाजपा घटत पर है। चर्चाओं में पिछड़ रहा है, वोटिंग में क्या हो पता नहीं।

बिहार के चुनाव में भी यही सब हुआ। मोदी और अमित शाह अकेले अपने दम पर बिहार परिक्रमा करते रहे। लोगों की भीड़ उमड़ती रही, मगर भीड़ नतीजे में नहीं बदल पायी। लोकल ब्रदर्स वाला प्रशांत किशोर का फार्मूला कामयाब हो गया। अब उसी फार्मूले को लेकर वे यूपी में बीजेपी का खेल बिगाड़ने में तुले हैं। और ऐसा नजर आ रहा है कि बीजेपी इस बार भी इस फार्मूले की काट तलाश नहीं पा रही। आखिर वजह क्या है?

गौर कीजियेगा तो मालूम होगा कि किसी भी राज्य में बीजेपी के पास लोकल ब्रदर्स क्या लोकल फिगर भी नहीं है। बिहार के चुनाव में भी एक तरफ पोस्टरों पर दो बिहारी नीतीश और लालू दिखते थे तो दूसरी तरफ दो गुजराती मोदी और अमित शाह। सफलता के नशे में संभवतः मोदी भूल गये थे कि वे और अमित शाह मिलकर पूरी दुनिया नहीं जीत सकते। बिहार-यूपी जैसे राज्यों में लोकल चेहरों का अपना महत्व होता है। बिहार में उन्हें अपनी इस भूल का खामियाजा भुगतना पड़ा।

दिलचस्प तथ्य तो यह है कि इन हार के बावजूद बीजेपी नहीं बदली। वह देश के सभी राज्यों में अपना सीएम चाहती है, मगर उसके साथ विडंबना यह है कि किसी भी राज्य में उसके पास कोई मजबूत चेहरा नहीं है। जहां है भी उसे भी लगातार डाउन रखने की कोशिश की जा रही है, ताकि मोदी के सर्वमान्य चेहरे को अंदर से चुनौती नहीं मिले। इसी कोशिश में शिवराज, रमन सिंह, वसुंधरा जैसे मजबूत क्षत्रपों को डाउन करके रखा गया। बिहार-यूपी और अन्य राज्य में किसी चेहरे को उभरने नहीं दिया गया। वरुण गांधी को शंट कर दिया गया। सुशील मोदी को कमजोर किया गया। यह माना गया कि मोदी जिसे कह देंगे जनता उसे नेता मान लेगी।

मगर आज की तारीख में यह राजनीति चलने वाली नहीं है। वह इंदिरा का दौर था, जब यह सब चल जाता था। आज तो हर जगह चेहरे की लड़ाई है। अगर बिहार में जीतना है तो आपके पास नीतीश की टक्कर का नेता होना चाहिये, यूपी में अखिलेश को चुनौती देने वाला फेस चाहिये, पंजाब में जिस तरह केजरीवाल पंजाबी बन गये हैं, वैसा लीडर चाहिये। पब्लिक यह तो देखती है कि मोदी जी हैं। मगर लोकल नेताओं की भीड़ में कमजोर चाटुकारों को देख कर बिदक जाती है। वह नहीं चाहती कि कोई खट्टर उस पर राज करने लगे।

असम की जीत बीजेपी के लिए उदाहरण हो सकती थी। जहां उसने मजबूत चेहरा दिया और चेहरे ने नतीजा दिया। मगर शायद अभी बीजेपी और मोदी के सिपहसालार बड़े राज्यों में ऐसा रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं दिखते। संभवतः वे डरते हैं कि कोई भी लोकल क्षत्रप मोदी को चुनौती दे सकता है। मोदी के इतने मजबूत होते हुए भी जब उसके क्षत्रप वरुण गांधी तक से डरते हैं तो बीजेपी और मोदी के अंदर बैठे भय को समझा जा सकता है। यह समझा जा सकता है कि मोदी यूपी-बिहार गंवा सकते हैं मगर बीजेपी में एक मजबूत लोकल नेता नहीं देख सकते।

मगर यह सब न मोदी के लिए बेहतर है, न बीजेपी के लिए। कांग्रेस इस पॉलिसी की वजह से लगातार भुगतती रही है। वहां लगातार कोशिश की जाती रही कि कोई नेता इतना मजबूत न हो कि राहुल को चुनौती मिलने लगे। इस कोशिश में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरे युवा नेताओं को डाउन करके रखा गया। अब बीजेपी में भी यही सब हो रहा है।

अगर यह सच है कि मोदी इस कॉम्प्लेक्स के शिकार हैं तो यह उनके लीडरशिप की क्षमताओं को सीमित कर रहा है। अच्छा लीडर वह होता है जो अपने नेतृत्व में अपने उत्तराधिकारी को लगातार ग्रूम करने में मदद करे। वह खुद भी आगे बढ़े और दूसरों को आगे बढ़ने दे। जो लोगों के पर कतरने में लगा रहता है, वह एक कमजोर नेता होता है। ऐसा हमने अपने अनुभव से समझा है। बांकी यह बीजेपी का अंदरूनी मामला है. वह जो चाहे करे. मगर यह दीवार पर लिखी इबारत है कि लोकल चेहरों के अभाव में बीजेपी इस बार पिछड़ रही है।


PUSHYA PROFILE-1पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।

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