अरुण यादव

कंक्रीट के जंगल में रहते हुए 13 बरस 9 महीने हो चुके हैं। दिल्ली में कदम रखने के साथ ही तय किया था कि कुछ भी हो जाए हर 6 महीने में कम से कम 10 दिन के लिए गांव जरूर जाऊंगा। टारगेट कोई ऐसा नहीं था जिसे पूरा ना किया जा सके। कई साल तक उस पर अमल भी करता रहा, लेकिन जैसे जैसे वक्त बीता ना जाने कब 6 महीने का अंतराल 12 महीने में बदल गया और 10 की समय सीमा एक-दो दिन में बदल गई पता भी नहीं चला। अब इसे वक्त की कमी कहें या फिर नौकरी की मजबूरी लेकिन सच्चाई यही है कि 13 साल पहले दिल्ली दूर लगती थी लेकिन अब गांव दूर लगने लगा है और दूर लगने लगे हैं अपने नाते-रिश्तेदार और गुरुजन ।

कुछ घंटों के लिए गांव जाने पर ना तो ठीक से घर पर वक्त बिता पाते हैं और ना ही उन लोगों से मिल पाते हैं जो दिल के बेहद करीब हैं । दिल्ली ने दिया तो बहुत कुछ है, लेकिन छीना भी कम नहीं है। घर जाने के बाद मैं उन गुरुओं से मिलना नहीं भूलता था जिन्होंने मुझे दिल्ली तक आने के काबिल बनाया। इसके लिए प्राइमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक के गुरुजनों का योगदान रहा है। गुरुजनों की इस फेहरिश्त में एक नाम है सुरेंद्र रघुवंशी सर का, जिनसे करीब तीन-चार साल बाद पिछले दिनों मुलाकात हुई वो भी संयोग बस ।

अक्टूबर के मध्य में गांव जाने का मौका मिला, वक्त कम था और मेल-मिलाप की फेहरिश्त लंबी, लिहाजा जितना मुमकिन हो सका वहां तक पहुंचने की कोशिश की और जब घर से ट्रेन पकड़ने के लिए निकला, उसी बीच मुलाकात हुई सुरेंद्र सर से। हुआ कुछ यूं कि मैं घर से (जौनपुर जिले का सेहमलपुर गांव) पापा के साथ वाराणसी के लिए निकला और जलालपुर बाईपास से जैसे ही आगे बढ़ा तो दाहिने तरफ बयालसी इंटर कॉलेज दिखाई दिया। बाहर से कॉलेज परिसर पूरा बदला बदला सा दिखा। 20 बरस पहले कॉलेज परिसर के बाहर सबकुछ खुला खुला सा था, लेकिन अब पूरे परिसर का कायाकल्प हो चुका था। बाहर ऊंची-ऊंची चहारदिवारी खड़ी थी और उसके भीतर हरियाली बिखरी थी। ये सब देखते ही सहसा सुरेंद्र सर का स्मरण हुआ, लिहाजा पापा से बोला कि चलिए सर से मिलकर फिर वाराणसी चलते हैं ।

पापा सुरेंद्र सर से मेरे भावनात्मक लगाव को अच्छी तरह जानते हैं, लिहाजा उन्होंने सुरेंद्र सर के घर की ओर गाड़ी मोड़ दी। सुबह के 11 बज रहे थे, पापा ने बोला सरजी कॉलेज में होंगे, लेकिन मैंने कहा कि हो सकता है रिटायर हो चुके हों इसलिए घर ही चलिए। हमलोगों की बातचीत चल रही रही थी तब तक गाड़ी उस मोड़ पर पहुंच गई जहां से रास्ता सर के घर की ओर जाता था, लेकिन बारिश की वजह से झाड़ियों ने रास्ता रोक रखा था। लिहाजा तय हुआ कि पहले सर को फोन किया जाये फिर आगे बढ़ा जाए। सुरेंद्र सर का बड़ा बेटा प्रतीक और मैंने इंटर ग्रेजुएशन साथ किया हुआ है। लिहाजा मैंने प्रतीक को फोन किया लेकिन जब प्रतीक का फोन नहीं उठा तो फेसबुक से सर के नंबर का इंतजाम किया और सर को कॉल किया। अपना नाम बताया तो पहचानने में सर को ज्यादा वक्त नहीं लगा और उन्होंने झट से मुझे कॉलेज आने का आदेश दिया। लिहाजा गाड़ी घर का रास्ता छोड़ वापस कॉलेज गेट पर आकर खड़ी हो गई । 

कॉलेज में दाखिल हुआ तो सबकुछ बदला बदला सा था, बिल्डिंग चमक रही थी, चारों तरफ क्लास रूम बन चुके थे। प्रिंसिपल भी नये नवेले नजर आ रहे थे, हालांकि प्रिंसिपल का ऑफिस वहीं था जहां पहले हुआ करता था। खैर गेट पर मौजूद कर्मचारी से मैंने सुरेंद्र सर के बारे में पूछा तो पता चला कि दूसरी छोर पर बने परीक्षा भवन में हैं। मैं सीधे परीक्षा भवन जा पहुंचा। अब सर सामने थे, देखते ही सर ने बैठने का आदेश दिया। कॉलेज छोड़ने के बाद ये पहला मौका रहा होगा कि मैं अपने कॉलेज कैंपस को निहार रहा था। सर के सामने बैठने की हिम्मत नहीं हुई, कुछ देर तक खड़ा रहा तो शायद सर ने मेरे मन के भाव को भांप लिया और एक बार फिर बैठने का आदेश दिया और अगले पल मैं सीट पर था।

सुरेंद्र सर और मेरे पापा ( दाहिने से बायें)

फिर क्या करीब आधे घंटे तक सर के साथ रहा। काफी बाते हुईं, घर-परिवार, शिक्षा-नौकरी, देश और सियासत की। मैंने भी गुरु माता का हाल चाल जाना और फिर इस क्षमा प्रार्थना के साथ चलने की इजाजत मांगी कि गुरुमाता से अगली बार जरूर मिलूंगा, तो सर ने सपरिवार आने का आदेश दे दिया। खैर हमलोग बातचीत कर चलने के लिए जैसे ही तैयार हुए, सर अपनी सीट छोड़कर खड़े हो गए। मैंने उनसे बैठे रहने का आग्रह किया, लेकिन वो नहीं माने और कॉलेज के लॉन तक छोड़ने आ गए। ये लॉन नहीं बल्कि कॉलेज का आंगन है, जहां कॉलेज के दिनों में बैठकर दोस्तों के साथ खूब गपशप हुआ करती थी। एक बार तो मैं घर से दो रंग का चप्पल पहनकर कॉलेज चला आया था, तीन क्लास भी कर ली और मुझे पता भी नहीं चला। जब इस आंगन में बैठा तो नजर पैर की ओर गई तो आत्मग्लानि होने लगी। खैर फौरन बाहर निकल गया और साथी की दुकान से दूसरी चप्पल लेकर आया। उन दिनों चप्पल और गमछे का क्रेज हुआ करता था। सर को जब ये कहानी सुनाई तो वो हंस पड़े ।

ये लॉन पहले से काफी बदल चुका है। घास नजर नहीं आती, हालांकि एक छोर पर बच्चों के लिए एक मंच दिखाई दे रहा था जिसपर कला मंच लिखा हुआ था, पूछने पर सर ने बताया कि उन्हीं की पहल पर रंगमंच की एक छोटी सी शुरुआत की गई है, जिसे आगे और विस्तार देना है। हमारे वक्त में ये इंतजाम नहीं हुआ करता था, शायद यही वजह है कि रंगमंच की दुनिया से हम लोग अछूते रह गए।

खैर कॉलेज में काफी कुछ बदल चुका है जिसके बारे में आगे फिर कभी बात होगी, लेकिन सुरेंद्र सर के साथ बिताये इन पलों ने कई स्मृतियां ताजा कर दीं, जो अभी कई दिनों तक मेरे जेहन में उमड़ती-घुमड़ती रहेगी।

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अरुण यादव उत्तरप्रदेश के जौनपुर के निवासी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।