मैहर मंदिर परिसर में बरुण सखाजी अपनी साथी के साथ ।
मैहर मंदिर परिसर में बरुण सखाजी (पीछे)।

बरुण के सखाजी

हम सपरिवार सुबह-सुबह मैहर रेलवे स्टेशन पर थे। हल्की बारिश और शारदा मंदिर की पहाड़ी कोहरे के आगोश में थी। अभी प्लानिंग कर रहे थे कि होटल चलें या सीधे मंदिर। चूंकि यात्रा सिर्फ तय थी इसके आगे और पीछे कुछ भी नहीं। अंतत: तय हुआ दर्शन के पूर्व रेलवे स्टेशन पर ही तैयार होकर चला जाए। इसी बीच हमारे संपादक मित्र गोविंद ठाकरे जी की ओर से स्थानीय समाचार प्रतिनिधि उमेश मिश्रा जी हमारी सेवा के लिए आ चुके थे। मिश्राजी ने हमें स्थानीय स्तर पर गाइड किया। हम लोग रिटायरिंग रूम में ठहरे और तैयार होकर रवाना हुए मंदिर के लिए। अद्भुत आनंद था। ऑटो में बैठे, हल्की बारिश से भीगते, बेफिक्री से चले आए। पहले से परिचित एक पांडेजी के यहां पर डेरा डाल लिया गया। यहां से तय हुआ कि अब सीढिय़ों से ही चला जाए। बस जज्बे और मजे के साथ चढ़ाई शुरू। मैहर में प्रसाद वाले आग्रह तो करते हैं, लेकिन इलाहाबादी पंडों की तरह परेशान नहीं करते। बीच में कुछ भिखारी भी कम ही नजर आए। यूं तो वक्त का पता नहीं चला, पर बीच में थकते तो बैठ जरूर जाते। हल्की बारिश जारी थी। जैसे-जैसे हम सब लोग ऊपर जा रहे थे, वैसे-वैसे मैहर माता की पहाडिय़ां हमसे कंधा मिलाने लगी थी। अब हम इतनी ऊंचाई पर थे जहां से बादल नीचे नजर आने लगे। सरकारी बांध, पहाड़ी नदियां ऐसे दिखती जैसे हम किसी नक्शे में देख रहे हों। साफ चारों ओर हरियाली, इनके बीच से निकली नदियां, बड़े जलस्रोत। जंगल, सड़कें, बसाहट सब रुपहले सपने सा। अब हम सबसे ऊपर थे।

सरल, सहज और कानों में घुलती लोक संगीत की मिठास

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मां शारदा के मू्र्ति के रिसता आनंद

लाइन में लगे-लगे कुछ स्वरलहरियां कानों में पड़ रहीं थी। कुछ लोगों के बीच में कुछ महिलाएं थी जो जस गान कर रहीं थी। इनके शब्द न तो स्पष्ट थे न ही सुनकर समझने योग्य। फिर भी जो अर्थ निकल रहा था वो यह था कि ऊंची पहाडिय़ों पर मां तू विराजमान है, हम तेरे दरस को दूर से आए हैं। कृपा बनाए रखना। इसके अपने लिरिक्स थे। अपनी धुन और अपना साज औ आवाज़। महिलाओं के चेहरे से लग नहीं रहा था कि उन्हें इसकी कोई विधिवत ट्रेनिंग दी गई हो। निश्चत रूप से सब श्रुतियां ही रहीं होंगी। इसी वजह से हिंदी के शब्दों ने कोई अलग ही रूप ले लिया, जो समझ में नहीं आ रहा था। मगर उनकी लयबद्धता और एक दूसरे के बीच बोलों की समझ गजब थी। यह निश्चित रूप से एक अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है। कानों में मिठास के समान घुलती उनकी आवाजें और बोल ज्यों दिमाग को आध्यात्मिक खुराक सी दे रहे थे।

यूं तो सख्त विचार था कि यहां की हर ऐसी परंपराओं को दरकिनार किया जाएगा जो धर्म की आड़ में गलत होंगी, लेकिन यहां ऐसा कुछ मिला भी नहीं। स्थानीय प्रशासन ने लाइन को विधिवत रखने के लिए व्यवस्था की थी। इस बीच करीब 4 फीट चौड़े द्वार से माता के दर्शन भी खूब हो जाते हैं। माता के 2 मिनट के दर्शन पर्याप्त रूप से हमारे अंतस को स्वच्छ कर डालते हैं। ऐसा महसूस होता है साक्षात सरस्वती श्यामल रूप में विराजमान है। किस्से, कथा से परे अनंत आनंद की मूर्ति मां शारदा एक बार एक बहन के रूप में तो फिर मां के रूप में नजर आती रहती हैं। एक दैवीय संवाद सा महसूस होता है। आनंद से भरे मन में एक ही बात उभरती है कि जरूर इन पहाड़ों के आसपास लगे सीमेंट के प्लांट अब तलक सारे पहाड़ों को चट कर गए होते अगर यहां इस मूर्ति को रखकर धार्मिक किस्से और कथाएं न गढ़ी गईं होती। मां शारदा अपने पूरी स्वरूप में यहां हैं।

अमर आल्हा ऊदल का आभास, सुबह माता को चढ़ाने आते हैं फूल

आल्हा-ऊदल की भूमि ।पहाड़ की ऊंचाई से झांकने पर आल्हा ऊदल का अखाड़ा नजर आता है। यह मंदिर के ठीक पीछे की तरफ है। यहां से कुछ पल के लिए यूं लगता है जैसे जागनिक ने यहीं बैठकर आल्हा लिखी हो। जैसे ऊदल अभी भी अपने शस्त्रों के साथ मलखे का मुकाबला कर रहे हैं। वह तालाब, जिसमें रोज कमल खिलता है। वह किवंदती सत्य सी जान पड़ती है कि ऊदल अमर हैं वे इन्हीं जंगलों में रहते हैं और हर रोज सुबह माता को एक कमल का फूल चढ़ा मिलता है। यह कितना सच है कह नहीं सकता परंतु लोग कहते हैं कि यहां मंदिर में सुबह जब पट खुलते हैं तो पुजारियों को एक कमल का फूल मिलता है। ऐसी मान्यता है कि ऊदल यहां युगों से प्रतिदिन आ रहे हैं। हो सकता है यह तिलिस्म आस्थाओं को बांधे रखने के लिए कभी बेराज नहीं किया जा रहा हो, लेकिन यह दावा कि यहां आने वाले भक्त इस फूल को देखने तो कतई नहीं आते। तमाम अच्छी अनुभूतियों के बीच अब सिलसिला अंधविश्वासों का शुरू होता है। हो सकता है कि यह असहिष्णु लगे, लेकिन खुले दिमाग से देखेंगे तो ऐसा नहीं होगा।

आस्था और अंधविश्वास का संगम

मां शारदा के दर्शन करने के बाद मन में आनंद की जो रश्मियां प्रस्फुटित थीं वे उस वक्त काफूर हो गईं जब मंदिर के ठीक पीछे 3 बकरे बंधे मिले। उनके लिए एक कुटिया अलग से बनाई गई थी। काले बकरे या बकरियों को देखकर एक बारगी तो ठीक लगा, लेकिन जैसे ही पता चला कि इन्हें यहां बलि के लिए बांधा गया है तो मन ग्लानी से भरने लगा। जिस शारदा की मूर्ति के दर्शन करने के बाद मन में अनंत आनंद महसूस होता है, क्या वह इन मासूम जानवरों की बलि लेती होगी। जो विद्या की देवी है, विवेक की देवी है, बुद्धि की अधिष्ठात्री है, जो विनय और विनम्रता की नेतृत्वकर्ता है, क्या वह बकरों की बली लेकर खुश होगी। कतई नहीं। कुढ़ते अंतस का आनायास ही माता से तादातम्य बैठा। संवाद सा हो चला। ऐसा लगा जैसा मां शारदा कह रही है, मुझे इन अंधविश्वासियों से जकडऩ हो रही है। मुझे यहां से बचाओ। एक देवी जिसके चेहरे पर जो ओज था वह नदारत सा हो चला। यूं लगा रहा था वह कह रही है, पहाड़ों को बचाने मैं यहां विराजित हुई अब तुम मुझे इन अंधड़ भरोसियों से बचाओ। मेरे परिजन यहां पूरे भक्ति भाव से आए थे। इसलिए वे आपत्ति नहीं करना चाहते थे। साथ ही मुझे भी सख्त हिदायत थी कि मैं अपना दिमाग बंद करके सिर्फ यहां उनके साथ चलूं। इसलिए बहुत ही अघोषित से योजना के साथ मुझे बकरों वाली जगह से पीछे की तरफ जहां से आल्हा ऊदल का अखाड़ा दिखाई देता है ले जाया गया। अब हम सब नीचे आकर भोजन के बाद चित्रकूट के लिए निकले।                                                                                                                                                     साभार- sakhajee.blogspot.in


BARUN K SHAKHJEEबरुण के सखाजी, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई। किताब-‘परलोक में सैटेलाइट’। दस साल से खबरों की दुनिया में हैं। फिलहाल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पत्रिका न्यूज के संपादक।

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