स्वाती

बीते दिनों ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ देखी। जब देखने जा रही थी यह फिल्म और जब लौट रही थी देख कर इसे, फिल्म को लेकर मेरी राय बिलकुल अलग थी। किसी भी फिल्म या कि कला के किसी भी रूप के प्रति आयातित समीक्षाओं या प्रतिक्रियाओं से प्रभावित हो कतई राय नहीं बनानी चाहिए। इस फिल्म को लेकर थोड़ी बहुत प्रतिक्रियाएं जो सुनी थी, फिल्म देखने से पूर्व, वो फिल्म के पक्ष में नहीं थी, और जो थोड़े बहुत ट्रेलर दिखाए गए थे, उसको लेकर बनाई गई प्रतिक्रियाओं ने भी फिल्म के प्रति एक नकारात्मक नज़रिया तैयार कर दिया था।

फिल्म देखने जाते वक़्त थोड़ी हिचक थी। पर फिल्म को देखते हुए यह ख्याल और पुख्ता हुआ कि किस तरह से इस समाज की मूल समझ ही स्त्रियों के विरुद्ध है। यह हम सबका देखा सुना अनुभव है कि ‘अच्छी लड़की’ के भूल-भूलैये में किस तरह स्त्रियों की इच्छाओं को उनकी ज़रूरतों को दरकिनार किया गया, उन्हें नियंत्रित किया गया। एक स्त्री जो शादीशुदा नहीं है या कि विधवा है उसे शृंगार करने का हक नहीं है।

इतना ही नहीं, उसके स्वाद तक को नियंत्रित करने की चेष्टा की जाती रही है। मुझे याद आता है एक बार मैंने इसके पीछे की वज़ह जाननी चाही थी। और जो वज़ह बताई गई, वो कतई स्वीकार्य नहीं हो सकती। जो समाज स्त्रियों के पहनावे, शृंगार और खानपान तक को नियंत्रित करना चाहता है, वह उसे जीने की छूट कैसे दे सकता है, सपने देखने की छूट कैसे दे सकता है?

फिल्म के एक दृश्य में लीला शीरीन को कहती है– “पता है हमारी गलती क्या है? हम सपने बहुत देखती हैं”। तो दिल ठहर सा जाता है। फिल्म शुरू से ही अपनी कसावट से अपने अभिनय से, अपने टेक्स्ट से, देखने वाले को बांधे रखती है। पर जिस समाज में ‘मैरिटल रेप’ को माना ही नहीं जाता, जिस समाज में स्त्रियों की आज़ादी को रेप की वज़ह बताया जाता हो, उस समाज में जहां ‘बीवी हो, बीवी बनके रहो’ जैसी बातें बेहद सामान्य तौर पर कही और सुनी जाती हों, उस समाज के लिए इस फिल्म को स्वीकार कर पाना समाज के चरित्र के विपरीत ही जाएगा न!  पर यकीन मानिए ऐसे समाज को इस तरह की फिल्मों को देखने और अपनी सोच को बेहतर करने की और भी ज़्यादा ज़रुरत है।

अलग-अलग परिवेश के चार चरित्र फिल्म में अलग-अलग तरीके से सेक्सुअलिटी के मुद्दे को दिखाते हैं। कहानी इसलिए अंत में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। बस इन मुद्दों को बहुत ही बारीकी से विचार के घेरे में लाती है, क्योंकि समाज अभी तक इस विषय को टैबू मान कर एक ख़ास दूरी पर जीता रहा है। सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन की इस फिल्म को लेकर की गई टिप्पणी से भी समाज की मानसिकता को समझा जा सकता है। मुझे लगता है कि इस तरह की फिल्मों का बनना ही इस मानसिकता को चुनौती दे सकता है। इस तरह की फिल्में हिन्दी सिनेमा को एक सजग और ज़िम्मेदार सिनेमा बनाती हैं।


स्वाती। बिहार के गोपालगंज की निवासी। दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा।

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