पुलिस हमारी सुरक्षा करती है, एक अच्छे समाज के लिए एक अच्छे सुरक्षातंत्र का होना बेहद ही जरूरी है। ये अलग बात है कि हमारे देश का पुलिस-तंत्र हमेशा संदेह के दायरों में रहा है। समाज में पुलिस को लेकर ‘आक्रांता’ की छवि बनती गई। इसको तोड़ने के लिए जिस तरह का सामूहिक और ईमानदार प्रयास होना चाहिए, अफसोस कि वो हो नहीं पाया है। फिर भी कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे हैं जो अपनी पहल से इस छवि को तोड़ने और नई छवि गढ़ने की कोशिश करते रहे हैं। इसी खेमे का एक नाम है राजस्थान एटीएस के एसएसपी विकास कुमार का। बिहार के औरंगाबाद के मूल निवासी विकास कुमार ने 10वीं तक की पढ़ाई नेतरहाट से की है। कानपुर IIT से बीटेक की डिग्री ली है। जयपुर एटीएस के तेज-तर्रार अधिकारी विकास कुमार का आदर्श वाक्य है- एक अकेला चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता। आईपीएस विकास कुमार के काम करने के जुनून और समाज में बदलाव के लिए उनकी पहल पर बात की अरुण यादव ने।

बदलाव- सुना है IIT कानपुर ने आपको सम्मानित किया है, जबकि आप राजस्थान में बतौर एसएसपी तैनात हैं?
विकास कुमार- जी हां, आपको बता दूं कि मैं IIT कानपुर का छात्र रहा हूं और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की डिग्री ली है। आज मैं जो कुछ हूं उसमें IIT कानपुर का काफी योगदान है। शायद समाज में मेरे काम को देखते हुए आईआईटी कानपुर ने मुझे सत्येंद्र नाथ दुबे अवॉर्ड से सम्मानित किया है।

कानपुर में दिया गया सत्येंद्र दुबे अवॉर्ड

बदलाव- कल का सॉफ्टवेयर इंजीनियर आज का सिंघम कैसे बना? सपना क्या था, इंजीनियर बनना या फिर पुलिस अफसर ?
विकास कुमार- (हंसते हुए) वैसे मैं आज भी इंजीनियर हूं। मेरा रुझान शुरू से ही सिविल सेवा की तरफ था। जब मैं IIT कानपुर से पासआउट हुआ, उसी दौरान मेरा कैंपस सलेक्शन हो गया। चूंकि ये फील्ड मेरे लिए पूरी तरह नया था, लिहाजा कुछ दिन काम करके देखा। फिर मुझे लगा कि मुझे अपनी रुचि का काम करना चाहिए क्योंकि वहां आप अपना बेस्ट दे सकते हैं। लिहाजा, अंतर्रात्मा की बात मानकर मैंने पुलिस सेवा की ओर रुख किया।

बदलाव- सिविल सेवा में आपका सलेक्शन कब हुआ ?
विकास कुमार- सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी करते हुए मैंने सिविल सेवा की तैयारी जारी रखी और साल 2004 में मेरा चयन नागालैंड कैडर में हुआ। बाद में कैडर बदलकर 2007 में राजस्थान चला आया। मेरी पहली पोस्टिंग पाली जिले में बतौर एएसपी हुई।

माफिया के खात्मे के लिए टीम कोबरा के गठन की पहल।

बदलाव- सुना है राजस्थान में माइनिंग माफिया आपके नाम से ख़ौफ़ खाते हैं ?
विकास कुमार- पिछले 10 साल में मैं 10 जिलों में एसपी रहा हूं, जब मैं भरतपुर में तैनात हुआ तो वहां माइनिंग माफिया का दबदबा था। इसके अलावा शराब माफिया, ड्रग्स माफिया का भी काफी आतंक था। मैंने इनपर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश की। 2012 में भरतपुर में राजस्थान के इतिहास में माइनिंग माफिया पर सबसे बड़ी कार्रवाई की और उनकी कमर तोड़कर रख दी। 100 से ज्यादा माफिया हवालात में बंद किए गए और अवैध खनन में इस्तेमाल होने वाले डंपर समेत सैकड़ों गाड़ियां जब्त की गईं।

बदलाव- खनन माफियाओं पर कार्रवाई के दौरान कभी डर नहीं लगा, क्योंकि महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक इनका नेटवर्क काफी तगड़ा है। 
विकास कुमार- सच कहूं तो ऐसी घटनाओं से डर की बजाय मैंने सीख ली और अपराधियों के ख़िलाफ़ व्यूह रचना की। यहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर होना मेरे बहुत काम आया। मैंने एक्शन से पहले पूरी तैयारी की। ग्राउंड फैक्ट्स जुटाए, माइनिंग माफिया की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी और फिर अपना एक्शन-प्लान तैयार किया। बड़े ही ठंडे दिमाग से व्यूह रचना कर माफियाओं के हर प्वाइंट पर एक साथ अटैक किया और उनकी कमर तोड़ी।

साथ मिलकर बड़ी लड़ाई की तैयारी।

बदलाव- इस दौरान चुनौतियां भी काफी आई होंगी, उसका सामने आपने कैसे किया ?
विकास कुमार- दरअसल काम जितना बड़ा होता है चुनौतियां उतनी ही ज्यादा होती हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सूचनाओं को गुप्त रखना। लिहाजा इसके लिए मैंने ईमानदार और तेज तर्रार पुलिसकर्मियों की एक टीम बनाई। उनकी अलग से ट्रेनिंग कराई, क्योंकि जोखिम भरे रास्तों पर चलने के दौरान टीम का मनोबल ऊंचा रखना जरूरी है। ये तभी मुमकिन है जब वो खुद को मुकाबले के लिए तैयार समझें। हमारी टीम ने हौसले से काम लिया और एक्शन में हमारा पूरा साथ दिया। जिसके अच्छे नतीजे आए।

बदलाव- सुना है आपने पुलिसवालों को मिलिट्री की ट्रेनिंग दिलाई और अपनी एक अलग टीम बनाई ?
विकास कुमार- देखिए अपराधी बड़े शातिर होते हैं, जब मैं अलवर में तैनात था तो मैंने देखा यहां काफी पेशेवर अपराधी हैं। मुझे महसूस हुआ कि हमें एक ऐसी फोर्स की जरूरत है जिसमें आक्रामकता हो, जिसमें एनर्जी हो और जिसको थोड़ा एक्सपोजर मिला हो ताकि इन अपराधियों का डटकर मुक़ाबला कर सके। आर्मी की ट्रेनिंग हमें भीतर से मजबूत बनाती है। मैंने आर्मी के कमांडर से संपर्क किया और अपनी बात रखी तो वो तैयार हो गए। हमने पुलिसवालों की एक नई टीम तैयार की जिसे आज लोग कोबरा टीम (क्रिटिकल ऑपरेशन्स बैकअप एंड रैपिड एक्शन टीम) के नाम से जानते हैं।

अजमेर में बतौर एसपी तैनाती के दौरान की तस्वीर।

बदलाव- आज कोबरा टीम राजस्थान की पहचान बन गई है, ये कैसे मुमकिन हुआ ?
विकास कुमार- मैं जिन जिलों में तैनात रहा वहां कोबरा टीम का गठन किया। इसके लिए मुझे आर्मी के कमांडर्स का काफी सहयोग रहा। कोबरा टीम के एक्शन और जुनून को देखते हुए बाद में राजस्थान सरकार ने सभी जिलों में कोबरा टीम के गठन का फ़ैसला किया।

बदलाव- पुलिस और समाज के बीच तालमेल बिठाने के लिए आपने क्या कुछ कदम उठाए हैं ?
विकास कुमार- बिना समाज के सहयोग के कोई भी अच्छा काम करना मुमकिन नहीं है। समाज का पुलिस पर भरोसा होना जरूरी है। इसीलिए मैंने पुलिस मित्र, बीट बहादुर जैसी मुहिम चलाई और एसपी ऑफिस को 24 घंटे आम लोगों के लिए खोल दिया। जनता को पुलिस से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए CLG (सीएलजी कम्यूनिटी लॉयजन ग्रुप) का गठन किया। फेसबुक, व्हाट्सएप जैसी सोशल साइट्स के जरिए भी जनता से जुड़ने की कोशिश की, जिसका काफी फायदा भी हुआ। लोग पुलिस तक आने में हिचकते हैं क्योंकि एक दो घटनाएं ऐसी होती हैं जो लोगों के मन में डर बैठा देती है। हमें जनता को ये भरोसा देना होगा कि पुलिस के लिए हर व्यक्ति और हर शिकायत महत्वपूर्ण है।

बदलाव- सुना है आप 6 महीने से ज्यादा कहीं टिकते नहीं और नेताओ से भी आपकी नहीं पटती ?
विकास कुमार- (हंसते हुए) देखिए पटने या न पटने की बात नहीं होती। नेताओं का काम समाज सेवा का है और हमारा भी काम समाज की सुरक्षा करना, उसे हम बखूबी निभा रहे हैं। अगर कहीं कुछ गलत हो रहा होता है तो मैं उसे सीधे बता देता हूं। रही बात ट्रांसफर की तो ये सरकार का अधिकार होता है और जहां जरूरत होती है वहां तबादला कर दिया जाता है। इससे हमारे मनोबल पर कोई असर नहीं होता। मैं जनता का सेवक हूं और जनता के लिए 24 घंटे काम करने को तैयार रहता हूं।

यारों के यार विकास कुमार। दोस्तों के साथ फुर्सत के पल।

बदलाव- अब कुछ पर्सनल सवाल, आप 24 घंटे जनता से जुड़े रहते हैं, ऐसे में परिवार के लिए समय कैसे निकाल पाते हैं ?
विकास कुमार- मेरी पत्नी खुद एक IPS अफसर हैं लिहाजा वो मुझे अच्छी तरह समझती हैं। उन्होंने कभी वक्त को लेकर कोई शिकायत नहीं की। हां ये बात अलग है कि अर्नव और अंबिता (बेटा और बेटी) के लिए वक्त निकाल पाना थोड़ा मुश्किल होता है। वैसे अब मेरी पोस्टिंग जयपुर में हो गई है और पत्नी भी वहीं पोस्टेड हैं तो शायद कुछ और वक्त बच्चों के लिए निकाल पाऊं।

बदलाव- आपको काम करने का जुनून कहां से मिलता है और आप अपना आदर्श पुरुष किसे मानते हैं ?
विकास कुमार- देखिए मेरे लिए हर आदमी आदर्श है और मैं हर किसी से सीखने की कोशिश करता हूं, चाहे हो रिक्शा वाला हो या फिर कोई चाय बेचने वाला। हर किसी के संघर्ष से हमें कोई ना कोई सीख जरूर मिलती है और वही लोग हमें कुछ अलग करने की प्रेरणा भी देते हैं।


अरुण यादव। उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के निवासी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। इन दिनों दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।

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