धीरेंद्र पुंडीर

कारगिल में एकाएक कही से युद्ध आ गया और उसने हिंदुस्तानी जवानों को मार गिराया। ये युद्ध कहां से आया कुछ पता नहीं चला। हिंदुस्तानियों ने अपने जवानों की मौत पर शोक मनाया। वो शहीद हुए थे लिहाजा शहादत को सलाम किया। एक शहीद के परिवार वालों को, जो भी इस अलसाई सी व्यवस्था से हासिल हो सकता था वो दिया गया और साथ ही देश के करोड़ों लोगों ने अहसान माना कि शहीदों ने अपने जीवन को देश के कल के लिए बलिदान कर दिया। सालों साल गुजर गए। अचानक एक दिन एक लड़की सवालों के तौर पर सामने आ खड़ी हुई और उसने बताया कि जो अब तक मीडिया में कहा गया और जो भी देश ने समझा वो एक सफेद झूठ था। कारगिल में पाकिस्तान ने कोई हमला नहीं किया था, वो पाकिस्तान की गोलियां नहीं थी जिसने गुरमेहर कौर के पिता का सीना छलनी किया था और भारत माता के बेटे की जिंदगी ली थी वो युद्ध था।

युद्ध क्या होता है, युद्ध में कौन लड़ते हैं और युद्ध कैसे आ जाता है ये सवाल अभी गुरमेहर अगले किसी प्रोग्राम में बताएंगी। क्योंकि मैं भी अचंभित हूं और हैरान भी कि कारगिल में आखिर युद्ध कहां से आ गया था। उस तरफ पाकिस्तान का बॉर्डर है, उसको लांघता हूुआ और गुरमेहर के शहीद पिता को बचाने में जुटे पाकिस्तानी जवानों को रौंदता हुआ युद्ध आजकल कहां चला गया। इसकी जानकारी मुझे अभी नहीं है। लेकिन कोशिश करता हूं कि जल्दी बताऊंगा।

युद्ध के अलावा गुरमेहर की जो चिंता एबीवीपी से है उससे अपने को कोई लेना देना नहीं है क्योंकि कॉलिज में गुंडागर्दी की कोई ईजाजत किसी भी सभ्य आदमी से अपेक्षित नहीं है। लेकिन गुरमेहर की उस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर नाचने वाले वही लोग हैं, जो खालिद को नायक और तारिक फतेह को इबलिस से जुड़ा हुआ मानते हैं। इस देश में काफी मुद्दे हैं, काफी सवाल खड़े हुए हैं, काफी परेशानियां हैं, काफी चिंताएं और काफी फ्रंट खुले हुए है। नजीब के लिए जार जार रोने वाले लोग, इस बात के लिए कभी नहीं रोते कि दिल्ली में हर साल सैकड़ों बच्चों का आता-पता नहीं मिलता। रोज अखबारों में गायब होने वाले लोगों के लिए वामपंथ की कहानी में एक लाईन नहीं जुड़ती है।

आखिर कई बार ये सवाल खड़ा होता है कि जेएनयू की इतनी बड़ी दुनियावी चिंताओं और इंसानी हुकूक की लड़ाई में देश की बाकि जनता खड़ी दिखाई नहीं देती है। मैं हमेशा सोचता हूं कि वामपंथ और कश्मीर का अतिवाद एक साथ खड़ा क्यों दिखाई देता है? देश को तोड़ने वाले नारों में नाचने वाले उन युवाओं को अमेरिका के फेंके हुए टुकड़े अपनी जान से ज्यादा क्यों प्यारे होते हैं। एक बार अपने एडिटर दीपक शर्माजी के साथ सिमी पर खबर कर रहा था तो युसुफ पटेल की तलाश की। ( पहला शख्स जिस पर पोटा लगाया गया था) जामिया के इलाके में तलाश करते हुए शाहीन बाग की गलियों में कई जीने पार कर मकान के सबसे ऊपर के तले में उसी वेशभूषा में और प्रकार में युसुफ साहब से मुलाकात हुई। उनके पास अमेरिका के विरोध की यहूदियों के अत्याचार की और हिंदुस्तान के मुसलमानों के खिलाफ लंबे षड़यंत्र की ऐसी कहानियां मौजूद थीं, जो सिर्फ उनकी जमात के पास ही मिलती है बाकि उसका वजूद कहां है किसी को मालूम नहीं होता है। खैर हम देर तलक उनका भाषण सुनने के बाद जब उठने लगे तो दीपकजी ने एक सवाल किया युसुफ भाई आपका परिवार कहां है तो युसुफ साहब ने जवाब दिया कि अमेरिका में। जी हां दुनिया भर में अमेरिका के विरोध का नारा बुलंद कर रहे युसुफ का परिवार अमेरिका में शरण हासिल करने में लगा हुआ था।

जाने क्यों इधर कुछ दिनों से मुझे खुद पर ही आश्चर्य होने लगा है और मेरे दोस्त भी मुझ को बदली-बदली निगाहों से देख रहे है। लेकिन मैं जब भी सोचता हूं कि देश तोड़ने के नारों को दिल्ली में लगाने की असीमित छूट के लिए लड़ने वाले अचानक कश्मीर में सैनिकों की लाशों पर ईद मनाने का आह्वान करते हैं और इसी बीच गुरमेहर का ये कहना कि युद्ध ने उसके पिता को मारा था और उसको फौरन देश को तोड़ने के नारे लगाने वालों के हक में खड़े हुए लोग कितनी आसानी से उसको राष्ट्रवादियों के नाम पर कठघरे मे खड़े किये गए लोगों की वाल पर जाकर शेयर करने लगते हैं। सवाल बहुत सारे हैं लेकिन जाने क्या चीज इस देश में आजादी की मांग करते-करते सिर काटने वालों को लिबरल घोषित कर देती है और जन-गण-मन गान पर खड़े होने की मांग करने वालों को कट्टर उसकी तलाश डरा देती है।

इतने सालो में रिपोर्टिंग में हमेशा रिपोर्ट के हक में खड़े होने की कोशिश और बिना किसी लाग-लपेट के सच कहने की कवायद को कुछ दोस्तों ने इस लिए खारिज कर दिया क्योंकि सवाल उनके रवैये पर उठ गए और ये तो गुनाहे अजीम है। (एक बात और सिमी के संस्थापक अध्यक्ष अहमदउल्लाह सिद्दीकी भी अमेरिका में जा बसे हैं और आजकल वहां पढा रहे हैं) रही बात छात्र आजादी के नाम पर देश तोड़ने की साजिश रचने वालों को महिमामंडित करने वालों की तो उनको आजादी का मतलब नजर आता है पश्चिम देशों में, जिसकों रात-दिन पानी पी पीकर कोसते हैं।

कभी कम्युनिस्ट ब्लॉक के देशों की आजादी के मॉडल को सामने नहीं रखते हैं, फिलहाल तो उत्तर कोरिया और चीन उनके लिए एक रोल मॉडल हो सकते हैं लेकिन उसकी आजादी नहीं मांगते। उनको पश्चिम की आजादी चाहिए लेकिन पश्चिम में पुलिस के ऊपर हाथ उठाने का हश्र उनको तानाशाही दिखता है। टीवी पर ही देखा कि किस तरह पुलिस हाथ सर के पीछे रखवा कर घुटनों के बल सामने बैठने पर मजबूर कर देती है। दरअसल देश के तौर पर उभरने न देने की एक निरंतर कोशिश लगातार इस देश में कुछ शक्तियां करती रही हैं। अभी बहुत से लोगों को मैंने देखा (कहने की जरूरत नहीं है कि ताल्लुक किससे होगा) पोशपोरा की कहानियां शेयर करते हुए लेकिन उसी ग्रुप में किसी के धर्म ने उसको इजाजत नहीं दी कि वो कश्मीर से अल्पसंख्यकों को मस्जिद से दी धमकियों और रेप और हत्या की वारदात की भी निंदा करने की एक छोटी सी कोशिश करे।

दरअसल इन अलगाववादियों के पास इस तरह का पारस पत्थर है कि ये जिसको छू देते हैं वो बेचारा धर्मनिरपेक्ष हो जाता है और जिस पर नजर तरेर दें वो ‘राष्ट्रभक्त’ में बदल जाता है। दुनिया के किसी भी देश में ये आजादी किस को हासिल है कि सेना पर पत्थर चला दे, गालियां दे, थूक दे उनके ऑपरेशन के बीच में आ जाएं और खुले आम झंडे जलाएँ, शरिया का शासन मांगें। काश ये एक देश के तौर पर मजबूत हो। लेकिन तब तक के लिए ऐसे बहुत से ‘युद्ध’ से बचना होगा जो बिना किसी दुश्मन देश के आ जाता है और गुर मेहर जैसी बेटियों के सिर से बाप का साया छीन लेता है।


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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