ब्रह्मानंद ठाकुर

धनरोपिया खतम हो जाने से घोंचू भाई अब पूरी तरह से फुर्सत में हैं। इधर दू- चार दिन से टिप-टाप और बीच-बीच में झमकउआ मेघ बरसते रहने से टोला के अन्य लोगों के साथ-साथ घोंचू भाई के चेहरे पर हरियरी आ गयी है। यह सोच कर कि चलो कम से कम 72 रूपये लीटर डीजल कीनने से छुटकारा तो मिला। अब थोड-बहुत धान जरूरे हो जाना चाहिए। यही कारण हय कि घोंचू भाई का मन हुलसायल हय।। आई सांझ में घोंचू भाई खेत-पथार घूमने के बाद जब लउटे तो हम मनकचोटन भाई से हुनकर दलान में बइठ के ऐहे तिनटंगा चउकी पर बतिया रहे थे। दरअसल हुआ यह कि तीन दिन से झपसी लागल रहने के कारण ऊ तिनटंगा चउकी दलान में रख दिया गया था, सो बतकही का पुरनका अड्डा बदल गया था। बुन्नी से बचने के लिए घोंचू भाई मथा पर एगो पन्नी ओढले झटकल आ रहे थे। हमने देखते ही पुकारा– ‘आइए, आइए घोंचू भाई , सुनाइए हालचाल ।’

घोंचू उवाच पार्ट-6

फाइल फोटो

घोंचू भाई दलान में आकर मथा से पन्नी हटाते हुए उसे कुटकट्टा मसीन पर रख दिए और बैठ गये उसी तीनटंगा चउकी पर।  इसी बीच मनकचोटन भाई का नाती मनसुखबा अंदर से बाहर आकर मनकचोटन भाई के सामने याचक की मुद्रा में खड़ा हो गया । मनकचोटन भाई ने पूछा- कि बात बउआ ?  कुछ कहना है ? ‘  जी ,बदरुआ, हुलसबा, फुलकेसर कुम्हकरनी मउसी और गुलबिया दीदी सब बोलबम जा रही है, हम भी जाएंगे।’  अच्छा, त ई बात हय ?  केना जाना हय ? पैदल की बस-उस से ? ‘ मनकचोटन भाई ने पूछा। ‘जी ऊ सब मिल कर एगो बोलेरो किया हय, 11 हजार 7 00 में। ईहां से सुल्तानगंज ओही बोलेरो से और ऊंहा से जल भरने के बाद पैदल देवघर तक। फ आ बोलेरो जौरे – जौरे जाएगा। वहां से बासुकीनाथ और तारापीठ भी लोग जाएंगे’  मनसुखबा ने मनकचोटन भाई को पूरी योजना समझाते हुए कहा ।  ‘कितना खरचा लगेगा ?  मनकचोटन भाई ने पूछा।  ‘भाड़ा, कपडा, कामर-उमर आ परसादी-उरसादी’  में सब मिलाकर सात हजार में काम चल जाएगा ‘  मनसुखबा ने हर्षित होते हुए कहा।  मनकचोटन भाई कोठरी में गये और तुरंत वापस लौट कर  सोलह गो पनसउआ ‘ कुल- खनदान में  एहे त एगो नाती हय ‘ कहते हुए मनसुखबा को थमा दिए ‘ जाओ, सब जरूरी सामान चउक पर गुलेसरा के दुकान से खरीद लेना, हां मगर ठीक से जाना। ‘कए बजे जाना हय ? ‘  ‘नौ बजे रात में’  मनसुखबा ने खुशी से उछलते हुए कहा और बगल में पड़ी साइकिल उठा चल पडा गुलेसरा की दुकान की ओर। घोंचू भाई नाना-नाती का वार्तालाप बड़े गौर से सुन और गुन रहे थे। ऐसा उनके चेहरे का भाव बता रहा था।

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मनसुखबा के जाते ही घोंचू भाई दार्शनिक मुद्रा धारण कर कहने लगे’  हद हो गया, ई पैसे के राज ने धरम को भी बाजार के हवाले कर दिया है। पूजा-पाठ , धरम-करम ‘आस्था-विश्वास, सब में पइसा महत्वपूर्ण हो गया है। धरम के नाम पर हर जगह लूट मची हुई है। देखा-देखी लोग बुरी तरह इसकी गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। नया कपडा, महंग कामर, जल भरने वाला तम्मा का बर्तन, कांवरिया की भीड़ में डीजे का चलन, रंग-विरंग नाच आ भलगर गीत बताइए त ई कोन धार्मिक कृत्य हो रहा है ?  इधर एगो और नया प्रचलन हुआ है — अरघा से जल चढ़ाने का। जानते हैं इसका क्या मतलब होत है ?  घोंचू भाई समझावन लगे। मंदिर के बाहरी हिस्से से शिवलिंग तक 10 फीट, 20 फीट, 25  फीट ’50 फीट, जहां जैसा सम्भव हो एक पाईपनुमा नाली फिट कर दिया जाता है। पाईप के एक सिरे पर पानी ढारिए आ दोसर सिरे से ऊ पानी शिवलिऔग पर पड़ता रहेगा। यह है नयका टेक्नालाजी जिसमे शिवलिंग को छुआ तक नहीं जाता। छूना हो तो सावन के बाद आइए।

इस धार्मिक कृत्य के लिए हजारों खर्च । भाई इससे भक्त को भला होता है या नहीं, यह पता तो नहीं, मगर इतना तो तय है कि पूंजीवादी बाजार व्यवस्था की चांदी जरूर हो जाती है। देखिए मनसुखबा आठ हजार लेकर गया है। सैमवारी का जश्न मनाने । भला ई कैसी शिव भक्ति ?   शिव तो आदिम समाजवादी व्यवस्था के नायक थे। उन्होने इन्द्र और विष्णु जैसे  आभिजात्य  देवों के राजतंत्र के विरुद्ध लोकमंगल की भावना से सर्वप्रथम कैलाश में गणतंत्र की स्थापना की थी। उन्होने तत्कालीन समाज में उपेक्षित वर्ग का नेतृत्व किया था। उसे सिर उठा कर चलना सिखाया था। वे आदिम समाजवादी व्यवस्था के ऐसे नायक थे जहां परस्पर दो विरोधी प्रवृतियों वाले जीव जंतु साथ-साथ रहा करते थे। किसी को किसी से कोई भय या नुकसान नहीं था। वहां सांप था तो मोर भी था। बाघ था तो बैल ( नन्दी) भी था । यह थी सह अस्तित्व की भावना ! और आज क्या हो रहा है ?  भाई, भाई की हत्या कर रहा है। अपने से विरोधी विचार रखने वाले को मटियामेट किया जा रहा है । यहां शिव मिशन को पूरीतरह से लोग भूल चुके है। चिंता इसी बात की है,मगर इससे कहां किसी को मतलब है ?

घोंचू भाई आई फुलफार्म में थे, सो यहीं नही रुके, कहने लगे ‘सुनिए, उस गीत में क्या गा रहा है ? उसी समय सड़क से कांवरियों की एक टोली स्थानीय शिवमंदिर में जलाभिषेक के लिए गुजर रही थी और डीजे पर गीत बज रहा था  ‘ हमसे न भंगिया पिसाई हो गनेश के पापा, हम नइहर जात बानी, फिर दूसरा गीत बजा-‘ डाही के धइले बाडअ ये भोला रात कइले बाडअ,माई-बाप कइसन  सिखौला लूर हो, अब तअ बुढैला भोला कहिया सिखबा सहूर हो।’  इसके बाद ‘ सिलबटियो नइखे फूटेला भंगिया पिसला से, तोहरा फुर्सत नइखे राजा गाजा खिचला से, छलकअता हमरो गगरिया राजा,कूलर कुटिया में लगवादीं।’  कहिए , कैसा लग रहा है कथित शिवभक्ति के नाम पर यह द्विअर्थी, भलगर गीत ?  घोंचू भाई का चेहरा तमतमा रहा था । कहने लगे ‘ ई पूंजीवाद,बाजारवाद पूरे जेनरेशन को खराब कर रहा है। नैतिक पतन, अपसंस्कृति, भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी को बढ़ावा दे रहा है। भाई कभी धर्म को इंसान ने अपनी बेहतरी के लिए पैदा किया था और आज उसी धर्म का स्वरूप विकृत कर इंसानियत का गला घोंटा जा रहा है। सभी चुप तमाशा देख रहे हैं। सच कहने, लिखने वालों की जीभ तराशी जा रही है, कलम छीने जा रहे हैं। चार सौ साल पहले और आज में कोई फर्क नहीं है।’

मैने घोंचू भाई से हिम्मत कर पूछ ही दिया -‘ क्या हुआ था आज से 400  साल पहले जो आज हो रहा है ?’   घोंचू भाई कहने लगे , ‘देखो आज से 418 वर्ष साढे 5 महीना पहले पहल 17  फरवरी 1600 ई. के दिन महान इतालवी वैज्ञानिक गियोर्दानो ब्रूनो को रोम में इसलिए जिंदा जलाया गया था क्योंकि उसने  कहा था कि न केवल पृथ्वी बल्कि सूर्य भी अपनी धूरी पर घूमता है।  बहुत से ग्रह भी सूर्य के चारों ओर घूमते है। मनुष्य यदि चाहे तो अभी तक अनजाने कई  ग्रहों का पता लगा सकता है। बस इसी पर धर्म की दुहाई देने वाले रोम के शासक ने ब्रूनो को जिंदा जलवा दिया था। उनकी मृत्यु के दो सौ साल बाद ब्रूनो की बात सोलह आने सच साबित हुई, जब यूरेनस , नेप्चुन और प्लुटो ग्रह का पता लगाया गया। तब से अनेक छोटे-छोटे ग्रहों का भी पता लगता रहा। आज भी स्थिति कहां बदली ?  हर युग में राजसत्ता वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक चिंतन का विरोध करती रही है।

हमारे देश के प्रधानमंत्री पद संभालते ही मुम्बई  के अखिल भारतीय विज्ञान कांग्रेस में जब कहते हैं कि सेटेलाइट महाभारत काल में भी था, कर्ण का जन्म  कुंती के गर्भ से नहीं हुआ था और गणेश के सिर पर हाथी के सिर का प्रत्यारोपन प्लास्टिक सर्जरी से सम्भव हुआ तब इसका निहितार्थ समझा जा सकता हैः आज साइंस्टिफिक टेम्पर विल्ट करने की तमाम कोशिशें नाकाम की जा रही हैं।  इसे खूब अच्छी तरह समझना होगा, वरना हमारी आने वाली पीढी मानसिक रूप से विकलांग हो कर रह जाएगी। विज्ञान के सहारे यदि हमे विकास का कीर्तिमान स्थापित करना है तो धार्मिक अंध विश्वास से दो-दो हाथ करना ही होगा। घोंचू भाई ई सब कहिए रहे थे कि मनकचोटन भाई के पुरनका फिलिप्स रेडियो से साढे सात वाला समाचार होने लगाः ‘ अरे ई सब सलकार प्रायोजित समाचार है,आप लोग सुनिए, मैं अब चलता हूं ‘ कहते हुए घोंचू भाई कुटकट्टा मशीन पर रखा फन्नी उठाए और चलते  भये। मेरे मुंह से अचानक निकल पडा –‘ घोंचू भाई की बात में आखिर दम तो है। ‘


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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