ब्रह्मानंद ठाकुर

तस्वीर- अजय कुमार कोसी बिहार

 

 

घोंचू भाई आज खूब प्रसन्न मुद्रा में थे। मनकचोटन भाई के दलान में तिनटंगा चउकी पर ज्योंही घोंचू भाई ने अपना आसन जमाया कि उनके आने की आहट पाकर मनसुखबा, भगेरना, भोलबा, बटुरबा,  हुलसबा और फेंकुआ सड़क पर धमाचौकरी मचाना छोड़ उनके निकट आकर खड़ा हो गया। ई लड़िकन सब घोंचू भाई से तनिको नहीं डेराता हय, सो घोंचू भाई को आइ असगरे बइठल देख कर उनसे बतियाने का बढिया मौका मिल गया। अब समस्या यह थी कि पहले बात शुरू करे तो कौन करे और कैसे करे ?  इसी बीच मनसुखबा ने घोंचू भाई से पूछ दिया – ‘अच्छा नाना, आप आज बचपन वाली अपनी कोई कहानी हमको सुनाइए ‘।

मनसुखबा की टीम के सभी लड़कों ने जब इसका समर्थन कर दिया तो घोंचू भाई ने अपना पहलू बदला और शुरू हो  गये। वहां उपस्थित सभी लड़के उनके आस-पास जहां जगह मिली शांत होकर बैठ गये। घोंचू भाई ने अपने बचपन की एक सच्ची घटना से बात शुरू की। ‘सुनो, मैंने एक चवन्नी चुराई थी। बात आज से  करीब 60 साल पहले की है। मैं तब 8-9 साल का था। गांव के बेसिक स्कूल में तीसरी कक्षा का विद्यार्थी। तब करेडी की कलम से सुलेख लिखा जाता था। नींब वाला होल्डर का उपयोग भी बच्चे घर पर लिखने में करते थे।  छ : आने में सुप्रा इंक की दवात मिलती थी जिसका मोटे कागज के रैपर का रंग बड़ा शानदार लगता था। वैसे सामान्य छात्र  रोशनाई की गोटी को पानी में घोल कर किसी से खाली दवात  मांग कर उसमें रखते और करेडी वाली कलम उसमें डूबो कर लिखते थे। तीसरी कक्षा से सादा कागज की कांपी  बनाकर लिखते थे। उससे पहले स्लेट पर ही लिखा जाता था। प्लेटो कलम तब साढे तीन रूपयै में मिलती थी। बहुत कम लोग तब प्लेटो और पार्कर कलम रखते थे।

घोंचू उवाच-19

तस्वीर- अजय कुमार कोसी बिहार

स्कूली छात्रों के  लिए तब फाउन्टेन पेन सपना ही था, हालांकि बाज़ार में कम कीमत का फाउन्टेन पेन भी आ चुका था। हमारे  इक्के-दुक्के सहपाठियों के पास वैसी कलम थी। उसे देख मेरा जी भी ललचा गया लेकिन अभिभावक से कलम खरीदने के लिए पैसा मांगने की हिम्मत नहीं हुई। घर के बरामदे में  मेरे छोटका चाचा एक टीन का छोटा बक्सा रखते थे, जिसमें वे ताला नहीं लगाते थे। उस बक्से में उनका बीड़ी-सलाई , कुछ जरूरी कागज , रसीद पुर्जा वगैरह रहता था। उसी बक्से में आसमानी रंग का ऊन का एक दो मुंह वाला वगुली (  बटुआ ) भी था, जिसमें कुछ सिक्के हमेशा रहते थे। उस दिन उसमें कुछ एक अन्नी, दुअन्नी, चवन्नी,अठन्नी समेत खुदरा पैसा रखा हुआ था। मैंने बक्सा खोल कर बगुली से एक चवन्नी निकाल लिया।

गांव में तब ऐसी कोई दुकान नहीं थी जहां से मैं फाउन्टेन पेन खरीदता। याद है वह बुधवार का दिन था। हमारे गांव से एक -डेढ मील दूर सिमरा में शनिवार, बुधवार को साप्ताहिक हाट लगती थी। मैं सिमरा हाट गया। हाट में फुटपाथ पर चट्टी बिछा कर एक दुकानदार श्रृंगार सामग्री बेच रहा था। अफगान स्नो, हिमालय पाउडर, नेल पालिश, आईना, चोटी, कंघी, रिबन आदि से उसकी दुकान सजी थी, जो बहुत आकर्षक लग रही थी। मैंने गौर से देखा तो उसके पास कई रंगों का फाउन्टेन पेन भी था। मुझे काला रंग का पेन पसंद आया जिसका दाम दुकानदार ने चार आना बताया। मैने उस चार आने से वह कलम खरीद लिया और घर लौट आया।

लगभग एक हफ्ते तक घर में किसी को कलम देखने नहीं दिया क्योंकि पैसे की बाबत कैफियत देनी पड़ती। मेरी समझ में दो-तीन रुपये के सिक्कों के बीच से एक चवन्नी का गायब हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, वही हुआ भी। चाचा को कभी पता ही नहीं चला कि उनकी बगुली में सेंधमारी हो चुकी है और एक चवन्नी गायब है। एक हफ्ते के बाद उस कलम को मैंने सार्वजनिक कर दिया लेकिन चाचा या दूसरे किसी ने इस बाबत मुझसे कोई कैफियत नहीं पूछी। मेरी पढाई जारी रही, विवाह हुआ, बच्चे भी हुए। मास्टरी की नौकरी मिली। तब जाकर मैंने अपने चाचा को, जब वे कुछ लोगों के साथ बैठ कर किसी मुद्दे पर बात कर रहे थे ,उनकी बगुली से चवन्नी चोरी की बात बता दी । जहां तक मुझे याद है ,यह मेरे जीवन की पहली और अंतिम घटना थी।

घोंचू भाई की कहानी पूरी हो चुकी थी। लड़के उनकी ओर अपलक दृष्टि से देख रहे थे। उन्होंने उन लड़कों को समझाते हुए कहा, ‘ चोरी छोटी हो या बड़ी यह बहुत ख़राब काम है। इससे हर किसी को बचना चाहिए। महान वही होता है, जो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए गलत आचरण और गलत रास्ते का सहारा नहीं लेता है।।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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