रूचा जोशी

मानव सभ्यता के उदभव काल से ही मनुष्यों का नदियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।  प्रारंभिक काल में सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं तथा उनका विस्तार हुआ। किसी भी प्रदेश  का विकास बड़े पैमाने पर उस प्रदेश में उपलब्ध  प्राकृतिक संसाधनों और उपयोग के तरीकों पर निर्भर करता है। अत्यधिक दोहन एवं  संसाधनों के कुप्रबंधन से पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न  होने लगते  हैं।औद्योगिक क्रांति, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है। इसके कारण  भूमि उपयोग में भी बदलाव आया है। वर्तमान में असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, बिहार  समेत देश के कई हिस्सों में लाखों लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। बाढ़ की विभीषिका केवल जन-धन को हानि नहीं पहुंचाती, बल्कि यह अपने साथ लाखों-करोड़ों सपनों को भी बहा ले जाती है। यदि आपदा प्रबंधन को सुनियोजित तरीके से लागू किया जाये तो आपदा बचाव और राहत पर कम समय तथा धन खर्च करना पड़ेगा। साथ ही जन-धन की अपार क्षति को भी कम  किया जा सकता है।

सुदूर संवेदन  (रिमोट सेंसिंग ) तकनीक भूमि उपयोग में आ रहे बदलाव का आकलन करने के लिए एक कारगर तरीका है। इस तकनीक के अंतर्गत उपग्रह द्वारा भेजी गई तस्वीरों का अध्ययन किया जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल कर यह पता लगाया जा सकता है कि किसी निश्चित वर्ष की तुलना में भूमि उपयोग में कितना बदलाव आया है। साथ ही इस तकनीक के द्वारा डिजिटल उन्नयन मानचित्र तैयार करके बाढ़ की स्थिति के अनुसार नदियों के स्वरुप और विस्तार का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, इसी तकनीक का इस्तेमाल कर इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिमोट सेंसिंग में छपे एक लेख में हमने दिल्ली से बहने वाली यमुना नदी के पात्र  का अध्ययन किया। वर्ष 1901 में दिल्ली एक छोटा सा शहर था, जिसकी  कुल आबादी केवल 4 लाख थी। 2011 की जनगणना पर गौर करें तो दिल्ली की कुल आबादी 1.68 करोड़ हो गई है। जाहिर है, तेजी से बढ़ती जनसंख्या का दिल्ली के पर्यावरण पर भी प्रभाव पड़ा होगा। विश्लेषण से पता चला कि वर्ष 2009 की तुलना में वर्ष 1977 में नदी-ताल में पानी की उलब्धता अधिक थी। इसी अवधि के दौरान नदी पात्र के क्षेत्रफल में  5.3 फीसदी की कमी हुई है।

फोटो- अजय कुमार कोसी बिहार

दिल्ली के यमुना नदी पात्र में  घने वनस्पति का क्षेत्रफल भी 23.1 फीसदी से घटकर 15.8 फ़ीसदी हो गया है। साथ ही  यमुना नदी पात्र में निर्माण क्षेत्र 7 फीसदी से बढ़ गया है। नदी पात्र में निर्माण कार्य बढ़ने की वजह भूमि की उपलब्धता में कमी, शहरीकरण का प्रभाव और अतिक्रमण रहे हैं। यह दर्शाता है कि आज के समय में यदि  यमुना का प्रवाह अपने पात्र तक भी सीमित रहे तो कई घर जलमग्न हो जायेंगे और इसे बाढ़ की संज्ञा दे दी जाएगी।

नदियों के किनारे बसे शहरों के विस्तार एवं विकास के अनुरूप जल निकासी के लिए पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं की गई है। शहर के बढ़ते आकार के साथ ही अनधिकृत बस्तियों की संख्या तथा क्षेत्र भी बढ़ रहा है। अधिकांश अनधिकृत बस्तियाँ शहरों के निचले इलाकों में बसी होती हैं। नदियों में जल बढ़ने की अवस्था में  सर्वाधिक हानि निचले इलाकों की  बस्तियों में रहने वाले लोगों को उठानी पड़ती है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरुप भी बदल रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले समय में वर्षा की तीव्रता बढ़ जाएगी। अर्थात बहुत कम समय में ही अधिक बारिश रिकॉर्ड की जाएगी और हम अब ऐसा महसूस भी कर रहे हैं।
फोटो- अजय कुमार कोसी बिहार

यह नितांत आवश्यक है कि नगर प्रबंधन,  जलजमाव और बाढ़ के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करें। नदियों के किनारे बसे गांव में स्थिति तो और भी भयावह होती है। 18 अगस्त 2008 में  कोसी  नदी में आये बाढ़ की विभीषिका को याद करके आज भी दिल दहल जाता है। साल 2008 के कोसी आपदा ने हमें सबक दिया है कि हमें अपने आपदा प्रबंधन  को चुस्त-दुरुस्त करने की कितनी आवश्यकता है। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेश बलिया के नेतृत्व में बने कोसी न्यायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई प्रशासनिक लापरवाही का उल्लेख किया है। यदि समय रहते कार्रवाई प्रारंभ हो गई होती तो शायद बाढ़ का स्वरूप इतना विकराल न हुआ होता।

आज की यह जरूरत है कि बाढ़  से बचाव के लिये प्रतिरोधात्मक उपाय पर ज्यादा ध्यान  दिया जाये। जबकि होता यह आया है कि बाढ़ आने के बाद बचाव एवं राहत कार्यों पर अधिक ध्यान दिया गया है। सुदूर संवेदन और भूसूचना तकनीक का इस्तेमाल करके जल जमाव और बाढ़ के विभीषिका अनुमान लगाया जाना चाहिए। इससे समय रहते तटबंधों की आवश्यकतानुसार मरम्मत की जा सकेगी और शहरों में जलनिकासी की आधारभूत संरचना को सुधारने में मदद मिलेगी। इन उपायों से बाढ़ से पूर्ण मुक्ति तो नहीं मिलेगी किन्तु इससे होने वाली लोगों को परेशानी में काफी कमी आएगी।


रूचा जोशी। महाराष्ट्र के सांगली जिले की निवासी। MSc (environmental science), MTech ( Remote sensing and GIS)। बिरला इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मेसरा से पीएचडी कर रही हैं। आपको भेड़चाल पसंद नहीं है, जिंदगी को अपने तरीके से जीने में यकीन रखती हैं। 

 

संबंधित समाचार