ब्रह्मानंद ठाकुर

किसानों की बात सुनिए वित्त मंत्रीजी के पहले भाग में हमने दिल्ली में आयोजित संसद में किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने को लेकर पास हुए प्रस्ताव पर चर्चा की । आज बात किसान संसद में पास हुए दूसरे बिल यानी किसानों को कृषि उत्पाद के आश्वासित मूल्य का अधिकार विधेयक- 2017 की। ऑल इण्डिया किसान खेत मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सत्यवान जी ने टीम बदलाव से बिल के हर पहलू पर चर्चा की जिसका कुछ अंश नीचे दिया गया है ।

कृषि उत्पाद के आश्वासित मूल्य का अधिकार से मतलब कृषि उत्पादों की बिक्री पर आश्वासित न्यूनतम मूल्य प्राप्त करने का अधिकार। इस प्रस्ताव को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि आश्वासित न्यूनतम मूल्य एक निश्चित कृषि वस्तु के उत्पादन की लागत से कम  से कम  50 प्रतिशत लाभ मार्जिन वाली कीमत है। जिसका निर्धारण कृषि आयोग को करने की बात कही गई है । राज्य स्तर पर इसमें राज्य सरकार द्वारा घोषित  बोनस भी शामिल होगा, जो केन्द्र सरकार द्वारा घोषित आश्वासित  न्यूनतम मूल्य से कम किसी कीमत पर नहीं होगा ।

इसी तरह आयोग से मतलब अधिनियम की धारा 4 के तहत गठित केन्द्रीय कृषि लागत और मूल्य आयोग को माना गया है। ‘डेफिसिट पेमेंट ‘ का अर्थ है एक किसान द्वारा प्राप्त कीमत और  न्यूनतम मूल्य में अंतर, जो अधिनियम की धारा 13 के अनुसार प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के रूप में देय होगा।

अधिनियम में ‘बाजार ‘ का अर्थ विनियमित बाजारों के साथ  विभिन्न संस्थानों द्वारा किसानों, दूध संग्रह केन्द्रों से कृषि उत्पाद खरीदने हेतु ठेका खेती की व्यवस्था, विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र, एजेंसियो द्वारा खोला गया खरीद केन्द्र और पंचायत सहित सरकारी एजेंसियों द्वारा संचालित अन्य बाजार/यार्ड शामिल हैं।

 किसान संसद द्वारा इस प्रस्तावित अधिनियम में व्यापारी  को भी परिभाषित किया गया है। अधिनियम के अनुसार, व्यापारी का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति या किसी विनियमित संस्था में एकमात्र स्वामित्व, संयुक्त साझेदारी, सार्वजनिक क्षेत्र या कारपोरेट इकाई जो किसानों से सीधे उनका कृषि उत्पाद खरीदते हैं।

अधिनियम के अध्याय-2  में सभी कृषि सामान के आश्वासित मूल्य की बात कही गई है। उसमें यह भी  कहा गया है कि हर किसान को कृषि सामान के लिए आश्वासित न्यूनतम मूल्य  पाने का अधिकार है।

अधिनियम में इसका भी प्रस्ताव है कि सरकार, कृषि लागत और मूल्य आयोग के माध्यम से, इस अधिनियम की  अनुसूची के तहत परिभाषित किसानों  द्वारा उत्पादित सभी कृषि उत्पादों की लागत के अनुमान के लिए मजबूत और सटीक व्यवस्था करेगी।

लागत का अनुमान व्यापक होगा जिसमें सभी भुगतान किए गये खर्चों, इनपुट  लागत, कुशल मजदूरी दरों पर परिवार के श्रम और प्रबंधकीय लागतों की गणना भी इसमें शामिल होगी।

आश्वासित न्यूनतम मूल्य अधिनियम की धारा 3 (2) में उल्लिखित उत्पादन लागत से कम से कम 50  प्रतिशत लाभ मार्जिन प्रदान करेगा।

अधिनियम की धारा 4  (क) में यह स्पष्ट किया गया है कि सरकार द्वारा आश्वासित  न्यूनतम मूल्य आगामी खरीफ उत्पादन सत्र के लिए प्रत्येक वर्ष 31 मार्च या उससे पहले और रबी फसल के लिए 31  अगस्त या उससे पहले घोषित किए जाएंगे।

राज्य सरकारों, केन्द्र सरकार द्वारा घोषित आश्वासित  न्यूनतम मूल्य के अलावा बोनस घोषित करने पर कोई मनाही नहीं है।

केन्द्र स्तर के  अलावा राज्य स्तर पर भी आयोग गठित करने का प्रस्ताव अधिनियम में किया गया है।

अधिनियम में कहा गया है कि हर फसल का प्रस्तावित या नीलामी दाम आश्वस्त लाभकारी मूल्य से शुरू होगा और उससे नीचे दाम पर कोई भी नीलामी नहीं होने दी जाएगी।

कोई भी खरीददार आश्वस्त सरकारी मूल्य से नीचे फसल को नहीं खरीदेगा, खरीददार ऐसा करता है तो वह सजा का हकदार होगा।

सरकार पर्याप्त संख्या में क्रय केन्द्र खोलेगी । जब कीमतें नीचे जाने लगेगी तो  समय रहते प्रभावी तरीके से बाजार में हस्तक्षेप करेगी ।

सरकार वास्तविक उत्पादनकर्ता की पहचान करेगी और इसके लिए प्रभावी तरीका अमल में लाएगी। किराए पर खेती करने वाले और बटाईदारों को आश्वासित  लाभकारी मूल्य दिलाने, उनकी फसल खरीदने और बाजार हस्तक्षेप का लाभ दिलाना सुनिश्चित करेगी।

सरकार किसानों द्वारा आर्थिक मजबूरी के कारण अपनी फसल कम दाम पर बेंचने से रोकने  वास्ते प्रभावी योजनाएं लागू करने के लिए जिम्मेदार होगी जिसमें भंडारण की सुविधा देना शामिल होगा।

सरकार उत्पादन के दाम घटाने और इसके लिए सब्सिडी देकर एवं योजनाओं को अमली रूप देकर कृषि उत्पादन लागत घटाने और कम खर्च पर खेती के तरीके अपनाएगी।

सरकार शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था अमल में लायी जाएगी। आश्वस्त सरकारी मूल्य पर फसल न खरीद करने वाले व्यापारियों पर आर्थिक दंड लगाने और उनकी खरीददारी पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भी किसान मुक्ति संसद द्वारा पारित विधेयक में  शामिल किया गया है। इसके साथ ही इसके लिए जिम्मेवार पदाधिकारियों को दंडित करने का भी प्रावधान विधेयक में किया गया है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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