सुमन केशरी

इस साल देहरादून लिट फ़ेस्ट में भाग लेने का सुयोग हुआ। शुक्रिया गीता गैरोला…शुक्रिया समय साक्ष्य!
देहरादून लिट फ़ेस्ट इस मायने में बेहद महत्त्वपूर्ण आयोजन रहा कि इसमें बेहद जरूरी मुद्दे विचार के लिए रखे गए थे, जैसे, भारत: सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में, सोशल मीडिया के दौर में , हिंदी साहित्य में गाँव, महात्मा गाँधी और हमारा समय, कश्मीर और कश्मीरियत, , लोक साहित्य और शिक्षा, सिनेमा और समाज, पलायन पर चिंतन, बाल साहित्य: शैक्षिक उपक्रम का आनंद, शिक्षा और समाज, जब महिलाएँ लिखती हैं तथा काव्य पाठ। सांस्कृतिक कार्यक्रम, बच्चों की ऐपण की प्रतियोगिता, फोटोग्राफी, पोस्टर प्रदर्शनी, जैविक खाद्योनों और कुटीर उद्योग में बनी वस्तुओं का बाजार भी इस फ़ेस्टिवल का हिस्सा रहे।
चुंकि सभी सत्र दो घंटे या अधिक समय के थे, अतः सभी मुद्दों पर बहुत विस्तार और गहराई से बात हुई। श्रोताओं को प्रश्न करने के साथ अपनी बातें भी संक्षेप में रखने का अवसर दिया गया, जिससे उनमें सुनने और गुनने का उत्साह बना रहा।

देहरादून लिट्रेचर फ़ेस्टिवल

पहले दिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से मैं मौजूद नहीं थी।पर दूसरे और तीसरे दिन जब मैंने इन सत्रों में हुई बातचीत को सुना तो यह बात एक बार फिर रेखांकित हुई कि उत्तराखंड में लोग सभी मुद्दों पर बहुत लगाव एवं गहराई से विचार करते हैं। वहाँ एक तरह की ललक दिखाई पड़ी, जानने और समझने की, जो इन दिनों कुछ दुर्लभ-सी हो गई है।और तो और इन कार्यक्रमों में नौजवानों की भी उपस्थिति मैंने देखी। यह भी मैंने नोट किया कि उत्तराखंड के विकास और वहाँ से हो रहे पलायन के प्रति भी लोगों की उत्कंठा इस बार भी दिखाई पड़ी। गांधी की ओर लौटते लोग एक आश्वासन है। शिक्षा, बाल शिक्षा और समाज पर बात करते हुए जो बात बार बार रेखांकित हुई वह थी शिक्षा के व्यवसायीकरण तथा सरकार की उपेक्षा की बात। कम विद्यार्थियों के नाम पर स्कूल व संस्थानों के बंद होने की बात। रोजगार का अभाव व उसे दूर करने के सुझावों की बात।

23 दिसंबर की शाम को कविता पाठ का आयोजन था। 6 से ज्यादा बज गए थे।देहरादून में शाम होते होते सर्दी बढ़ने लगती है।लगा कि बहुत से लोग चले जाएंगे और हमें खाली कुर्सियों से संवाद स्थापित करना पड़ेगा। पर मैं गलत थी। लोग तो बहुत उत्साह से हमें सुनने को प्रस्तुत थे। कुंवर रवीन्द्र ने अपने संग्रह “बचे रहेंगे रंग” से छोटी छोटी तीन कविताएं सुनाईं। उनके पोस्टर बी वहाँ पर्दर्शित थे, जिन्हें देखा और सराहा गया। हुसैन हैदरी ने कुछ राजनैतिक रंगत लिए अपनी कविताएं सुनाईं। “मैं हिंदुस्तान का मुसलमान हूँ” खूब सराही गई। मदन मोहन डुकलान जी ने गढवाली और हिंदी की कविताएं सुनाईं। संयोजक हेमंत बिष्ट ने लड़की पर एक कविता सुनाई जो हँसी हँसी में समाज में औरत होने की विडंबना को सहज ही रेखांकित कर गई। सुंदर लड़की माने देखने और भोगने की वस्तु। वह अकेली क्यों है, इस ओर ध्यान दिया तो एक वृद्ध ने! सचमुच मार्मिक कविता।सईद अयूब की रचना जिसमें उन्होंने आने वाली संतति को प्रदत्त धार्मिक आस्थाओं से मुक्त होकर अपनी आस्था व विश्वास तंत्र को विवेक के आधार पर खुद चयन करने का न्योता दिया। मैंने भी कुछ कविताएँ- आत्महत्या, उसके मन में उतरना, सौंपना, मैं बचा लेना चाहती हूँ तथा औरत का पाठ किया। लोगों की सराहना मिली। मैंने अपनी कविताएँ कमल जोशी को समर्पित की…कमल आप बहुत दगाबाज निकले। मेरी शिकायत दर्ज करें, जहाँ कहीं भी हैं आप!

“ महिलाएँ क्यों लिखती हैं” में बेबी हालदार ने अपनी आप बीती सुनाई और उसी को आधार बना कर मैंने कुछ सैद्धांतिक बातचीत की। मेरा मानना है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका पर एक बार फिर ध्यान देना चाहिए और हम महिलाओं को अपने अनुभव क्षेत्र व चिंतन क्षेत्र का विस्तार करना चाहिए। मेरा मानना है कि अगर हम स्त्रियों को दिनभर का दस प्रतिशत समय भी चुपचाप अध्ययन मनन लेखन के लिए मिल जाए तो हम बहुत बेहतरीन रचना कर सकतीं हैं। जरूरी यह है कि हम औरत के साथ साथ व्यक्ति भी बने। केवल अस्मिता के दायरे में न बंधे रहें, बल्कि वर्गाधार में अपनी भूमिका को देखें। स्त्रियों के राजनीति में भाग लेने पर भी चर्चा हुई, जिसमें मैंने नेहरुवियन डेमोक्रेसी की अपरिहार्यता का रेखांकन किया और यह भी कहा कि किसी भी लेखन या कार्य को राजनीति से विलग करके नहीं देखा जा सकता।

देहरादून लिट फ़ेस्ट एक अन्य मायने में भी बहुत सार्थक रहा! अब तक फेसबुक पर ही मिले कई दोस्त लोग वहाँ सशरीर मिले। मैं बहुत खुश हूँ कि मेरी मुलाकात साध्वी मीनू जैन और प्रेम जीसे हुई। मैं इसे इस यात्रा की उपलब्धि मानती हूँ।
वहाँ मेरा मिलना हेमंत बिष्ट, शेखर पाठक, रोहित जोशी, अविनाश दास, दिनेश कर्नाटक, नंद किशोर हटवाल, निदा नवाज़, विभावरी,नूतन डिमरी गैरोला, पल्लव,देवेश जोशी,जगदंबा मैथानी, गुरदीप खुराना, कृष्णा खुराना, मनीषा, प्रियंवद, अमरेन्द्र, प्रियंवद अजात, सुभाष पंत जी, गुरुवचन सिंह और सुशील सुक्त, किरण शाहीन, कविता कृषशशि व उनके साथी आदि से भी हुआ।दिवा भट्ट की आवाज कितनी मधुर है और लोक का ज्ञान भी! चंदन सिंह नेगी व उनकी पुत्री हितैषी नेगी से मिलना…वाह ! हितैषी बिटिया, तुम खूब पढ़ना! अपने नाम के प्रथमाक्षर को बनाए रखने के लिए भी! गीता गैरोला का वह आलिंगन…जिसमें दो बिछुड़ी सखियाँ जाने कितने जन्मों बाद मिलीं…क्या कभी भूल पाऊंगी…नहीं…भूलना भी नहीं चाहती उसे। गीता तुम बनी रहो जीवन में बस यही कामना है! सक्रिय…सुलभ…सहज!! स्मिता कर्नाटक का प्यार… प्रतिभा का मिलना…और वह फोटो सेशन! Love you…विशाल संध्या जोशी व गोलू का स्नेह खूब याद रहेगा। वह चाय भी जो हमने साथ पी।

याद रहेगी तन मन को उजास से भरती देहरादून की धूप…मसीही ध्यान केन्द्र की आत्मीय शांति और वह पीपल का पेड़ (बोधि वृक्ष- अश्वत्थ!) जिसे अक्टूबर 1929 में बापू ने लगाया था!बापू की छाया में हुआ साहित्य सम्मिलन याद रहेगा।


सुमन केशरी/ साहित्य से गहरा नाता,अनछुए विषयों तक संश्लिष्ट बोध और सघन संवेदनाएं आपकी रचनाओं की पहचान हैं।  बिहार के मुज्जफरपुर में की मूल निवासी । दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से बी.ए. और जवाहरलाल नेहरुविश्वविद्यालय से एम. ए की डिग्री लेने के बाद सूरदास के भ्रमरगीत पर शोधकार्य किया।

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