Archives for मेरा गांव, मेरा देश - Page 3

मेरा गांव, मेरा देश

कल और आज – कुछ अपनी कहें, कुछ हमारी सुनें’

महानगरीय जीवन में परिवार सिकुड़ता जा  रहा है और रिश्तों में दूरिया बढ़ती जा रही हैं। आलम ये है कि आज ना अपने लिए वक्त है ना अपनों के लिए।…
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मेरा गांव, मेरा देश

विज्ञापन का चाबुक और पत्रकारों का संकट

पुष्यमित्र अमूमन ऐसे मौके कम ही आते हैं, जब पत्रकारों के संकट के बारे में बातें होती हैं। हालांकि पत्रकारिता का संकट इन दिनों जेरे-बहस है और इस देश में…
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गांव के रंग

हाईब्रिड की माया और किसानों की मुश्किल

फाइल फोटो ब्रह्मानंद ठाकुर उतरइत उत्तरा नक्षत्र में मेघ बरस जाने से घोंचू भाई के मुरझाएल चेहरा पर जब तनिका हरियरी छाया तब घोंचू भाई आज दुपहरिया बाद नहीं खा कर…
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गांव के नायक

जलकर बढ़ने की सीख देने वाले राष्ट्रीय चेतना के प्रखर कवि दिनकर 

संजय पंकज राष्ट्रीय चेतना के प्रखर और ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर सामाजिक दायित्व और वैश्विक बोध के भी बड़े प्रभावशाली कवि थे । एक तरफ उनकी कविताएँ शौर्य और…
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गांव के नायक

बदलाव पाठशाला: हम चलते रहे, कारवां बनता गया

शिक्षापथ पर बढ़ते बदलाव के कदम ब्रह्मानंद ठाकुर आगामी 2 अक्टूबर को बदलाव पाठशाला  का एक साल पूरा हो जाएगा।  6 साल से 13 साल तक के 8 बच्चों के…
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मेरा गांव, मेरा देश

मजदूरी को मजबूर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री का परिवार

पुष्यमित्र के फेसबुक वॉल से साभार पूर्णिया शहर के मधुबनी बाजार की ये तस्वीर वैसी ही है जैसी किसी भी शहर में काम की तलाश खड़े रहने वाले मजदूरों की…
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परब-त्योहार

मौसम का बदलता मिजाज और सियासत का चढ़ता पारा

संजय पकंज मौसम बदल रहा है। वातावरण में सर्दी उतरने के लिए उसाँसें भर रही है । बहुत धीमी चाल से आता है नया मौसम। सर्दी बड़ी नजाकत से दबे…
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आईना

समान शिक्षा ही समाज में समानता का बेहतर विकल्प

शिरीष खरे ‘स्कूल चले हम’ कहते वक्त अलग-अलग स्कूलों में पल रही गैरबराबरी पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। एक ओर जहां क, ख, ग लिखने के लिए ब्लैकबोर्ड तक…
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गांव के नायक

एसी वाले ‘बाबाओं’ की क्रांति और घोंचू भाई का मंत्र

ब्रह्मानंद ठाकुर फोटो- अजय कुमार, कोशी विप्लव जी इन दिनों गांव आए हुए है। इनका मूल नाम समरेन्द्र कुमार है लेकिन महानगर में जाकर जब लेखकीय पेशा अपना लिए तब…
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चौपाल

अखबार के जरिए यथार्थ से जुड़ना, एक मुगालता- आलोक श्रीवास्तव

पशुपति शर्मा पत्रकारिता में वैश्वीकरण के बाद एक नया बदलाव आया है। वो समाज के बड़े मुद्दों पर बात नहीं करती, समाज सापेक्ष न हो कर वो सिविक समस्याओं पर…
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