संजीव कुमार सिंह

भुईली के साथियों का दिल्ली में मिलन।

सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने की कहावत खूब सुनी है, लेकिन इस बार अपने अरमानों पर ओले पड़े। 26 जनवरी को इंद्र महाराज ने न जाने किसका गुस्सा हम लोगों पर उतार दिया। दिल्ली में बादल इतने इतने जोर से बरसे कि कई-कई महीनों की तैयारियों और उम्मीदों पर लगभग पानी ही फिर गया। बेमौसम  की बरसात से इतनी नाराजगी क्यों है, ये जानने के लिए आपको थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा।

बिहार के जिला सारण के एकमा ब्लॉक में एक गांव है भुईली। अपने नाम की तरह ये गांव विकास के रास्ते पर भूला सा दिया गया है। कहने को तो राजपूतों का गांव है भुईली, जिसके वाशिंदों को अंग्रेजों ने रायबहादुर का खिताब दिया था। अब रायबहादुर के तमगे का गरूर कहिए या मूछों की लड़ाई, गांव के राजपूतों में कभी एकता नहीं रही। इसका खामियाजा गांव के दूसरे समुदाय के लोगों ने भी  भुगता है।

करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव ने एक से बढ़कर एक अफसर दिए। पर आपसी फूट ऐसी कि कुछ साल पहले तक एक मुखिया भी नहीं दे पाया था भुईली। प्रखंड मुख्यालय एकमा से एक किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद इस गांव ने करीब दस साल पहले पहली बार बिजली के दर्शन किए। कुछ लोग आगे बढ़ गए, लेकिन समय के साथ गांव पीछे खिंचता चला गया। पहले की पीढ़ी जिन मैदानों में खेली बढ़ी, वो अचानक गायब हो गए। खेत- खलिहानों पर मकान उग आए। लोगों के मनों में भले ही अरमानों की घंटिया बजती हों, लेकिन गांव ने किसी शिवालय से निकलती घंटी नहीं सुनी। देश के बाकी इलाकों की तरह तालाबों और कुओं को भुईली ने गुजरे जमाने की चीज समझ लिया।

क्या जो लोग आगे बढ़ गए, उनकी गांव के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? यही सोचकर हमने दिल्ली में रह रहे गांव के लोगों का एक व्हाट्सअप ग्रुप बनाया, नाम दिया -भुईली हमार गांव। ग्रुप का मकसद है गांव के लोग आपसी सुख दुख साझा कर सकें। गांव को वो देने की कोशिश कर सकें, जिससे हमारा बचपन वंचित रहा। इस कोशिश में तकनीक ने ग़जब का कमाल कर दिखाया है! ये कोशिश पिछले कई साल से मुश्किल लग रही थी। दिल्ली के अलग -अलग छोरों पर बसे लोगों से दफ्तर से छुट्टी के दिन मिल पाना असंभव सा जान पड़ता था, लेकिन व्हाट्सअप ने इस काम को आसान बना दिया।

कुछ होम वर्क के बाद हम लोगों ने 26 जनवरी को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क मिलने की योजना बनाई। एजेंडा था गांव के लिए एक कम्युनिटी सेंटर बने या गांव का एक अपना ऐसा शिवालय हो, जहां कुछ लोग बैठकर कुछ सामाजिक कार्यक्रम कर सकें या कुछ गरीबों की पढ़ाई में मदद करने का आइडिया कैसे रहेगा? इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करनी थी, लेकिन हम लोग अपना ख्यालों का इंद्रजाल फैलाएं इससे पहले ही इंद्र देवता कुपित हो गए। बारिश की टप-टप करती बूंदो के बीच कार में करीब तीन घंटे बैठे हम लोग इंतजार करते रहे कि शायद मौसम साफ हो और कुछ और साथी पहुंचें। मौसम ने हमें अपनी मुहिम में कामयाब नहीं होने दिया। मौसम के ‘विलेन अवतार’ के बावजूद पहली मीटिंग में मेरे अलावा राजू, अनिल शाह, कुंदन, सनोज, मिंटू और संटू ने शिरकत की। व्हाट्स अप पर भी हम मीटिंग के अपडेट बाकी साथियों को देते रहे। अंत में हम लोग घर लौटे लेकिन इस संकल्प के साथ कि इन छोटी छोटी बाधाओं के आगे हार नहीं मानेंगे। अभी अगले कदम के लिए इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि बदलाव की कोशिश अभी जारी है।


संजीव कुमार सिंह। छपरा के भुईली गांव के निवासी संजीव की पढ़ाई बिहार यूनिवर्सिटी में हुई। ग्रामीण मिजाज के साथ कई शहरों में पत्रकारिता के बाद पिछले एक दशक से इंडिया टीवी में डटे हुए हैं। आपकी लेखनी अपने वक़्त को संजीदगी से दर्ज करने का माद्दा रखती है।

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