ब्रह्मानंद ठाकुर

यह गौरव मुजफ्फरपुर को हासिल है, जहां अयोध्या प्रसाद खत्री ने भारतेन्दु युग  (1850-1900) में हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग की शुरुआत की। यह खत्रीजी के ही सतत प्रयास का परिणाम हुआ कि खड़ी बोली हिन्दी गद्य की भाषा बनी और पद्य रचना की शुरुआत भी खड़ी बोली में हुई। तब के स्थापित कवियों ने यह ऐलान कर रखा था कि ब्रज भाषा को छोड़ खड़ी बोली में कविता लिखी ही नहीं जा सकती। खत्री जी ने न केवल इस चुनौती को स्वीकार किया बल्कि खड़ी बोली में कविता लिख कर, लिखवा कर उस समय लोगों को चकित भी कर दिया। अयोध्या प्रसाद खत्री के पूर्वज उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के सिकन्दरपुर के निवासी थे।

जिस निष्ठा और इमानदारी से उन्होंने नौकरी की, उतनी ही निष्ठा और लगन के साथ हिन्दी की सेवा में मृत्युपर्यंत लगे रहे। उस दौर में ब्रजभाषा में  कविता लिखने की परम्परा थी और रचनाकारों ने यह खुला ऐलान कर रखा था कि खड़ी बोली में पद्य की रचना हो ही नहीं सकती। अयोध्या प्रसाद खत्री ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। खड़ी बोली के पद्यों का संकलन और मुद्रण अपने खर्च से कराया, उसका मुफ्त वितरण भी कराया। वे कवियों को खड़ी बोली में पद्य रचना के लिए न केवल उत्साहित करते थे बल्कि उन्हें इसके लिए आर्थिक सहायता भी दिया करते थे। रामचन्द्र जी का खड़ी बोली में पद्यबद्ध वर्णन करने वाले को प्रति पद्य 10 रूपये और रामचरित मानस के प्रत्येक दोहे और चौपाई का खड़ी बोली में अनुवाद करने के एक रूपये  की दर से पुरस्कार वे अपने पास से  दिया करते थे।

हिन्दी दिवस पर विशेष

मुजफ्फरपुर के जिस मुहल्ले में उनका आवास था वहां ब्राह्मणों की संख्या काफी अधिक थी। खत्री जी ने यह घोषणा कर दी थी कि जो पंडितजी अपने यजमान के यहां खड़ी बोली में भगवान सत्यनारायण की कथा का वाचन करेंगे, उन्हे वे अपने पास से खुद प्रति कथा वाचन 10 रूपये देंगे। कहते हैं कि कथावाचक अपने यजमान से खड़ी बोली में कथावाचन का प्रमाणपत्र लिखा कर लाते थे और पुरस्कार के रूप मे 10 रूपये बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री जी से उन्हें मिल जाता था। तब इस 10 रूपये की काफी कीमत थी। उन्होंने करँमकांड की अनेक पुस्तकों का अनुवाद खड़ी बोली में कराकर उसका नि:शुल्क वितरण किया।

उनकी एक खास विशेषता थी कि वे साइनबोर्ड की अशुद्धियों को बर्दाश्त नहीं करते थे। शाम में जब वे कलेक्ट्रिएट के अपने दफ्तर से घर के लिए चलते तो बड़े गौर से साइनबोर्ड पर  नज़र डालते। जहां कहीं उन्हें अशुद्धि दिखाई देती, उस दुकान पर खड़े हो कर दुकानदार को उसकी बावत बताते और कागज पर अपने हाथों शुद्ध शब्द लिख कर दुकानदार से कहते कि आप इसे फिर से लिखवाइए। कलक्टर आफिस के पेशकार तो थे ही, इसलिए कुछ उसका प्रभाव था और कुछ हिन्दी की सेवा का जुनून। दुकानदार को उनके आदेश का पालन करना ही पड़ता था। यदि कोई दुकानदार उनके कहने पर भी साइनबोर्ड की लिखावट को नहीं सुधार कराता तो दूसरे दिन वे खुद दुकानदार से इजाजत ले कर साइनबोर्ड उतरवा कर अपने हाथों उसे  शुद्ध करते। ऐसा करने के लिए वे अपने साथ एक आदमी रखते थे जिसके हाथ में पेन्ट का डिब्बा और ब्रश दोनों होता था।  सन् 1870 में पहली बार  हिन्दी का प्रवेश स्कूली शिक्षा में हुआ। लेकिन पुस्तकों की कमी थी। इससे पूर्व कैथी लिपि में पुस्तकें छापी जाती थीं। अयोध्या प्रसाद खत्री ने इसका विरोध करते हुए  बंगाल के लाट साहब को एक अनुरोध पत्र भेजा।

सरस्वती के वरद पुत्र, खड़ी बोली हिन्दी के अनन्य सेवक अयोध्या प्रसाद खत्री मात्र 48 वर्ष  तक जीवित रहे। इस अवधि में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन और अपनी सारी कमाई  हिन्दी की सेवा में अर्पित कर दी। आज हिन्दी दिवस पर अपने आस-पास  हिन्दी में लिखे साईनबोर्ड पर जब अशुद्धियों की भरमार देखता हूं तो अयोध्या प्रसाद खत्री बरबस याद आ जाते हैं।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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