पीयूष बबेले
नब्बे के दशक की शुरुआत में मंडल कमीशन लागू होने के बाद से यह पहला मौका था, जब अगड़ी जाति के लोग आरक्षण के विरोध में सड़कों पर उतरे. इससे पहले अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित वर्ग भी सड़कों पर उतरा और अब तक का सबसे उग्र दलित आंदोलन देखने को मिला.

नब्बे के दशक की शुरुआत में मंडल कमीशन लागू होने के बाद से यह पहला मौका था, जब अगड़ी जाति के लोग आरक्षण के विरोध में सड़कों पर उतरे. इससे पहले अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित वर्ग भी सड़कों पर उतरा और अब तक का सबसे उग्र दलित आंदोलन देखने को मिला. दलित समाज की पीड़ा यह थी कि उसे वह सामाजिक न्याय नहीं मिला जो संविधान में उसके लिए तय किया गया था.

अगर बीते तीन-चार साल पर नजर डालें तो आरक्षण की मांग को लेकर गुर्जर, जाट, पटेल, मराठों ने बड़े-बड़े आंदोलन किए हैं. ये आंदोलन, खासकर जाट और गुर्जर आंदोलन, इतने ज्यादा उग्र हुए कि इससे सरकारी और निजी संपत्ति को अरबों रुपये का नुकसान पहुंचा. अगर गहरा आर्थिक और समाजशास्त्रीय विश्लेषण न भी किया जाए तो भी कुछ मोटी बातें साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है. पहली यह कि समाज के सभी वर्गों को यह लग रहा है कि उन्हें पर्याप्त नौकरियां नहीं मिल रही हैं. अगड़ा वर्ग इसके लिए पिछड़ों और दलितों को मिले आरक्षण को जिम्मेदार मानता है. वहीं बदले, में पिछड़ा और दलित वर्ग कहता है कि आरक्षण में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे के मुताबिक न्याय नहीं हो रहा है.

चूंकि कोई भी राजनैतिक नेतृत्व इन मुद्दों पर, इस या उस पक्ष में खड़ा होना नहीं चाहता और तकरीबन हर दल आरक्षण की मांग के नाम पर होने वाली हिंसा के सामने घुटने टेक देता है, इसलिए इस तरह के आंदोलन से जातिगत समूहों के बीच घृणा और नफरत बढ़ती जा रही है, लेकिन, अब जरा बेरोजगारी के असली कारणों की तरफ देखें. बेरोजगारी और रोजगार की स्थिति के बारे में भारत सरकार हर साल व्यापक सर्वेक्षण करती थी. इस तरह का अंतिम सर्वेक्षण 2015-16 में श्रम और रोजगार मंत्रालय ने जारी किया. चूंकि इस सर्वेक्षण में बेरोजगारी की भवायह स्थिति सामने आई, इसलिए सरकार ने वर्षों से चली आ रही, सर्वे की व्यवस्था को बंद कर दिया. पिछले तीन साल में बेरोजगारों के मोबाइल में भले ही असीमित डाटा आ गया हो, लेकिन इसी दौरान सरकार के पास से वह डाटा गायब हो गया जो भारत में रोजगार का विस्तृत हिसाब रखता था.

यानी समस्या यह है कि एक तरफ जहां पिछले तीन-चार साल में आरक्षण की मांग यानी असल में रोजगार की मांग को लेकर आंदोलन बढ़े, उसी दौरान रोजगार की प्लानिंग का मुद्दा सरकार के कार्यक्षेत्र से गायब हो गया. सरकार चाहती तो इसे जारी रख सकती थी, क्योंकि इस बेरोजगारी के लिए वह अकेले जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि अपने से पहले की कई सरकारों के कारनामे आसानी से गिना देती. बहरहाल, 2015-16 में सरकार ने जो डाटा जारी किया, उसमें से हम स्नातक और परास्नातक तक शिक्षा पाए लोगों की बेरोजगारी के आंकड़ों को देखते हैं. क्योंकि ग्रेजुएशन या इससे अधिक शिक्षा पाने वालों को ही मोटे तौर पर वह नौकरी मिलेगी, जिसमें उन्हें आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना पड़ रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 1000 ग्रेजुएट लोगों में से 100 लोगों को किसी तरह का रोजगार नहीं मिलता. वहीं जो 1000 लोग बेरोजगार हैं, उनमें से 583 इसलिए बेरोजगार हैं, क्योंकि उन्हें अपनी डिग्री के हिसाब से रोजगार नहीं मिलता. 228 इसलिए बेरोजगार हैं, क्योंकि उन्हें योग्यता के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा. 53 लोग पारिवारिक कारणों से बेरोजगार हैं और 135 लोग अन्य वजहों से बेरोजगार हैं. वहीं, पोस्ट ग्रेजुएट तक शिक्षा पाए 1000 लोगों में से 98 लोग बेरोजगार हैं. जो 1000 पोस्टग्रेजुएट बेराजगार हैं, उनमें से 624 इसलिए बेरोजगार हैं, क्योंकि उन्हें अपनी शिक्षा के हिसाब से नौकरी नहीं मिल रही. 215 इसलिए बेरोजगार हैं कि उन्हें सही वेतन नहीं मिल पा रहा. 38 पारिवारिक कारणों से और 124 दूसरी वजहों से बेरोजगार हैं.

अगर जनगणना के आंकड़े देखें, तो 2001 में देश में बेरोजगारी की दर 6.8 फीसदी थी, जो 2011 की जनगणना में 9.8 फीसदी हो गई. यानी हमारे यहां बेरोजगारी बढ़ने की दर जनरसंख्या बढ़ने की दर से कहीं तेज है. देश में हर साल तीन करोड़ से ज्यादा लड़के-लड़कियां ग्रेडुएशन में दाखिला ले रहे हैं. इनमें से अधिकांश व्हाइट कॉलर जॉब चाहते हैं. लेकिन इस श्रेणी में सीमित जॉब ही पैदा हो रहे हैं. जाहिर है, जब उन्हें उसी साल नौकरी नहीं मिलती तो वे बेरोजगारों की संख्या को उस साल और अगले साल भी बढ़ाते हैं. इस तरह बेरोजगारी का एक पहाड़ खड़ा होता जाता है.

फ़ाइल फोटो

सरकार ने बेरोजगारी और रोजगार जारी करने की नयी प्रणाली बनाई है, उसमें शिक्षा के आधार और नौकरी के स्तर के आधार पर बेरोजगारी या रोजगार का साफ-साफ पता नहीं चलता. लेकिन श्रम मंत्रालय ने अंतिम आंकड़े जनवरी 2017 से अप्रैल 2017 के बीच रोजगार के जारी किए. इसके मुताबिक इस तिमाही में देश में 1.32 लाख रोजगार पैदा हुए. इसमें नौकरी और स्वरोजगार दोनों के आंकड़े शामिल हैं. देश की इस समय की 132 करोड़ की आबादी में एक तिमाही में पैदा हुए 1.32 लाख रोजगार कितना असर डालेंगे ये आसानी से समझा जा सकता है.

अगर कोई डिग्री कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में जाकर यह पूछे कि उनके कितने छात्रों का प्लेसमेंट हो रहा है, तो वह तुरंत जान जाएगा कि 1000 ग्रेजुएट लोगों में से असल में कितने लोगों को नौकरी मिल रही है. लेखक ने पिछले दिनों गाजियाबाद के कई इंजीनियरिंग कॉलेज में बात की और पाया कि इनफॉर्मेशन टेक्‍नोलॉजी और कंप्यूटर साइंस के अलावा बाकी किसी ट्रेड में कैंपस सलेक्शन करने वाली कंपनियां नहीं आ रही हैं. डिग्री कॉलेजों की स्थिति इससे भी बुरी है.

लेकिन चूंकि यहां से निकले लोग भी कोई न कोई काम तो करते ही हैं, इसलिए मानसिक रूप से बेरोजगार होते हुए भी सरकार के आंकड़ों में वे रोजगार संपन्न दिखाई देते हैं. और अब तो यह अध्ययन भी बंद हो गया है. अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के जवाब में दिए भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपष्ट ही कहा था कि जो व्यक्ति वकालत की पढ़ाई करके निकलता है, वह खुद भी रोजगार पाता है और दो लोगों को और रोजगार देता है. इसी रूपक को उन्होंने दूसरे पेशों के लिए भी लागू किया था. यानी सरकार का मानना है कि जिसने ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन कर लिया, वह अनिवार्य रूप से न सिर्फ खुद रोजगार में है, बल्कि कुछ और लोगों को भी रोजगार दे रहा है.

सरकार के पास अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन युवाओं के दिमाग में पनप रहे असंतोष को यह तर्क संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं. सबसे बढ़कर समस्या यह है कि निजी क्षेत्र में जिस तरह से उचित वेतन नहीं मिल रहा है, उसमें ज्यादातर स्नातक सरकारी नौकिरियां पाने की अभिलाषा रखते हैं. लेकिन चूंकि नौकरियां कम हैं और कंपटीशन बहुत ज्यादा, इसलिए उन्हें लगता है कि आरक्षण लागू होने के कारण उनका हिस्सा मारा जा रहा है. ऐसे में जरूरत इस बात की थी कि देश की सभी पार्टियां सच्चाई का सामना करतीं और युवाओं को सच्चाई बतातीं. बल्कि बेहतर होता वे आर्थिक नीतियों में बदलाव के बारे में चिंतन करतीं, लेकिन वह यह करने के बजाय बेरोजगारों के गुस्से को विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच नफरत के रूप में पनपने में सहयोग दे रही हैं. हो सकता है फौरी तौर पर किसी पार्टी को इस नफरत से फायदा मिल जाए, लेकिन लंबे समय में यह बेरोजगारी को तो बढ़ाएगी ही, साथ ही सामाजिक विद्वेष को भी बढ़ाएगी.


piyush baweleपीयूष बवेले। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। इंडिया टुडे में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी रह चुके हैं। संप्रति दैनिक भाष्कर में राजनीतिक संपादक की भूमिका निभा रहे हैं