फाइव स्टार सुविधाओं वाला शुरुआती रंगकर्म

फाइव स्टार सुविधाओं वाला शुरुआती रंगकर्म

अनिल तिवारी

1968 में 15 बर्ष की उम्र में ‘टी पार्टी’ नाटक में अभिनय करने के पश्चात मील एरिया में यह चर्चा गर्म होने लगी कि अनिल तिवारी नाटकों में भी काम करता है। तो तमाम मजदूर संगठनों ने मुझे अपना सदस्य बनाने की पहल शुरू कर दी। इसमें इंटक (इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस)और एस एफ आई (स्टूडेन्ट फेडरेशन आफ इंडिया , कम्युनिस्ट पार्टी की विद्यार्थी इकाई) ने मुझे प्रलोभन भी देना प्रारम्भ कर दिया। एसएफआई का प्रलोभन अधिक प्रभावशाली रहा और मैंने एसएफआई ज्वाइन कर ली। फिर शुरू हुआ नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला। साथ ही पार्टी मीटिंगों का सिलसिला, जो प्रदेश भ्रमणों तक जा पहुँचा। शहर-शहर आम सभाएं करना, पोस्टर्स लगाना, फिर नुक्कड़ नाटक करना और अपने शहर वापस आना।

मेरे रंग अनुभव के 50 वर्ष –8

यही चलता रहा करीब दो सालों तक। और 1970 आ गया। पर इसका यह असर हुआ कि मेरा परिक्षा परिणाम गड़बड़ा गया। जहाँ मैं हरदम प्रथम श्रेणी में पास हुआ करता था वहीं डिवीजन खराब होने लगा। और घर पर इन गतिविधियों को लेकर कलह का वातावरण निर्मित होने लगा। और आखिर में मुझे एसएफआई छोड़नी पड़ी। अब ग्यारहवीं की बोर्ड परिक्षा थी, जिसे मुझे अच्छे नम्बरों से पास होना था। डिवीजन भी अच्छा ही लाना था। नहीं तो घर में टिक पाना मुश्किल था, जिसका अल्टीमेटम मुझे घर से मिल चुका था।

अब सारा ध्यान पढाई की ओर लगाना पड़ा। पर बिरला इंडस्ट्रीयल क्लब की ओर से होने वाले नाटकों में बराबर भाग लेता रहा। बिरला इंडस्ट्री क्लब जिसे शॉर्ट में बीआईसी क्लब कहा जाता था, बिरला जी द्वारा संचालित उन सभी मजदूरों और अधिकारियों का क्लब था जो उनकी फैक्टरियों में काम करते थे। ग्वालियर रेयन, जे सी मिल्स, सिमको, स्टील फाउन्डरी और जे सी मिल्स स्कूल के कर्मचारी-अधिकारी इस क्लब के सदस्य थे। बीआईसी का मैं दस सालों तक लगातार सदस्य रहा और हर बार बेस्ट एक्टर का पुरुस्कार भी जीतता रहा।

बीआई सी क्लब गजब का बना हुआ था। इसके प्रांगण में सभी खेलों की प्रथम श्रेणी की सुविधाएं मौजूद थीं। गजब का बगीचा था, लॉन था और बहुत बड़ी कैन्टीन थी। यह जगह किसी फाईव स्टार होटल की लॉबी से कम नहीं थी। यहाँ बम्बई की तरह कभी रात नहीं होती थी, या यों कहें रात दिन की अपेक्षा अधिक जवान होती थी। मैंने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक होटल और क्लब देखे हैं, पर बीआईसी के आगे सभी आज भी फीके हैं।

यहाँ जब नाटक की रिहर्सल शुरू होती थी तो मील की तरफ से एक कार सभी कलाकारों के लिये शो होने तक 24 घंटों के लिये प्रोवाईड कर दी जाती थी। इससे जहां मन करे आप आ जा सकते थे। कैन्टीन में जब चाहे जितना भी जो भी चाहे, फ्री में खा सकते थे। और नाटक के प्रत्येक मेम्बर के लिये ग्वालियर रेयन के कपड़े पर 50%की छूट थी। गेस्ट हाउस के चार कमरे, जो फाईव स्टार होटल के कमरों से भी बढ़कर थे, शो तक के लिये बुक रहते थे। इसके अलावा भी आपको जितना पैसा नाटक के लिये चाहिये आप निर्देशक से लिखवाकर स्लिप एकाउन्ट ऑफिस में दे दें और कैश ले लें। फिर जब नाटक का शो हो जाये तब उसकी रसीद प्रस्तुत कर दें।

कुल मिला कर बीआईसी से नाटक करना बहुत ही ऐश का कार्य था और इज्जत गजब की। इस बीच हर रंगकर्मी वहाँ वीआईपी से कम नहीं होता था। नाटक की रिहर्सल्स के बीच-बीच में बिरला ग्रुप के जनरल मैनेजर श्रीसरदार सिंह चौरडिया भी आते रहते थे जो आर्टिस्टों का कुशल क्षेम पूछते रहते थे। अगर किसी भी कलाकार को किसी भी प्रकार की कोई भी तकलीफ होती, उसे जीएम साहब प्राथमिकता पर दूर करते थे। चाहे समस्या किसी के परिवार से ही सम्बन्धित क्यों न हो। उनका मानना था कि कलाकार का सारा ध्यान नाटक से भटके न।

इस सबके बाद भी मेरी दादागीरी में कोई कमी नहीं आई थी और साल दर साल बढती ही जा रही थी। नाटक अपनी जगह थे और सही कहें तो गुण्डागर्दी अपनी जगह बरकरार थी।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित रहा।

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