अनिल तिवारी

अब थोड़ा घर की तरफ रुख करते हैं। इन सारी गतिविधियों से घरवाले बहुत तंग आ गये थे। आगरा के दो प्रतिष्ठित परिवारों का बड़ा लड़का, आखिर किस दिशा की ओर जा रहा था? जिसका जीवन बचाने के लिये उसके इंजीनियर चाचा ने भेस बदल कर एक फकीर के कहने पर घर-घर भीख मांग कर उसके बाएं कान में सोने की बाली डाली थी, क्योंकि उससे पहले एक भाई और एक बहन गुजर चुके थे। उसका जीवन बचाने के लिये ही भीख मांगी गई थी।

कई बार माँ ने डन्डों से पिटाई भी की पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा। कभी भी पिटाई का विरोध नहीं किया। जब माँ, जिन्हें हम मम्मी कहते थे मारते-मारते थक जातीं, तो हर बार की ही तरह पैर पकड़ कर मांफी मांगते और रोते। बाहर निकल कर वही गतिविधि फिर शुरु कर देते। अन्ततः यह निर्णय लिया गया कि हमें घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाये और एक दिन अन्ततोत्वा वो पल आ ही गया, जब हमसे कहा गया कि हम कहीं अलग ठिकाना ढूंढ़ लें।

मेरे रंग अनुभव के 50 वर्ष – 6

हम सड़क पर थे, अब क्या करें ? कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो हमने ग्वालियर रेलवे स्टेशन के गेस्ट हाउस को अपना ठिकाना बनाया। साथ ही ग्वालियर का फूलबाग भी हमारा ठिकाना हुआ। फूलबाग, ग्वालियर का बहुत बड़ा बाग है, जो शासकीय है। इसे नगरपालिका द्वारा संचालित किया जाता है। इसी में ग्वालियर जू भी है। यहीं से महाराजा सिन्धिया के महल का रास्ता भी है। खैर, अब खाने के लिये ग्वालियर के बाजार इन्दर गंज में स्थित होटल शेरे पंजाब को चुना गया जहाँ पैसे देने की कोई जरुरत नहीं थी। मुफ्त में जितना चाहो, खा सकते थे। होटल मालिक जिन्हें प्यार से हम पापाजी कहते थे हमें बहुत प्यार करते थे। होटल शेरे पंजाब पर दारु पीकर होने वाले झगड़ों का निपटारा हमारा ग्रुप ही करता था। अब जरुरत थी ऊपरी खर्चे की तो तमाम ‘धुरे’ तो मोजूद थे ही सहायता के लिये। तो जिन्दगी सुचार रूप से चलने लगी।

ऐसे ही करीब एक माह ही बीता था कि एक दिन हमारे चाचाजी हम से इन्दरगंज चौराहे पर टकरा गये। पता नहीं मुझे क्या हुआ कि उनके पैर छूते ही मैं फफक-फफक कर रोने लगा। चाचाजी के पूछने पर सारा किस्सा सुनाया। वैसे चाचाजी भी हमारी गतिविधियों से कोई खुश नहीं थे फिर भी ढांढस बंधाने के बाद हमें अपने साथ ग्वालियर फोर्ट अपने घर ले आये। दरअसल, चाचाजी ग्वलियर किले पर स्थित सिंधिया स्कूल के प्रिन्सिपल थे। यह स्कूल महाराजा जीवाजी राव सिंधिया द्वारा संरक्षित है और इसका सारा संचालन महल द्वारा ही होता है। महाराजा माधोराव सिंधिया, सलमान खान, नितिन मुकेश, अनुराग कश्यप इत्यादि बड़ी हस्तियां इसी स्कूल के एल्युमिनी हैं।

चाचाजी के भाषण इस बीच हमारी दिनचर्या में शामिल हो गये। चाचा जी कई बार मम्मी और पापाजी से मिले, समझाया, पर मम्मी टस्स से मस नहीं हुई। उल्टे चाचाजी पर ही कलेस करती रही कि यदि तुम उसे सहारा दोगे तो वो कभी नही सुधरेगा। यह सिलसिला चलता रहा। हम रोज किला उतरते थे। कॉलेज के बाद नाटक की रिहर्सल चलती थी। रात 12 बजे दुबारा किला चढते थे तो करीब रात दो बजे घर पहुंचते थे। इसी तरह छ:माह गुजर गये और गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं। हर गर्मियों की छुट्टियों में चाचाजी का परिवार किसी न किसी हिल स्टेशन जाता था दो माह के लिये, सो चाचा जी मसूरी चले गये। हम दुबारा किले से उतर कर रेलवे स्टेशन और फूलबाग के बीच आ गये। अब फिर वही शेरे पंजाब होटल हमारा सहारा था।

इसी तरह एक माह ओर गुजर गया और हमारे कन्नौज जाने का समय आ गया। विगत पांच वर्षों से, गर्मियों की छुट्टियों में  कन्नौज नौटंकी अखाड़े में नौटंकी की शिक्षा ग्रहण करता था। यह शिक्षा पं धनिराम गुरुजी मुझे मुफ्त में देते थे। रहना- खाना सब फ्री।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित रहा।

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