अनिल तिवारी

वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल तिवारी की फेसबुक सीरीज को हम साथियों से साझा कर रहे हैं। इसमें एक तारतम्यता है। अगर आप शुरुआती हिस्से से न गुजरें हो तो आपका रोमांच कम हो सकता है। अभी तक अनिल जी की मां की यादें और स्कूल कॉलेज के दिनों की ‘दादागीरी’ का किस्सा हमने आपसे साझा किया है। फेसबुक सीरीज की 5 वीं कड़ी।

इस सब गतिविधि में, मैं कोई अमिताभ बच्चन नहीं था, जो दुश्मन को मारता ही रहा और कभी पिटा नहीं। मानी हुई बात है जब आप झगड़ा करोगे तो पिटोगे भी। तो एक वाकिया आपको बताता हूँ, जिससे मेरे इस पक्ष से भी आप सभी वाकिफ हो सकेंगे। वो वह समय था जब शहर में साईकिलों का अधिक बोल-बाला हुआ करता था। शहर में स्कूटर तो कुछेक ही थे।

हम जिस कॉलेज में पढते थे उसमें दाखिला परसन्टेज के हिसाब से होता था। कहने का अर्थ है कि जब तक आपने प्रथम श्रेणी से अच्छे नम्बर लेकर हायर सैकेन्डरी पास नहीं की,  तब तक आपका एडमिशन ग्वालियर साइन्स कॉलेज में हो ही नहीं सकता था। फिर आपके नम्बर साइन्स विषय में भी अच्छे होने ही चाहिये, यह आवश्यक था। कॉलेज की स्ट्रेन्थ उस समय दस हजार विद्यार्थियों से भी ज्यादा थी।और हमारे कालेज में जो विद्यार्थी स्कूटर से आते थे, वो बीस पच्चीस से ज्यादा नहीं थे। और इन को किसी न किसी दादा की आवश्यकता होती थी, जिसे यह अपने स्कूटर पर बिठा कर रोज लाते थे। और जिस दिन वो दादा इनके साथ नहीं होता था, उसी दिन किसी न किसी दूसरे दादा से पिटते जरूर थे। नहीं तो इनका सारा समय दूसरों को स्कूटर पर बैठा कर घुमाने में ही व्यतीत हो जाता था ओर यह क्लास तो अटैन्ड कर ही नहीं पाते थे।

मेरे रंग अनुभव के 50 वर्ष – पांच

कुल मिलाकर यह पैसे वालों की ही औलाद हुआ करते थे, जो स्कूटर से कॉलेज आते थे। साथ ही ये हम लोगों के ‘धुर’ भी हुआ करते थे। मतलब जब चाहो पिटाई कर दो और पैसे ऐंठ लो। या इन्हीं की जेब से जब चाहो शॉपिंग करो, फिल्म देखो, या जेब खर्चा चलाओ। इन्हें हम रईस की औलाद और ‘धुर’ के नाम से ही सम्बोधित किया करते थे। पर हम चूंकि मध्यम वर्ग से थे, इसलिये साईकिल से ही कॉलेज जाया करते थे। पर वो साईकिल हम न चलाकर हमारा ‘धुर’ ही चलाता था। हम तो आगे डन्डे पर बैठ कर ही चलते थे। और ऐसे बैठते कि हमारा एक पैर साईकिल के हैन्डिल पर होता था और हमारा धुर हमें घर छोड़ कर आता और लेने भी आता था। घर वालों को हम यह प्रदर्शित करते थे कि यह हमारा पक्का दोस्त है और मुझे बहुत प्यार करता है। इसलिये घर वालों की सिम्पैथी उसे बराबर मिलती थी।

तो एक दिन हम ऐसे ही साईकल पर बैठ कर जा रहे थे कि, एक झज्जे पर एक लड़की सजी-धजी खड़ी थी। हमारे ‘धुर’ ने कहा- भाई साहब ऊपर देखो -ऊपर। मैंने ऊपर देखा और पता नहीं मुझे क्या हुआ कि, मैंने बड़े ही अन्दाज और अदा से उस लडकी को आदाब कर दिया। उसने बडी ही मीठी अदा से मुझे कहा ‘हप्प’ और अदा से खिलखिला कर हंस दी। पता नही क्यूं उसकी यह अदा मुझे बहुत ही अच्छी लगी और मैंने दुबारा से साईकिल वापस मुड़वा कर फिर से उसे अदा से आदाब कर दिया। लड़की ने हाथ हिला कर किस का संकेत देते हुये किस को फूंक के माध्यम से मेरी ओर भेजने का माइम किया और वो इठलाती अपने घर में चली गई। और मेरी साईकिल आगे बढ गई।

हम थोड़ी दूर ही बढे थे कि एक चाये के ठेले पर खड़े करीब 20-25 लडकों ने हमें रोका। और पकड कर उस एरिये के बॉस के सामने प्रस्तुत किया। एरिये के बॉस ने आव देखा न ताव, हमारी जम कर धुनाई करवा दी। वाकई में वो यह जानता ही नहीं था कि वो किसको पीटवा रहा है। खैर, हमारे मुँह से खून आने लगा और हमें माफी मांगनी पड़ी। सभी के पैर छूने पड़े, तब कहीं वहां से रिहा हुये। ये किस्सा हमारे एरिये से करीब 25 किलो मीटर दूर शहर का है।

पिटने के बाद हम अपने एरिया (बिरला नगर) आये और सारी दास्तां अपने ग्रुप को जैसे ही सुनाई तो मैटाडोर में सभी सवार होकर वहाँ पहुचे और फिर कोहराम मचा दिया। जो मिला उसे मारा पर उनका बॉस भाग गया। इसलिये हम उनके दो लड़कों को उठा लाये। मतलब किडनैप कर लाये और वहाँ सभी से कह आये कि तुम्हारा बॉस आये और इन्हें ले जाये, बिरला नगर हजीरा से। खैर वो चार घंटे के बाद, बताये गये पते पर अपने तीन चार लड़कों सहित आया। पहले पिटा फिर उसने हमारे पूरे ग्रुप के सभी सदस्यौ के पैर छू कर माफी मांगी, लिख कर मांफी मागी।

और फिर दोस्ती की जोरदार पार्टी हुई। मतलब सभी को दारू और होटल में खाना खिलाया। मैं दारू नहीं पीता, इसलिये मैंने रबड़ी ली। और वो हमारा गहरा मित्र बना। आज वो काँग्रेस का बड़ा नेता है। मेरा अभिन्न मित्र है। पारिवारिक मित्र है, मेरे सुख-दुख का साथी है। वो अकेला ही नहीं, उसका पूरा परिवार मेरी और दिद्दा की बहुत केयर करता है।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित रहा।

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