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कृति सिन्हा

अच्छा है कि हमारी रेल के पास ‘प्रभु’ है । आप ‘प्रभु’ हो इसमें तनिक भी गुरेज नहीं । केवल एक काम कर देते तो हम शयनयान के मुसाफिर बीमारी को बेवजह न्योता देने से बच जाते। अपना बायो-टॉयलेट इन स्लीपर और जनरल डब्बों से हटवाकर, वही पुराना वाला ‘डायरेक्ट लाइन’ सेवा ही लगवा देते। कारण बताना तो तौहीनी होगी आपकी, अगर मुमकिन हो तो केवल इन शौचालयों मे झांक लीजिए एक बार।

 

बदबू करते बायोटॉयलेट भारतीय रेल को आधुनिक करने के इरादे में कहीं कोई बड़ी भूल तो नहीं? आंकड़ों में तो सबकुछ साफ-सुथरा है लेकिन आंकडों से सच का मूल्यांकन करना ग़लत होगा। जरा सोचिए, ये तो सत्य है कि हमारी आधी आबादी रेलगाड़ी के स्लीपर और जनरल डब्बों में सफ़र करती है। इन डब्बों में और कुछ हुआ हो न हो, इन दिनों बायो-टॉयलेट के प्रयोग में ये भी शुमार कर लिए गए हैं। ट्रेनों में कई मौकों पर जब वॉश-बेसिन में पानी नहीं आता, तो ऐसे में आगे के हाल का अनुमान आप खुद ही लगा सकते हैं।

साभार-www.railnews.co.in
साभार-www.railnews.co.in

अमूमन एसी क्लास में सफर करने वाले यात्रियों के लिए बायोटॉयलेट साफ-सुथरा रखा जाता है क्योंकि वहां पैसे वाले ज्यादा सफ़र करते हैं। साथ ही उनके शोर मचाने पर सरकारें भी जाग जाती हैं, सिस्टम भी हरकत में आ जाता है। लेकिन स्लीपर या फिर जनरल में सफ़र करने वाले लोगों के लिए बायोटॉयलेट मुसीबत बनते जा रहे हैं। इसकी वजह साफ-सफाई पर ध्यान न दिया जाना है। स्लीपर क्लास का हाल अपनी दीनता पर आँसू बहाता है। एक तो जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल उस पर से साफ-सफाई नदारद। ट्रेन किसी बड़े स्टेशन पर रुके भी तो अपर क्लास के डब्बों की साफ-सफाई ही प्राथमिकता होती है। ऐसे  में शयनयान और जनरल के बायो-टायलेट ‘जानलेवा’ बन जाते हैं। जबकि सरकारी आंकड़ों की माने तो सबसे ज्यादा सवारी इन्हीं डब्बों में भरकर चलती है, ये सफ़र उनकी मजबूरी भी है।

स्लीपर क्लास या फिर जनरल कोच में सफर करने वालों की सुनवाई भी कम ही होती है। दूसरा पहलू ये भी है कि गार्ड,  टी.टी,  ड्राइवर तक के पास होती है शिकायत पुस्तिका,  मगर इतनी जहमत उठाए तो कौन? सुरेश प्रभु के ट्विटर अकाउंट ने हालांकि शिकायत पुस्तिका की अहमियत जरूर कम कर दी है। अगर आप ज़रा भी अलर्ट हैं तो आप ट्विटर अकाउंट के जरिए भी अपनी शिकायत रेल मंत्रालय तक पहुंचा सकते हैं। बॉयोटॉयलट एसी क्लास के लिए तो बेहतर हैं लेकिन जनरल के लिए खराब। हैरत तो इस बात की होती है कि सुरक्षित यात्रा का खोखला दावा करती  भारतीय रेल ठेकेदार के भरोसे चल रही है। ठीक इसके विपरीत किसी वीवीआईपी के सफ़र के दौरान इतनी चाक-चौबन्द व्यवस्था कहां से हो जाती है पता नहीं?

 

अगर हमारे देश के रेल मंत्री एक बार इन जनरल कोच में सफर करें और वहां के बॉयोटॉयलट में जाएं तो उम्मीद है, इनमें झांकने के बाद वे स्वयं ‘प्रभु’ कहलवाना पसंद नहीं करेंगे। हमारी सरकार सफाई को लेकर जागरुकता अभियान चला रही है। एक ओर खुले मे शौच से छुटकारा दिलवाने का अभियान चल रहा है,  लेकिन यहां तो बंद शौचालय में दम घुट रहा है। अब कैसे और किस मुंह से कहे ‘ जहां सोच, वहां शौचालय’ ।


kriti

कृति सिन्हा/ इतिहास से एमए, मूल रूप से बिहार की छपरा की निवासी। इन दिनों लखनऊ में बसेरा है। सफ़र करने का शौक और सामाजिक मुद्दों पर सचेत रहती हैं ।