शक्ति ! तेरे गुड़ की ढेली चुराने को जी चाहता है…

SHAKIMAN LAST MINUTSविनोद कापड़ी

मच्छरदानी हटाई जा रही है। गद्दे उठा लिए गए हैं। कूलर हटाए जा चुके हैं। पुआल समेटी जा रही है। शक्तिमान के अस्थायी बाड़े या अस्पताल में अब कुछ बाक़ी रह गया है तो गुड़ की वो कुछ ढेलियॉं जो कल एक बहुत छोटे से ऑपरेशन के बाद उसे खिलाई जानी थी । गुड़ की ये ढेलियॉं जेमी माऊंटेड पुलिस के इंचार्ज सब इंस्पेक्टर चौहान साहब से ख़ासतौर पर मंगवाती थी, तब से ..जब से जेमी को पता चला था कि शक्ति को गुड़ बहुत पसंद है। शक्ति। दुनिया के लिए वो शक्तिमान था। पर यहाँ पुलिस लाइन में कोई उसे शक्तिमान नहीं कहता था। प्यार से बुलाना हो तो शक्ति, डाँटना हो तो शक्ति। सबके लिए वो शक्ति ही था। शक्ति जब अचानक चला गया तो पूरे पुलिस लाइन में एक सन्नाटा सा छा गया । जेमी वॉन , डॉ कैलाश उनिया, फ़िरोज़ खम्बाता और बाक़ी डॉक्टरों ने एक कमरे में खुद को बंद कर लिया और ये सब लोग तब तक रोते रहे , जब तक इनके आँसू सूख नहीं गए। सच कहूँ तो अभी सुबह के चार बजे तक । आज रात यहाँ कोई सोना नहीं चाहता। कोई नहीं मतलब कोई नहीं।

ना शक्ति का राइडर रविंद्र , ना शक्ति के केयरटेकर प्रमोद और रोहतास, SHAKTIMAN HOURSE ना देहरादून के एसएसपी सदानंद दाते और ना दिन रात उसके साथ जीने वाले तमाम जवान !!! शक्ति का बाड़ा अब ख़ाली है। बाड़े के पास की ही एक ख़ाली ज़मीन पर उसे सुलाया जा चुका है। ऊपर से मिट्टी भी डाल दी गई है। पर कोई भी इस सच को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है।
एक जीव के साथ इतने सारे लोगो का इतना लगाव ना सिर्फ अप्रत्याशित है बल्कि असंभव है। कहने वाले अब कुछ भी कह लें पर सच एक ही है – पूरे 36 दिन तक अपने बच्चे की तरह एक एक व्यकित ने शक्ति का ख़्याल रखा है। शक्ति को मक्खियाँ बहुत परेशान कर रहीं हैं। चलो भाई एक बड़ा सा mosquito net (मच्छरदानी ) मँगवा लिया जाए। अब भी मक्खियाँ अंदर आ रही हैं तो चलो fly end वाली मशीन मँगवा ली जाए। अरे शक्ति को गर्मी लग रही होगी।चलो कूलर मंगाओ भाई।अरे सख़्त ज़मीन और घास पर शक्ति के शरीर को और चोट ना लग जाए। चलो फ़ोम के गद्दे बिछा दिए जाएँ। शक्ति जब ज़मीन पर सर टेकता है तो घाव हो सकता है। चलो किसी गाड़ी की टायर के ट्यूब मँगवा दिए जाएँ।
SHAKTIMAN DOCTORशक्ति , शक्ति और शक्ति !!! 36 दिनों में यहाँ सबकी ज़ुबान पर एक ही नाम था – शक्ति !! और कहने वाले कह रहे हैं कि शक्ति का ध्यान नहीं रखा गया !!!!!! इतनी सारी कोशिशों के बाद भी क्या कभी ये हो सकता था कि एक महिला अपना सबकुछ मतलब सबकुछ छोड़कर पिछले दो हफ़्तों से दिन रात 16 से 18 घंटे रोज़ शक्ति के साथ लगी हो और वो भी कोई भी फ़ीस लिए बिना।
क्या ये कभी हो सकता है कि घोड़ों के जाने माने सर्जन फ़िरोज़ खम्बाता सबकुछ छोड़कर तीन तीन बार पुणे से देहरादून आएँ और वो भी बिना कोई फ़ीस लिए । क्या ये भी कभी हो सकता है कि टिम माहोने जैसा एक अमेरिकी शक्ति के लिए वर्जीनिया से पैर लेकर आ जाए और वो भी एक रूपया लिए बग़ैर।
क्या ये भी कभी हो सकता है कि विजय नौटियाल जैसे मानव अंग बनाने वाले शक्ति के लिए एक के बाद एक नए पैर बनाते जाएँ और वो भी कोई पैसा लिए बिना । क्या ये भी कभी हो सकता है कि कैलाश उनियाल , डॉ नेगी , डॉ साजिद , डॉ मिश्रा डॉ नौटियाल जैसे देहरादून के वेटरनरी डॉक्टर अपनी नौकरी के बीच भी शक्ति के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहें और क्या ये भी कभी हो सकता है कि सदानंद दाते जैसा एक राजधानी का एसएसपी दिन में दो दो बार घोड़े की टाँग पकड़ कर बैठा रहे !!! ये सब एकदम असंभव से सच हैं पर ये सब मैने खुद देखे और राजनीति करने वाले कहते हैं कि शक्ति का ध्यान नहीं रखा गया।
आलोचना का सबको हक़ है पर इस आलोचना में उन अच्छी आत्माओं का दिल दुखाने का किसी को हक़ नहीं है , जिन्होंने पिछले 36 दिनों में 13062024_1772765219608679_3923085389106678342_nशक्ति के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। ये सारी दुनिया ऐसी ही अच्छी आत्माओं की वजह से बची हुई है।काश कोई इसे समझ पाता। जो लोग इंसान होकर नहीं समझ पाए , उन्हे शक्ति से ही कुछ सीख लेना चाहिए क्योकि वो तो सब समझ गया था।
समझ गया था इसीलिए कल दोपहर तक शक्ति भी बहुत खुश था। शक्ति से जुड़ा हर इंसान बहुत खुश था। क्योकि कल का दिन उसके लिए बहुत अहम दिन होने वाला था। artificial prosthetic को सही तरीके से adjust करने के लिए शक्ति की एक बहुत छोटी और मामूली सी सर्जरी होनी थी। हड्डी का एक छोटा सा निकला हुआ टुकड़ा काटना था। सब उम्मीद में थे कि इस छोटी सी सर्जरी के बाद वो ठीक से खड़ा हो पाएगा। लेकिन सर्जरी से पहले ही शक्ति ऐसा गिरा कि वो उठ ही नहीं पाया। दुनिया भर में घायल घोड़ों को मार डालने की प्रथा है एक दो अपवाद को छोड़कर। पर यहाँ तो उसे ना सिर्फ बचाने की कोशिश हो रही थी बल्कि उसे फिर से चलाने की कोशिश की जा रही थी। जो लोग कुछ भी कह रहे हैं , वो शायद ये कभी नहीं समझ पाएँगे।

ये सही है कि शक्ति को नहीं जाना चाहिए था। ये भी सही है कि शक्ति को और लड़ना चाहिए था और ये भी सही है कि शक्ति को वापस परेड में सलामी देना चाहिए था पर यक़ीन मानिए शक्ति ने सलामी दे दी है। निस्वार्थ भाव से सेवा को सलामी। इंसान और जानवर के रिश्ते को सलामी। और अंत तक लड़ने के जज़्बे को सलामी। शक्ति से हम इतना ही सीख लें तो बहुत है !!
शक्ति के लिए आया गुड़ अब तक वैसा ही रखा है। इसकी मिठास अब वो फिर कभी नहीं समझ पाएगा !! पर उसने अपने बहाने जो मिठास तमाम रिश्तों में घोली है , वो बेमिसाल है। कुछ भी कहने वालों को ये गुड़ और उसकी मिठास कभी समझ नहीं आएगी। मन कर रहा है कि गुड़ की एक ढेली मैं भी चुरा ही लूँ। अपने शक्ति के नाम पर। शक्ति माफ करना यार। हम इंसान चोर ही हो सकते हैं। कभी गुड़ की ढेली चुराते हैं तो कभी ज़िंदगी।

                                                                         कापड़ी जी के फेसबुक वॉल से साभार


VINOD AKPDI

विनोद कापड़ी/ मीडिया जगत की जानी मानी  हस्ती, स्टार न्यूज़ (एबीपी), इंडिया टीवी जैसे बड़े चैनलों में संपादकीय जिम्मेदारी संभाली, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार, इन दिनों  बॉलीवुड में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं, शक्तिमान पर भी डॉक्युमेंट्री  बना चुके हैं ।

 

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