कहां छिप गए वे सेक्युलर, मानवतावादी… !

पद्मपति शर्मा (फेसबुक वॉल पर)

पद्मपति शर्मा
पद्मपति शर्मा

malda-1मालदा के बाद पूर्णिया ! यह हो क्या रहा है ? क्या सहिष्णुता सिर्फ उस बहुसंख्यक वर्ग के लिए ही है? सनातन धर्मी स्वभाव से सहनशील है। उसके शब्दकोश में नफरत या घृणा शब्द ही नहीं है। हिंदी की पत्रिका सरिता में हिदू दिवी देवताओं के बारे में क्या कुछ अंटशंट नहीं लिख जाता था ? लोकशाही में बोलने की आज़ादी का हम सम्मान करते हैं। कोई किसे पसंद करे न करे, यह उसका निजी मामला है।

मोहम्मद साहब पर अभद्र टिप्पणी करने वाले शख्स को फांसी देने का फतवा देते हुए देश के बड़े हिस्से में जिस तरह से हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे हैं, उसको लेकर क्या धर्मगुरु आगे आए निंदा करने ? किस खोह में छिप गए वे मानवतावादी, तथाकथित सहिष्णु, सेक्युलर व पुरस्कार लौटाने वाले महान बुद्धिजीवी, जिन्हें चुनावी दौर में ही देश में असहनशीलता नजर आ रही थी ? अरे देश को गृह युद्ध की आग में झोंकने का भयावह षड़यंत्र हो रहा है और यह कैसी विचित्र सी खामोशी है ! लाखों लोग सड़क पर उतर रहे हैं। वे क्यों भूलते हैं कि सारी दुनिया उनकी नापाक करतूतों को गौर से देख रही है और यह भी समझ चुकी है कि इनके लिए जम्हूरियत बेमानी है।

यूपी के बाद बंगाल और अब बिहार में पहुंची जहरीली आंच को दावानल बनने से रोकिए। अरे सत्ता ही सब कुछ नहीं है। वोट के सौदागरों, इंसानियत भी कोई चीज होती है ! पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी, किस तरह जिहाद के नाम पर शर्मसार कर देने वाली नृशंसता का खेल खेला जा रहा है ? थानों पर हमले हो रहे हैं, दुकानों और वाहनों को जलाया जा रहा है। मासूमों का क़त्ल किया जा रहा है। इल्तजा है कौम के उन विद्वानों से कि वे आगे आएं और अपील करें कि जिसने गुस्ताखी की है उसे संविधान के मुताबिक सजा दी जाएगी। लोग कानून अपने हाथ में न लें। दूसरी ओर हिंसा प्रभावित राज्य सरकारें इस तरह की खुली गुंडागर्दी का कड़ाई के साथ दमन करें। त्वरित काररवाई का वक्त है। देखिये, आपकी बेपरवाही से कहीं देर न हो जाए !


काश! मेरा डर उनके मन में दया की वजह बन जाता

 

धीरेंद्र पुंडीर (फेसबुक वॉल पर)

धीरेंद्र पुंडीर
धीरेंद्र पुंडीर

malda-2कई बार सोचता हूँ लिखने से पहले, क्योंकि कुछ दोस्त इस्लाम धर्म से रिश्ता रखते हैं। और सवाल हर बार मुझे सोचने पर ही मज़बूर करते हैं। मैं खुद से पूछता हूँ कि क्या कारण है कि दादरी पर लिखते हुए नहीं सोचता हूँ। गोवा पर लिखते हुए नहीं सोचता हूँ। किसी ऐसे मसले पर लिखते हुए भी नहीं सोचता हूँ, जिसका रिश्ता हिंदुओं से होता है। जेएनयू जैसे संस्थानों से निकले प्रखर मानवतावादी भी नहीं सोचते होंगे। खुद को धर्मनिरपेक्षतावादी कहने वाले भी ऐसे ही सोचते होंगे? फिर लगता है कि मैं डरता हूँ उनके ख़िलाफ़ लिखने से और राजदीप टाइप लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता ख़त्म होने की संभावना (या आशंका जो कह लें आप) से ।

लेकिन मेरे जैसों का डर क्या हिंसा से इस्लाम के नाम पर उन्माद मचा रहे गुंडों के मन मे दया पैदा कर सकता है। मन कहता है हां, लेकिन इतिहास और दिमाग हज़ारों लाशों के बीच खड़ा होकर सोचने को कहता है। बिना किसी मातृभूमि की अवधारणा के दुनिया को हिंसा के नर्क में झोंकने में जुटे लोगों से सवाल कौन पूछ सकता है। लेकिन सवाल पीछा कर रहे है। शैतान के विरोध के नाम पर शैतान से ज़्यादा हिंसक इन लोगों के ख़िलाफ़ किसमे हौसला होगा। क्योंकि किसी भी मानवीय भावना से मालदा, पूर्णियां या ऐसे ही शहर में नंगा नाच कर रहे लोगों का कोई रिश्ता नहीं है।

वैसे मैं खुद से जिस तरह से सवाल कर रहा हूं, ऐसे ही वो अपने से सवाल कब करेंगे? क्या कभी करेंगे या इंसानियत को मिटाने की हर जुगत के लिये झूठ और सच की खिचड़ी बनाते रहेंगे। इंग्लिश मीडिया को लेकर अपने मन में कोई भाव नहीं है वो सिर्फ झूठ या 2 फ़ीसदी लोगों के लिये झूठ परोसता है, क्योंकि दादरी के सच का क ख ग भी किसी इंग्लिश मीडिया के शख़्स को मालूम होंगा, इसमें मुझे संदेह है। (यह मेरी दुर्भावना भी हो सकती है)


मालदा का प्रतिरोध मुस्लिम समाज के अंदर से हो

रामजी तिवारी (फेसबुक वॉल पर)

रामजी तिवारी
रामजी तिवारी

malda-3‘मालदा’ की घटना के बाद वास्तविक और आभासी दोनों दुनिया से इस तरह की उलाहनाएं सुनने को मिल रही हैं कि इस देश के सेक्युलरों ने अब चुप्पी साध ली है। सोशल मीडिया पर सेक्युलर लोगों को लेकर चलने वाले ताने और तीर मेरे पास भी पहुँच रहे हैं । उनका सवाल सीधा है कि मुस्लिम कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ हम जैसे (कथित) सेक्युलर लोग अकसर चुप्पी क्यों साध लेते हैं ? क्यों नहीं वे उसी तरह का आक्रामक विरोध करते, जैसे कि वे हिन्दू कट्टरपंथियों के मामले में करते हैं? उनकी तुष्टिकरण की नीति ने हमेशा से हिन्दू समाज का नुकसान किया है, उसे नीचा दिखाया है । और यह भी कि इसी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के कारण भारतीय समाज में कट्टरता बढती जा रही है।

बेशक कि मेरे जैसा मेल-मिलाप (आप चाहें तो कथित सेक्युलर भी पढ़ सकते हैं ) चाहने वाला आदमी उस तरह से मुस्लिम कट्टरपंथ पर नहीं बोलता, जैसे कि वह हिन्दू कट्टरपंथ पर बोलता है। कारण यह नहीं है कि मैं मुस्लिम कट्टरपंथ से प्यार करता हूँ और हिन्दू कट्टरपंथ से नफरत । कारण यह भी नहीं कि यह मेरी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है, जो मुझे सिर्फ हिन्दू कट्टरपंथ की ही आलोचना के लिए प्रेरित करती है। और कारण यह भी नहीं है कि इससे मुझे सेक्युलर होने का तमगा मिलता है, जैसा कि मेरे साथी लोग अक्सर मुझ पर आरोप लगाया करते हैं।

हकीकत तो यह है कि हमारे जैसे लोग हर तरह के कट्टरपंथ को नापसंद करते हैं, और उसे होते हुए देखना उन्हें भीतर तक सालता है । वे जानते हैं कि भारत जैसे देश में अल्पसंख्यक कट्टरता समाज के ताने-बाने को नष्ट कर रही है। वह इस देश की सामासिक संस्कृति के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है । जानने को तो वे यह भी जानते हैं कि अल्पसंख्यक कट्टरता उस बहुसंख्यक कट्टरता को खाद और पानी मुहैया कराती है, जिसके परिणाम स्वरूप किसी भी देश और समाज में फासीवादी प्रवृत्तियां पनपती हैं। इसलिए वे हर तरह की कट्टरता से नफरत करते हैं, डरते हैं और लड़ते हैं ।

उनका साफ़ मानना है कि कट्टरता के खिलाफ लड़ाई में समाज के हर तबके को आगे आना चाहिए। बिना सबके सहयोग के शायद हम इस मुहीम में सफल भी नहीं हो सकेंगे ।लेकिन उनका यह मानना भी उतना ही स्पष्ट है कि कट्टरता की लड़ाई से लड़ने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस समाज के अपने कन्धों पर ही आयद होती है। उस समाज के भीतर से पैदा होने वाली लड़ाई ही, वहां पनपने वाली कट्टरता को सबसे बेहतर ढंग से पराजित कर सकती है।

मसलन दादरी की घटना के बाद जिस तरह से हिन्दुओं के बीच से उसके निंदा के स्वर फूटे, वह इस बात की ताईद थी कि उस समाज में कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की कमी नहीं है। हम यही चाहते हैं कि मालदा की घटना के खिलाफ भी मुस्लिम समाज के भीतर से ही प्रतिरोध और गुस्से का स्वर सुनाई दे। ख़ुशी की बात है कि ऐसी कुछ आवाजें दिखाई दे भी रही हैं । मगर अफ़सोस ……. ! कि उस समाज के भीतर से कट्टरता के खिलाफ उठने वाली आवाजें उस भारी संख्या में सामने नहीं आ रही हैं, जिसकी मांग यह समय कर रहा है।  कारण साफ़ है । एक तो उस समाज के भीतर कट्टरता के खिलाफ उठने वाली आवाजों के लिए जगह बहुत कम बची है।दूसरे यह भी कि वहां पर अपने भीतर झाँकने की प्रवृति भी कम से कमतर होती चली गयी है |

इसीलिए जब हम अपने समाज के भीतर उभरने वाले कट्टरपंथी तत्वों की आलोचना करते हैं, तो हम सिर्फ उस घटना की आलोचना ही नहीं कर रहे होते । वरन उसके साथ-साथ हम अपने समाज में कट्टरता के खिलाफ उठने वाली आवाजों के लिए जगह भी बचाए रखना चाहते हैं। और अपने समाज के भीतर झाँकने की प्रवृति भी |

यकीन जानिये कि मालदा की घटना निंदनीय है, शर्मनाक है, और हम उस पर दुखी हैं । और भी यकीन जानिये कि हम उन तमाम लोगों की समझ पर भी शर्मिन्दा है, जो मालदा की घटना से गौरवान्वित हो रहे हैं । और उन लोगों की बुद्धि पर भी, जो इस अल्पसंख्यक कट्टरता में बहुसंख्यक कट्टरता के लिए जगह तलाश रहे हैं।

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