महिलाएं पूछें- काहे का ‘शेर’पुर

 

गांव कोई भी हो, अलसुबह की ये तस्वीर नहीं बदल रही। फोटो- indiawaterportal.org
गांव कोई भी हो, अलसुबह की ये तस्वीर नहीं बदल रही। फोटो- indiawaterportal.org

बिहार के सारण ज़िले का शेरपुर गांव। आज़ादी के सात दशक बाद भी अलसुबह की कुछ तस्वीरें नहीं बदल पाईं। हाथ में पानी के लोटे, मग या फिर वैसे जलस्रोत की तलाश जहां दीर्घशंकासे निवृत्त हुआ जा सके। सुबह की शुरुआत आज भी कुछ ऐसे ही होती है।

शेरपुर के लोगों को आप चाहे जितना कोस लें, लेकिन खुले में शौच इनकी मजबूरी है। गांव की आबादी करीब एक हज़ार है। दो सौ परिवारों के इस गांव में बमुश्किल 25 घरों में शौचालय बन पाए हैं। कमोबेश यही हाल आस-पास के सभी गांवों का है। गांव की महिलाओं को भी शौच के लिए क़रीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। शर्म, संकोच के चलते अंधेरे का इंतज़ार करना पड़ता है। लोगों की नज़रों से बचते-बचाते पेड़ों या झाड़ियों की तलाश होती है और फिर जितनी जल्दी हो सके, ये फारिग होने की कोशिश करती हैं।
शौचालयों का ये संकट महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से भी गांवों में बड़ी मुसीबत रहा है। कई महिलाएं इसी दौरान हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होती हैं। सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद… जब सन्नाटा होता है, तभी ये महिलाएं शौच के लिए निकलना पसंद करती हैं। कई अध्ययन भी इसकी तस्दीक करते हैं कि शौच के लिए निकलने वाली महिलाओं में ज़्यादातर कभी न कभी यौन हिंसा की शिकार बनती हैं।

फक्कड़ लक्कड़ को एक घर नसीब नहीं

शहरों में जो बदलाव दिख रहा है…उसके बनिस्पत गांवों में विकास की रफ़्तार काफी धीमी है। गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। लोगों के पास रहने को घर नहीं है। इंदिरा आवास जैसी कई सरकारी योजनाएँ, कब आईं, कब गईं वो झोपड़ियों में ज़िंदगी बसर कर रहे लोगों को पता भी नहीं चला।

अपने घरौंदे के सपने से जुड़ी कोई भी बात करूं तो जेहन में मेरे गांव के लक्कड़ नाथ की तस्वीर कौंध उठती है। लक्कड़ के पास घर नहीं है। इंदिरा आवास योजना के लिए कई बार आवेदन किया। बड़ी मुश्किल से लक्कड़ का नाम लिस्ट में शुमार हुआ। घर बनवाने के लिए पैसे भी मिले। लेकिन कहते हैं जिस ठेकेदार को पैसे मिले, उन्हें लक्कड़ के फक्कड़ जीवन पर तरस न आया।

लक्कड़ अधिकारियों के दफ़्तरों का चक्कर काटते रह गए। तीस साल बीत जाने के बावजूद उन्हें घर नहीं मिल पाया। पिछले तीस साल से देख रहा हूं, लक्कड़ के पास वही मरई (झोपड़ी) है, जिससे बरसात में पानी टपकता रहता है। हां, आवारा जानवरों को कहीं नहीं आसरा मिलता तो लक्कड़ की मरई में चले आते हैं।- कुबेरनाथ

भारत सरकार शौचालय बनाने के लिए वित्तीय सहायता देती है। केंद्र सरकार की योजना के तहत बीपीएल परिवारों को मनरेगा और निर्मल भारत अभियान से शौचालय निर्माण के लिए मदद दी जाती है। लेकिन कई बार ये पैसे कहां जाते हैं, इसका अता-पता इन ग्रामीण इलाके में रहने वाले लोगों को आज तक नहीं चल पाया। सामाजिक कार्यकर्ता अनुज कुमार की माने तो ग्रामीण इलाकों में सरकारी योजनाओं को लेकर जानकारी के अभाव का फायदा कुछ दबंग लोग उठाते रहे हैं। जब तक गांव से बाहर निकला पढ़ा-लिखा तबका मजबूरों की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, भ्रष्टाचार के इस सिलसिले पर लगाम लग पाना थोड़ा मुश्किल है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने चुनावों के दौरान पहले शौचालय फिर देवालय का जुमला बड़ी जोर-शोर से उठाया था। उनका ये मिशन दिल्ली से सुदूर गांवों तक कब पहुंचेगा, कहना मुश्किल है। कई गांव और घर एक अदद शौचालय की बाट जोह रहे हैं।

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शांत सौम्य कुबेर नाथ की लेखनी गरीबों का दर्द और मजबूरों का ग़ुस्सा समेटने और सहेजने की कोशिश करती है। आप उनसे 09953959226 पर संपर्क कर सकते हैं।


गांव में शौचालय का सच बताती एक और स्टोरी। पढ़ने के लिए क्लिक करें

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