ब्रह्मानंद ठाकुर

हमारे देश की सियासत कुछ ऐसी हो चली है कि अब वो आपके निजी जीवन में दखल देने लगी है । हम क्या खाएंगे, क्या पीएंगे, क्या पहनेंगे और क्या पालेंगे, समलन हर बात में सियासी दखल । हैरानी की बात ये कि अगर उसके खिलाफ आवाज उठाई तो आप देशद्रोही की श्रेणी में खड़े कर दिये जाएंगे । राम मंदिर के नाम पर समाज को बांटने वाले कुछ लोग गाय के नाम पर गदर मयाए हैं । ऐसे में सवाल ये है कि क्या ऐसे लोगों को वाकयी गाय की कोई चिंता है । क्या वो लोग खुद गाय पालते हैं । मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जो गाय पालता है उसका उसको कितना फायदा मिलता है या फिर उससे वो दुखी है वहीं समझता है । हाल की बात है मैं अपने घर के पास एक पेंड के नीचे  खडा था तभी पड़ोस का एक शिक्षित युवक सतीश साईकिल पर खेत से हरा चारा लेकर मेरे सामने आया और साईकिल से उतर कर खड़ा हो गया। मैं जानता हूं, वह एक गाय पाले हुए है। 35 हजार में ही कुछ माह पहले खरीद कर लाया है । सतीश अपने मां-बाप का इकलौता लडका है ।पिता जी नलकूप विभाग के आपरेटर से रिटायर थे । पेंशन मिलती थी । पिछले साल उनका निधन हो गया । अब सतीश की मां को पारिवारिक पेंशन मिल रही है जो घर चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए सतीश ने एक गाय खरीदी । मैंने सतीश से उसकी खेती किसानी का हाल पूछा तो उसने कहा – ‘भाई जी, अब तो पानी सिर से ऊपर बहने लगा है। गाय  बेंच दूंगा । अब कभी गाय पालने का नाम भी नहीं लूंगा और खेती? उससे तो लागत भी वसूल नहीं हो पाती है । सोच रहा हूं कहीं जाकर 5-7 हजार महीने की नौकरी करूं ।

सतीश ने आगे कहा – साईकिल पर यह जो जई का बोझा देख रहे हैं वह 700 रूपये कठ्ठा की दर से एक कठ्ठा पड़ोस के किसान से खरीदा हूं। उसी में15 दिनों से खिला रहा हूं।  भूसा का जो स्टाक था, वह फरवरी में ही खत्म हो गया। तब से भूसा भी खरीदना पड़ रहा है । पूरे मार्च महीने में 1400 रुपये प्रति क्विन्टल की दर से चार क्विन्टल भूसा खरीदना पड़ा है। 40 किलो चोकर के एक बोरी की कीमत 800 रूपया है। यानी चोकर 20 रुपये किलो पड़ा। गांव में तिमूल का दूध संग्रह केन्द्र है, जहां दूध की कीमय फैट और एसएनएफ के आधार पर तय होती है। एक लीटर दूध की कीमत मिलती है लगभग साढ़े बाईस रूपये। जब पशुपालकों को सेन्टर से दूध खरीदना होता है तो हमें 35 रूपये लीटर दिया जाता है। अब  गाय का दूध बेंच कर अगर गाय की ही परिवरिश न हो सके तो हम गाय पालने वाले कैसे जीवित रह सकते हैं ? सतीश की यह  चिंता केवल उसी की नहीं, हर वैसे सीमांत और लघु किसानों की है जो अपने और अपने परिवार के जीविकोपार्जन के लिए खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। खेती भी घाटे का व्यवसाय हो गया है। लागत ही जब वसूल नहीं हो पाती तो भरण पोषण कैसे हो ? शादी-व्याह, बीमार का इलाज और बच्चों की पढ़ाई सब कुछ कर्ज लेकर करने की मजबूरी। हर फसल में खेती के लिए नयी पूंजी का जुगाड़ । जब यह सम्भव नहीं दिखता तो किसानों के बेटे खेती छोड़ फैक्ट्रियों में मजदूरी के लिए पलायन करना ही एक विकल्प समझते हैं।


ब्रह्मानंद ठाकुर/ BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।