संतोष पाठक के फेसबुक वॉल से

गांव का पुराना घर साल दर साल खंडहर हो रहा है। यह मेरे दादा-दादी की विरासत है। जर्जर होते इस घर की दीवारों में, आंगन में मेरे पिताजी के बचपन से लेकर जवानी तक के बेहद कष्टमय संघर्ष की यादें कैद हैं। घर के ठीक सामने पुरखों की निशानी गोंड़ बाबा चबूतरे पर बिराजे हैं।

कोई भी तीज-त्यौहार की शुरुआत आज भी हम यहीं पर दिया जलाकर करते हैं। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है सो वे इस बार यहां हमारे साथ नहीं आ सके। हमने भतीजे के साथ पैतृक घर व खेत पर जाकर दिवाली की पूजा और उसके बाद अपनों के बीच घर की। दरअसल नौकरियों में जब जिंदगी उलझती है तो घर-परिवार छूट जाते हैं और ये त्यौहार ही तो हैं जो हमें खींच लाते हैं। वैसे ये शहरों की बसावट गांव के लोगों से ही तो विस्तार ले रही है। लोग शहरी चकाचौंध में अपने जन्मस्थान को भूल रहे हैं। यकीन मानिए, अपने गांव में जो प्यार है वो शहरों में तो नसीब नहीं।


दीवाली पर गांव घूमते हुए एक ज्ञान मिला

पुष्यमित्र के फेसबुक वॉल से। एक चाचाजी ने बताया कि गांव में जो जो मकान पूरी तरह बन गए हैं। जिनके आंगन में फूस की एक कोठली भी नहीं बची है। बाउंड्री वाल बन गया है और अच्छा रंग रोगन है। समझ लो उस मकान में कोई नहीं रहता। इस मकान के सारे सदस्य शहर शिफ्ट कर गए हैं। भूले भटके पर्व त्योहार पर कोई आ गया तो आ गया।

कुछ मकानों में बूढ़ा बूढ़ी जरूर रहते हैं, मगर वे भी शहर शिफ्ट करने की तैयारी में हैं। गांव में रहने वाला स्थायी बाशिंदा जो है, उनमें से ज्यादातर अभी भी फूस की झोपड़ी में रहते हैं, जिन लोगों ने किसी तरह पक्का मकान बना लिया है, वे मकान को बाहर से प्लास्टर नहीं करवा पाये हैं। उसकी बाउंड्री पर आज भी बांस की टट्टी लगी है। दरवाजे पर रोशनी कम है।

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