Archives for माटी की खुशबू - Page 3

माटी की खुशबू

बहुत तकलीफ़देह है नीलाभ का यूं जाना

नमस्ते, कल्पितजी !  मैं नीलाभ मिश्र हूँ, पटना से आया हूँ । नवें दशक का कोई शुरुआती वर्ष था, जब नीलाभ मिश्र मुझसे मिलने अशोक-मार्ग के घर आये थे। नवभारत…
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माटी की खुशबू

मन फागुन-फागुन हो गया

       संजय पंकज  मंजरियों की गंध लगी तो  मन फागुन फागुन हो गया! प्रेमिल सुधियाँ अंग लगी तो  मन फागुन फागुन हो गया! भूले बिसरे आज अचानक  जाने …
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माटी की खुशबू

पूर्णिया में ‘गोकुल का छोरा, बरसाने की नार’

डॉ शंभु लाल वर्मा ‘कुशाग्र’ "एक डाल दो पाच्छी है बैठा कौन गुरु कौन चेला/ गुरु की करनी गुरु भरेगा चेला की करनी चेला /उड़ जा हंस अकेला" - कबीर…
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माटी की खुशबू

राजधानी दिल्ली में ‘अलग मुलक का बाशिंदा’

पशुपति शर्मा राजकमल नायक। रंगमंच का ऐसा साधक, जिसने मंच पर तो एक बड़ी दुनिया रची लेकिन सुर्खियों के ताम-झाम से हमेशा खुद को दूर रखा। सामान्य सी कद काठी से…
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आईना

सुकून का कहीं कोई वाई फाई नेटवर्क नहीं!

सच्चिदानंद जोशी मैं जैसे ही उस रिसोर्ट में दाखिल हुआ अचंभित रह गया। शहर से इतने पास, लेकिन शहर के कोलाहल से दूर, इतनी सुंदर जगह की तो मैंने कल्पना…
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माटी की खुशबू

… और मां के साथ मर गया मनुष्य

देवांशु झा बेटे ने बूढ़ी मां से कहा मां चलो, सूर्य नमस्कार करते हैं लगभग अपंग मां सहज तैयार हुई बहू ने खुश होकर दरवाजा खोला बेटे ने मां को…
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माटी की खुशबू

सुधीर जी आपका ये कदम ‘भलु लगद’

कार्टूनिस्ट भाटी के फेसबुक वॉल से हर इंसान के जीवन में एक ना एक फुंसुख वांगड़ू जैसा किरदार जरूर होता है जो होता जीनियस है पर उसके आस-पास के सीमित…
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माटी की खुशबू

8 साल बाद जारंग गांव में लौटी ‘उम्मीदों के स्कूल’ की रौनक

ब्रह्मानंद ठाकुर आखिर क्या वजह है कि जब कोई मंत्री या नेता गांव-गिराव में जाता है तभी प्रशासन को वहां की बदइंतजामियों की चिंता सताती है, क्या बिना मुख्यमंत्री, मंत्री…
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माटी की खुशबू

छांव

मृदुला शुक्ला छाँव कहाँ होती है  अकेली खुद में कुछ  ये तो पेड़ों पर पत्तियों का  दीवारों पर छत का  वजूद भर है पतझड़ में पेड़ों से नहीं झरती  महज…
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माटी की खुशबू

‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना’ के कवि को अलविदा

उदय प्रकाश 'आत्मजयी' वह कविता संग्रह था, जिसके द्वारा मैं कुंवर नारायण जी की कविताओं के संपर्क में आया. तब मैं गाँव में था और स्कूल में पढ़ता था. 'आत्मजयी'…
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